झारखंड से कई संदेश निकल रहे हैं भाजपा के लिए, कहीं हाशिए पर ना चले जाए पार्टी

Ajay Khemariyaअजय खेमरिया Updated Wed, 25 Dec 2019 10:11 AM IST
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भाजपा को अपनी कार्यप्रणाली को लेकर सोचना होगा।
भाजपा को अपनी कार्यप्रणाली को लेकर सोचना होगा। - फोटो : Amar ujala

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अबकी बार 65 पार झारखंड में, हरियाणा और छत्तीसगढ़ में 75 पार, मप्र में 200 पार,राजस्थान में 150 पार, महाराष्ट्र में 200 पार। यह नारे बीजेपी ने राज्यों के विधानसभा चुनाव जीतने के लिए गढ़े थे लेकिन इनमें से किसी भी राज्य में पार्टी इन महत्वाकांक्षी आंकड़े के आसपास भी नही पहुंच पाई। दो वर्ष पहले देश की 71 फीसदी जनता पर जिस पार्टी का राज था वह अब घटकर 31 फीसदी पर आ गया है।
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राजनीतिक विश्लेषकों की नजर में यह मोदी अमित शाह के जनप्रभुत्व के उतार की शुरुआत है। वैसे  इसी बात को लोकसभाक्षेत्र के हिसाब से देखा जाए तो इन राज्यों में विपक्षी दल कहीं टिकते हुए नजर नहीं आते हैं। और इसे आप दोनों नेताओं के निर्णायक उतार से सीधे सयुंक्त नहीं कर सकते। झारखंड की करारी शिकस्त के साथ ही यह सवाल भी उठने लगा है कि क्या बीजेपी नेतृत्व और इसके कैडर के बीच कोई वैचारिक विचलन खड़ा होने लगा है?
क्यों राज्यों में हार रही है बीजेपी? 
सवाल यह  है कि जिस विचार और वैकल्पिक राजनीति के लिए बीजेपी को खड़ा किया गया है उसके साथ मोदी 2.0 सरकार द्वारा व्यापक प्रतिवद्धता दिखाने के बाबजूद राज्यों में बीजेपी की लगातार हार के जमीनी निहितार्थ क्या हैं? गहराई से विश्लेषण किया जाए तो समझा जा सकता है कि देश का मतदाता अब राष्ट्रीय और स्थानीय राजनीति को एक ही चश्में से नही देख रहा है।

इसे भारत में संसदीय लोकतंत्र के बदलते या यूं कहा जाए परिपक्व होते' मतदान व्यवहार' के रूप में मान्यता दिए जाने की आवश्यकता है। झारखंड की हार हो या मप्र ,छत्तीसगढ़, राजस्थान की। सभी राज्यों में एक बात समान है वह यह कि लोग राजकाज से जुड़ी दैनंदिन समस्याओं और अनुभव को अपने अलग अलग  मतदान व्यवहार के प्रमुख कारक के रूप में स्थापित कर रहे हैं।
 
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