इतिहास: अंग्रेजों ने किए थे भारत की चिकित्सा व्यवस्था में बदलाव

Jay singh Rawatजयसिंह रावत Updated Mon, 06 Apr 2020 01:24 PM IST
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कोरोना वायरस डॉक्टर्स (सांकेतिक)
कोरोना वायरस डॉक्टर्स (सांकेतिक) - फोटो : social media

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अत्याचार और शोषण के बीच अंग्रेजों ने कई ऐसी चीजें और व्यवस्थाएं भी छोड़ गए थे जो कि आज भी हमारे काम आ रही हैं। यकीनन ये सारी व्यवस्थाएं उन्होंने अपने लिए की थी, लेकिन आजाद भारत की सरकारों के लिए वे दिशासूचक का काम कर गईं।  उनमें से एक 1897 का महामारी रोकथाम कानून भी है जो कि संकट की इस घड़ी में हमारे काम आ रहा है। यही नहीं अत्याधुनिक विज्ञान एवं प्रोद्योगिकी के इस युग में चिकित्सा एवं स्वास्थ्य का जो विशालतंत्र हमारे सामने खड़ा है उसकी बुनियाद भी वहीं अंग्रेज छोड़ कर चले गए थे।
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कोरोना महामारी में अंग्रेजों का कानून ही संकटमोचक
कोविड-19 की तरह जब 1918 में स्पेनिश फ्लू की महामारी ने दुनिया में हाहाकार मचाया था तो उस समय भी आज की तरह चिकित्सा विज्ञान किंर्तव्यविमूढ़ था, इसलिए उस समय भी अंग्रेजों का बुबोनिक प्लेग से निपटने के लिए बनाया गया महामारी रोग कानून 1897 ही काम आया। उसके बाद भी भारत में जब भी हैजा, प्लेग, चेचक, मलेरिया एवं 1898 के असम के कालाजार एवं बेरीबेरी जैसी बीमारियां फैलीं तो यही ब्रिटिश कालीन कानून याद आया, जैसा कि कोविड-19 की महामारी फैलने पर भारत सरकार को इस बार याद आया।
अंग्रेजों के जाने के बाद स्वतंत्र भारत में भी वर्ष 2018 में गुजरात में हैजा रोकने, 2015 में डेंगू के नियंत्रण के लिए चण्डीगढ़ में, 2009 में स्वाइन फ्लू रोकने के लिए पुणे में और आज देशभर में कोरोना वायरस की महामारी रोकने के लिए एकमात्र विकल्प के तौर पर इस कानून का प्रयोग किया जा रहा है। भले ही सप्तम् अनुसूची के तहत कानून व्यवस्था राज्य सरकार का दायित्व है, फिर भी भारत सरकार ने इसी कानून का डण्डा सारे देश पर घुमा रखा है। भारत ही क्यों ? आज सारे संसार में महामारी से बचने के लिए सोशियल डिस्टेंसिंग की जा रही है, जो कि एपिडेमिक डिजीज एक्ट 1897 का ही एक सबक है।

अंग्रेजों के साथ ही पाश्चात्य चिकित्सा का प्रवेश
सन् 1757 में प्लासी के युद्ध के बाद जब ईस्ट इंडिया कम्पनी ने भारत में अंग्रेजी हुकूमत की नींव रखी तो उस समय देश में घोर गरीबी के साथ ही आम जनता में बीमारियों और स्वच्छता के प्रति जागरूकता में कमी के कारण हैजा, प्लेग एवं चेचक जैसी बीमारियां आम थी, जिनसे लाखों लोगों की जानें जातीं थी। उस समय भारत में बीमारियों के इलाज के लिए आज की जैसी पाश्चात्य चिकित्सा व्यवस्था न होकर लोग परम्परागत नीम-हकीम एवं वैद्यों पर निर्भर थे। सन् 1600 के आसपास जब ईस्ट इंडिया कम्पनी के पहले फ्लीट के साथ पाश्चात्य दवाओं के साथ डॉक्टरों की टीम भी पहुंची थी। दरअसल, मेडिकल और हेल्थकेयर सिस्टम पर इतना ध्यान केंद्रित करने की एक वजह अंग्रेजी हुकूमत की अपनी सुरक्षा भी थी। 

कम्पनी द्वारा प्लासी के युद्ध के बाद भारत में अपनी प्रशासनिक एवं मिलिट्री सेवाएं शुरू किए जाने के साथ ही सबसे पहले कम्पनी के कर्मचारियों और सैनिकों की चिकित्सा और स्वास्थ्य के लिए 1764 में बंगाल में मेडिकल विभाग खोला गया, जिसमें 4 प्रमुख सर्जन, 8 सहायक सर्जन तथा 28 सर्जनों के सहयोगी तैनात किए गए।

सन् 1775 में राॅयल इंडियन आर्मी से सम्बद्ध सर्जन जनरल और फिजिशियन जर्नल सहित हॉस्पिटल बोर्ड का गठन किया गया, जिसका काम यूरोपीय अस्पतालों का प्रशासन था। सन् 1785 में कम्पनी ने बंगाल, मद्रास और बम्बई प्रेसिडेंसियों में 234 सर्जन वाले एक चिकित्सा विभाग का गठन किया, जिसमें सिविल और मिलिट्री दोनों ही सेवाएं उपलब्ध थीं। सन् 1796 में  हॉस्पिटल बोर्ड का नाम बदल कर मेडिकल बोर्ड कर दिया गया, जिसे नागर सेवाओं की जिम्मेदारी दी गई। 
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