अंतरराष्ट्रीय बाल पुस्तक दिवस विशेष: किताबें तलाशता बचपन 

shashank dwivediशशांक द्विवेदी Updated Thu, 02 Apr 2020 12:30 PM IST
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मां-बाप के पास समय ही नहीं है कि बच्चों में पढ़ने-लिखने की आदतें डालें
मां-बाप के पास समय ही नहीं है कि बच्चों में पढ़ने-लिखने की आदतें डालें - फोटो : पीटीआई
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कुछ दशकों पहले तक बच्चों के हाथ में किताबें हुआ करती थीं, अब उनके हाथों में अक्सर मोबाइल या टीवी रिमोट दिखता है, वह कंप्यूटर पर गेम खेलते नजर आते हैं। वर्तमान हालात ये हैं कि बच्चे कोर्स की किताबें के अलावा शायद ही कुछ पढ़ते हों। यह एक बेहद चिंता का विषय है। अस्सी और नब्बे के शुरूआती दशक को बच्चों की रीडिंग हैबिट के लिहाज से स्वर्णिम युग कहा जा सकता है। उस समय टीवी और कॉर्टून चैनल की मौजूदगी काफी कम थी। असल में तकनीक ने बच्चों की मौलिकता को प्रभावित किया है ।

संयुक्त राष्ट्र की पहल पर दो अप्रैल को दुनिया भर में अंतरराष्ट्रीय बाल पुस्तक दिवस मनाया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य किताबों से बढ़ती बच्चों की दूरियों को कम करना है । किताबें ही लोगों की सच्ची दोस्त होती हैं। इन्हीं किताबों से अर्जित किया गया ज्ञान भविष्य में आगे की राह दिखाता है। इसकी शुरुआत बचपन से ही होती है, लेकिन आज के समय में बच्चों और साहित्य के बीच दूरियां बढ़ती जा रही हैं।  पहले गर्मी की छुट्टियों में बच्चे कॉमिक्स खरीदने की जिद किया करते थे।

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अखबार वाले से कहकर महीने में एक बार या 15 दिनों में आने वाली कॉमिक्स का इंतजार करते थे और जैसे ही कॉमिक्स आती थी अगले दिन ही उसे पढ़कर खत्म कर जाते थे। यहां तक कि दुकानों से किराए पर कॉमिक्स खरीदकर भी पढ़ते थे। धीरे-धीरे समय के साथ वीडियो गेम और कम्प्यूटर गेम्स और मोबाइल का चलन बढ़ता गया और अब बच्चे कॉमिक्स कि दुनिया से दूसरी तरफ मुड़ने लगे।  

 
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