क्या फांसी की सजा बलात्कार जैसी घृणित मानसिकता का स्थाई निदान है?

Archna Tripathiअर्चना त्रिपाठी Updated Sat, 28 Mar 2020 12:03 PM IST
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फांसी की सजा बलात्कारी मानसिकता का निदान नहीं है
फांसी की सजा बलात्कारी मानसिकता का निदान नहीं है - फोटो : Social Media

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'पूर्ण न्याय' स्त्री के पक्ष में नहीं के बराबर है। हमारे समाज की संरचना ऐसी है कि बलात्कार से पीड़ित या अन्य कारणों से भी पीड़ित स्त्री की न्याय की मांग शक से शुरू होकर अंततः फरियाद में तब्दील हो जाती है। निर्भया के माता पिता को अंततः रोते कलपते उस फरियाद से थोड़ा सुकून मिला है। पर ये क्षणिक सुकून है। निर्भया का बलात्कार हुआ। बेदम परिस्थितियों में उसने कहा-

मुझे जीना है मां। मां मुझे बचा लो

वह बच जाती और फिर जिन्हें सजा मिलनी चाहिए उनकी हिमायत होते देखती तो और मर जाती। अपने माता-पिता की ही तरह, जो जीते नहीं रोज-रोज मरते रहे हैं।
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हमारे मुताबिक कैसी सजा मिलनी चाहिए, क्या होना चाहिए, यह तय करते वक्त हमने एक बार भी न सोचा वो बलत्कृता के माता-पिता हैं, जिन्होंने अपनी बेटी को अपने सामने कराहते, दम तोड़ते देखा है, जिन्हें थोड़ा ही सही सुकून तभी मिलता जब बलात्कारियों को उचित सजा मिलती।
हम सिर्फ फांसी के खिलाफ होते तो एक बात थी, लेकिन बहुसंख्यक उन बलात्कारियों की हिमायत करते दिखे। समाज के इस रूप को देखकर चिंतित होना लाजिमी है। ऐसी घटनाओं पर कड़ी से कड़ी सजा तो होनी ही चाहिए पर फांसी की सजा पर सोचना होगा।
दरअसल, फांसी की सजा बलात्कारी मानसिकता का निदान नहीं है। सजा की जड़ में जाकर देखना होगा कि इससे उन अराजक विचारधाराओं पर रोक लग रही है या फिर बलात्कारी उन्हें छुपाने के लिए नए हथकंडे भी अपना रहा।

इस नाते देखा जाए तो हैदराबाद की घटना हमारे सामने है और इससे यह साबित हो चुका है फांसी इस सड़ी हुई और लिजलिजी मानसिकता का निदान नहीं। दरअसल यह एक मानसिक रोग है जो बचपन से ही लड़का लड़की के भेदभाव से शुरू होकर  उस अजीब सामाजिक संरचना में खत्म होता है। उचित शिक्षा के साथ-साथ ओपन सेक्स शिक्षा की बहुत जरूरत है हमारे समाज में। तभी शायद ये मानसिक स्खलन कुछ हद तक ठीक हो। 

अपराधी का अपराध सिद्ध होने के बाद भी इस देश में उचित निर्णय नहीं लिए जाते, जो कि दुःख की बात है और यही कारण है, जो महत्वपूर्ण निर्णय में बाधक भी हैं। जब ऐसी बदतर स्थिति से समाज गुजरता है तो इसी समाज के विभिन्न रूप सामने आते हैं जैसे-
  • बिना अपराध सिद्ध हुए एनकाउंटर पर खुशी मनाना।
  • वकीलों की एक महती भूमिका होते हुए भी वकीलों द्वारा अपने अधिकारों का गलत उपयोग करना, जहां उसे गलत होते भी जीतना ही सही लगे। 
  • अपनी अपनी नैतिक जिम्मेदारी से दूर भागना।
इसके समाधान की स्थिति पर यदि विचार किया जाए तो-
  • सभ्य समाज में जीवन जीने से लेकर बातों का चुनाव, विचार, अपराध के दंड, स्त्री पुरुष के जीवन का भयानक गैप सबकुछ सामान्य करने के नियम तय होने चाहिए। 
  • जांच पड़ताल के बाद अपराधी को दंड दिया जाए। जब अपराधी का अपराध साबित हो जाए तो उचित दंड विधान तत्काल तय किए जाएं। इनमें देरी न हो।
  • कुल मिलाकर यदि आजीवन कारावास भी हो तो इन जैसों के लिए वहां भी कड़ी सजा हो।

निर्भया ब्लात्कार कांड के निर्णय में देरी हुई। लेकिन कुछ एक महत्वपूर्ण कमेटी भी बनी। उस पर व्यापक तौर पर सिरियसली काम भी पहली बार शुरू हुआ जैसे- जस्टिस वर्मा कमेटी, जिसे स्त्री की सारी प्रताड़नाओं को ध्यान में रखकर बनाई गई। 2013 में क्रिमिनल लॉ (अमेंडमेंट) एक्ट में उन सारी बातों को नजरंदाज किया गया जो कि स्त्री पक्ष को लेकर जरूरी थीं। जैसे 'यौन हिंसा' शब्द जो सारी प्रताड़नाओं का एक पारिभाषिक शब्द बन जाए, ऐसा एक्ट के तहत तय किया गया, जो कि ठीक नहीं था। 

जस्टिस वर्मा कमेटी जो कि लगातार सक्रिय रही। उसने ये बात मानने से इनकार किया और भारत में बलात्कार जैसे घिनौने अपराध की सजा तय करने, कानून बनाने में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका उभरकर सामने आई। जिसमें मैरिटल रेप से लेकर तमाम बातों को गंभीरता से लिया गया। वर्मा कमेटी ने किशोरों की परिभाषा में तब्दीली न करने की सलाह दी और देश भर से लोगों से सुझाव मांगे। लीला सेठ और गोपाल सुब्रह्मण्यम वाली समिति को हजारों सुझाव हर भाषा में मिले। बहुत से सुझावों पर अमल भी हुआ। 

और ऐसा इस लोकतांत्रिक देश में पहली बार संभव हुआ। इस घटना के बाद लोगों में पहली बार इस कृत्य पर तन्द्रा टूटी और गंभीरता से बात हुई। पहली बार इस देश में महिला जजों की मांग की गई, जिससे पीड़िता खुलकर अपनी बात रख सके। 

इस विविधता, विभिन्नता वाले देश में एक तरफ इस गंभीर मुद्दे पर चर्चा कर इसका समाधान ढूंढा जा रहा था, वहीं इस देश के अन्य इलाकों में बलात्कारी धड़ल्ले से महिलाओं को शिकार बनाते रहें। सैकड़ों घटनाएं सामने आती रहीं, हजारों दबा दी गईं। 
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