कोरोना का प्रकोप: सौ साल पीछे खड़ी है दुनिया, केवल सरकार पर ही करना होगा भरोसा

Jay singh Rawatजयसिंह रावत Updated Tue, 24 Mar 2020 12:04 PM IST
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सितम्बर 1896 में जब बम्बई में प्लेग की बीमारी फैली तो वहां लाखों लोग बीमारी के ग्रास बन गए।
सितम्बर 1896 में जब बम्बई में प्लेग की बीमारी फैली तो वहां लाखों लोग बीमारी के ग्रास बन गए। - फोटो : PTI
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दुनिया के सामने आज बिल्कुल वही स्थिति खड़ी है जैसी कि 1918 में करोड़ों लोगों की जानें लेने वाली इतिहास की अब तक की सबसे बड़ी महामारी स्पेनिश फ्लू के समय खड़ी हुई थी। 5 करोड़ से अधिक लोगों की जानें लेने वाली उस महामारी के बारे में न तो डॉक्टरों को कोई जानकारी थी और ना ही उसके इलाज के लिए कोई दवा थी। सौ साल बाद विज्ञान और प्रोद्योगिकी के इस युग में भी आज कोविड-19 की इस महामारी के संकट में भी बिल्कुल वही स्थिति है।
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इस बेहद खतरनाक दुश्मन से लोगों को बचाने के लिए उन्हें फिलहाल घरों में बंद करने के सिवा दूसरा उपाय नजर नहीं आता है और सरकार पिछले अनुभव को ध्यान में रखते हुए इस दिशा में प्रयास तो कर रही है मगर अफवाहों और अवैज्ञानिक तर्कों की चेन तोड़ने पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है, जबकि सोशियल मीडिया के इस दौर में अफवाहें कोरोना जैसे अदृष्य दुश्मन के लिए ही मददगार साबित हो सकती हैं।
5 करोड़ से ज्यादा मरे थे 1918 की महामारी में
माना जाता है कि ज्ञान अगर वृक्ष है तो अनुभव उसकी छाया है और छाया सदैव वृ़क्ष से बड़ी होती है। अनुभव से ही ज्ञान का लाभ प्राप्त किया जाता है। सितम्बर 1896 में जब बम्बई में प्लेग की बीमारी फैली तो वहां लाखों लोग बीमारी के ग्रास बन गए। वर्ष 1891 में बम्बई की जो जनसंख्या 8.20 लाख थी वह 1901 में 7.80 लाख रह गई। आखिरकार वायसराय ने हालात भांपते हुए 4 फरवरी, 1897 को ‘एपिडैमिक डिजीज ऐक्ट’ लागू कर दिया। इससे प्रशासन को किसी भी स्टीमर या जहाज की जांच कराने, यात्रियों और जहाजों को रुकवानेे का अधिकार मिल गया था।

अधिनियम के तहत सार्वजनिक स्वच्छता के उपाय, मेलों, त्योहारों धार्मिक यात्राओं पर रोक के साथ ही रेलवे यात्रियों की तलाशी, घरों की तलाशी और संदिग्धों को जबरन अस्पताल भेजने की व्यवस्था थी। उस समय संक्रमित सम्पत्ति को जलाया या नष्ट भी किया गया। नागरिकों के व्यक्तिगत जीवन में पहली बार इतना हस्तक्षेप हुआ तो लोग भड़क उठे और यूरोपीय डॉक्टरों और चिकित्सा कर्मियों पर हमले तक हुए।

22 जून को क्वीन विक्टोरिया की डायमंड जुबली के अवसर पर गवर्नर हाउस से डिनर करके बाहर निकलते प्लेग कमिश्नर को कुछ लोगों ने ‘बदला लेने के लिए’ गोली मार दी। सन् 1857 की गदर का कटु अनुभव चख चुकी ब्रिटिश सरकार को दूसरी गदर की आशंका से अपने कठोर उपाय वापस लेने पड़े और केवल स्वेच्छिक प्रतिबन्धों पर निर्भर रहना पड़ा जिस कारण महामारी को रोकने में बहुत लम्बा समय लगने से मौतें जारी रहीं। इसलिए इस बार भी जरूरी है कि सरकार कठोर निर्णय लेने से पहले आम जनता को जागृत कर अपनी मजबूरी भी समझाएं।
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