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Delhi election results 2020: दिल्ली की हार का असर होगा भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों पर ?

Jay singh Rawatजयसिंह रावत Updated Tue, 11 Feb 2020 07:27 PM IST
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ऐसे बदला भाजपा का सियासी नक्शा
ऐसे बदला भाजपा का सियासी नक्शा - फोटो : amar ujala
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एक के बाद एक कई राज्यों के हाथ से निकलने के बाद आखिर दिल्ली विधानसभा का चुनाव भी भारतीय जनता पार्टी के लिए पूरी ताकत झोंकने के बावजूद अच्छी खबर लेकर नहीं आ पाया। अच्छी खबर तो रही दूर उसका सम्मानजनक हार के आंकड़े तक भी नहीं पहुंचना उसके लिए गंभीर आत्मचिन्तन का समय आ गया है।
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हाल ही में झारखण्ड हाथ से निकला और अब दिल्ली में करारी हार के बाद भाजपा संगठन और भाजपा शासित राज्यों में भारी फेरबदल की संभावनाएं प्रबल हो गई हैं। भाजपा के मुख्यमंत्रियों की अलोकप्रियता की आंच प्रधानमंत्री मोदी की छवि पर पड़ने से रोकने के लिए सबसे पहले राजनीतिक सर्जिकल स्ट्राइक उत्तराखण्ड जैसे उन राज्यों में हो सकती है जहां पार्टी अकेले दम पर सत्ता में है।

भाजपा की पावों तले खिसकती जमीन
मार्च 2018 में भाजपा अपने दम पर देशभर के 13 राज्यों में सत्ता में थी, जबकि वह अन्य दलों के साथ गठबंधन में छह अन्य राज्यों पर शासन कर रही थी। लेकिन हाल ही में झारखण्ड में चुनाव हारने के बाद भाजपा अब अपने दम पर आठ राज्यों पर शासन कर रही है, और इतने ही अन्य राज्यों में वह सत्तारूढ़ गठबंधन के सहारे या गठनबंधन के सहयोगियों के साथ सत्ता में है। जबकि मार्च 2018 में देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र के लगभग 70 प्रतिशत क्षेत्र में भाजपा अकेले या साझेदारी में सत्ता में थी जो कि घटकर 34 प्रतिशत रह गया है।

भाजपा देश के कुल 16 राज्यों में से बिहार, मेघालय, मिजोरम, नागालैण्ड और सिक्किम में सहयोगियों की सरकार में शामिल है। देखा जाए तो वह 5 राज्यों में अपने दम पर तथा 11 में सहयोगियों के साथ सत्ता में है। जबकि भाजपा जिस कांग्रेस से भारत के मुक्त हो जाने का नारा लगा रही थी उस कांग्रेस वह 5 राज्यों में सत्ता में आ गई है, और इन राज्यों में मध्य प्रदेश, राजस्थान और पंजाब जैसे राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण और बड़े राज्य भी शामिल हैं। यहां तक कि महाराष्ट्र जैसे महत्वपूर्ण राज्य की सत्ता में भी कांग्रेस साझेदार हो गई है।

अगर इसी तरह एक के बाद एक राज्य भाजपा के हाथ से खिसकता रहेगा और आगे दिल्ली की तरह उसकी उम्मीदों पर पानी फिरता रहेगा तो मोदी युग के अवसान की बात तो उठेगी ही साथ ही उसका राज्यसभा में अपने दम पर बहुमत जुटाने का सपना अधूरा ही रह जाएगा। 

 
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