अंतरराष्ट्रीय संसदीय दिवस: भेदभाव से परे जनता के प्रति अपनी जवाबदेही बनाए रखे संसद

Suraj Mohan Jhaसूरज मोहन झा Updated Tue, 30 Jun 2020 01:28 PM IST
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भारतीय लोकतंत्र में संसद जनता की सर्वोच्च संस्था है, इसी के माध्यम से आम लोगों की संप्रभुता को अभिव्यक्ति मिलती है।
भारतीय लोकतंत्र में संसद जनता की सर्वोच्च संस्था है, इसी के माध्यम से आम लोगों की संप्रभुता को अभिव्यक्ति मिलती है।

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संसद का मजबूत होना लोकतंत्र की आधारशिला होती है। संसद ही देश के लोगों की आवाज का प्रतिनिधित्व करती है। संसद सदन में चर्चा के बाद कानून को पारित करती है और कानूनों और नीतियों को लागू करने के लिए बजट का आवंटन भी करती है। संसद ही सरकार को जनता के प्रति जवाबदेह भी बनाती है।
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संसद यह भी सुनिश्चित करने का काम करती है कि जो भी नीतियां संसद या सरकार द्वारा बनाई जाती हैं उससे सभी देशवासियों को लाभ मिलें विशेषकर समाज के वंचित वर्ग के लोगों को वो तमाम सरकारी योजनाओं का लाभ मिलें जो उनके नाम पर बनाई जाती हैं।
भारतीय लोकतंत्र में संसद जनता की सर्वोच्च संस्था है। इसी के माध्यम से आम लोगों की संप्रभुता को अभिव्यक्ति मिलती है। संसद ही इस बात का प्रमाण है कि हमारी राजनीतिक व्यवस्था में जनता सबसे ऊपर है,जनमत सर्वोपरि है। संसदीय शब्द का अर्थ ही ऐसी लोकतंत्रात्मक राजनीतिक व्यवस्था है जहां सर्वोच्च शक्ति जनता के प्रतिनिधियों के उस निकाय में निहित है जिसे हम संसद कहते हैं।
भारत के संविधान के अनुसार संघीय विधानमंडल को संसद कहा गया है। संसद ही वह धुरी है, जो देश के शासन की नींव है। भारतीय संसद राष्ट्रपति और दोनों सदनों राज्य सभा और लोक सभा से मिलकर बनी है।

संसद की इसी महत्ता को समझते हुए हर साल 30 जून को अंतरराष्ट्रीय संसदीय दिवस मनाया जाता है। 30 जून को 1889 में अंतर-संसदीय संघ की स्थापना हुई थी और इसी दिन को साल 2018 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने अंतरराष्ट्रीय संसदीय दिवस मनाने का फैसला एक प्रस्ताव के माध्यम से किया। अंतर-संसदीय संघ का उद्देश्य पुरी दुनिया में शांति एवं सहयोग के साथ संसदीय संवाद को कायम करते हुए लोकतंत्र को मजबूत बनाना है। 

अंतर-संसदीय संघ अपने इसी लक्ष्य की प्राप्त करने के लिए सभी देशों की संसद तथा सांसदों के बीच समन्वय और अनुभवों के आदान प्रदान को प्रोत्साहित करता है। अंतर-संसदीय संघ मानवाधिकारों की रक्षा और संवर्धन में योगदान देने के साथ ही प्रतिनिधि संस्थाओं के सुदृढ़ीकरण तथा विकास में भी अपना योगदान देता रहता है। दुनिया के सभी देशों के चुने हुए जनप्रतिनिधियों को एक ही छत के नीचे लाने की पहल 1870-80 के दशक में शुरू हुई। 

जून, 1888 में अमेरिकी सीनेट ने अन्य देशों के साथ संबंधों को परिभाषित करने वाली कमेटी के प्रस्तावों को स्वीकार करने का फैसला किया और इसकी प्रतिक्रिया में फ्रांस के चैंबर ने फ्रेडरिक पेसी के प्रस्तावों पर बहस करने को स्वीकृति प्रदान की, तो शांति बहाली के लिए ब्रिटिश सांसद विलियम आर क्रेमर ने फ्रेडरिक पेसी को चिठ्ठी लिखकर एक संयुक्त बैठक रखने का प्रस्ताव दिया। 

31 अक्टूबर 1888 को यह बैठक हुई और इसके परिणाम काफी सकारात्मक निकले। इसी उपलब्धि के संदर्भ में ही अंतर-संसदीय संघ की स्थापना 1889 में हुई। अंतर-संसदीय संघ का मुख्यालय जिनेवा में है जो स्विट्जरलैंड में स्थित है। अंतर-संसदीय संघ सभी देशों के संसदों का वैश्विक संगठन है। 
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