नेहरू बनाम मोदी और चीन-1: आजाद भारत के रक्षामंत्री की वो गलतियां जिनसे देश हार बैठा 1962 की जंग

Dayashankar shuklaदयाशंकर शुक्ल सागर Updated Tue, 30 Jun 2020 11:07 AM IST
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लेफ्टिनेंट जनरल बने बीएम कौल अकेले ऐसे जनरल थे जिनकी फौज सीमा पर चीनियों से लोहा ले रही थी- सांकेतिक तस्वीर
लेफ्टिनेंट जनरल बने बीएम कौल अकेले ऐसे जनरल थे जिनकी फौज सीमा पर चीनियों से लोहा ले रही थी- सांकेतिक तस्वीर - फोटो : ट्विटर

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सार

  • कृष्ण मेनन का शुरू में भारत की सक्रिय राजनीति से कोई लेना-देना नहीं था।
  • मशहूर लेखक पत्रकार खुशवंत सिंह ने मेनन के साथ लंदन में काम किया था।
  • थिम्मैया भी आजादी की लड़ाई में कूदना चाहते थे लेकिन मोतीलालजी ने मना कर दिया।

विस्तार

ये कहानी है 1962 के रक्षा मंत्री यानी डिफेंस मिनिस्टर कृष्ण मेनन और चीन से मोर्चा लेने वाले लेफ्टिनेंट जनरल बीएम कौल की है। भारत के इन नेताओं का जिक्र मैं इसलिए कर रहा हूं ताकि आप समझें कि जब हम चीन से हारे तो देश की हिफाजत कैसे लोगों के हाथों में थी। 
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ये सब नेहरू सरकार खास चेहरे थे। और इसी के बल पर ये देश के इतने ऊंचे ओहदों पर पहुंच गए थे। इनके बारे में लेख में दी गई हर सूचना, हर तथ्य प्रामाणिक स्रोतों पर आधारित है, क्योंकि जो तथ्य मैं इस लेख में लिखने जा रहा हूं नई पीढ़ी को बेहद अविश्वसनीय लग सकती है, क्योंकि 'कॉमरेड' कृष्ण मेनन ऐसे रक्षा मंत्री थे कि चीनी सेना लद्दाख सरहद पर कब्जा किए बैठी थी और वे पाकिस्तान की सीमा पर सैनिक सजा रहे थे। 
क्योंकि उनकी गहरी मान्यता थी कि 'साम्राज्यवाद' विरोधी चीन भारत पर कभी हमला नहीं कर सकता। इसी तरह एक दर्जन से ज्यादा योग्य सेना अफसरों को 'लांघ' कर लेफ्टिनेंट जनरल बने बीएम कौल अकेले ऐसे जनरल थे जिनकी फौज सीमा पर चीनियों से लोहा ले रही थी जिसे वह नई दिल्ली के अपने आवास में बिस्तर पर लेटे उन्हें ऑर्डर दे रहे थे। 
ये युद्ध था या कोई मजाक। आप खुद फैसला कीजिए, तो इस किस्से को शुरू से शुरू करते हैं। कृष्ण मेनन से, ये जनाब इस देश के अकेले रक्षामंत्री थे, जिनकी नेतृत्व में आजाद भारत पहली बार किसी देश से जंग हार गया। ये अकेली ऐसी जंग थी जिसमें भारत की सेना नहीं हारी थी बल्कि देश के दंभी, राजनेताओं और कूटनीतिज्ञों की टोली ने चीन के सामने घुटने टेक कर देश को कलंकित किया था। 

कृष्ण मेनन का शुरू में भारत की सक्रिय राजनीति से कोई लेना-देना नहीं था। न देश की आम जनता से उनका कोई दूर-दूर तक कोई नाता था और न ही देश की आजादी की लड़ाई से उनकी काबिलियत सिर्फ इतनी थी कि वे नेहरू के पुराने दोस्त थे। 

पढ़ने लिखने वाले आदमी थे नेहरूजी, साहित्य प्रेमी थे, लेखक थे और मेनन लंदन में रहकर उनके लिखे को सारी दुनिया में प्रचारित प्रसारित करते चाहे वह 'ग्लिंप्सेज ऑफ़ वर्ल्ड हिस्ट्री' हो या 'डिस्कवरी ऑफ इंडिया' या उनकी 'एन ऑटोबायोग्राफी' हो। 
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