मध्यप्रदेश का संदेश, खुद को बदले कांग्रेस, सिंधिया परिवार की तीसरी पीढ़ी भी चढ़ी बगावत की सीढ़ी

Rajesh Badalराजेश बादल Updated Tue, 10 Mar 2020 10:54 PM IST
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ज्योतिरादित्य सिंधिया
ज्योतिरादित्य सिंधिया - फोटो : PTI

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मध्यप्रदेश में सिंधिया परिवार की तीसरी पीढ़ी ने भी बगावत का रास्ता अपनाया। पहले दादी विजया राजे सिंधिया ने कांग्रेस छोड़ी, फिर पिता माधवराव ने विकास कांग्रेस बनाई और अब ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अलग राह पकड़ी। दादी का संविद सरकार बनाने का अनुभव खराब रहा। जिसको मुख्यमंत्री बनाया, वह दो बरस के भीतर ही कांग्रेस में लौट गया।
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संविद याने संयुक्त विधायक दल की सरकार गिर गई। गोविंद नारायण सिंह का अपने विधायकों के साथ पार्टी छोड़ने का निर्णय राजनीतिक नजरिए से भौंथरा हथियार साबित हुआ। पिता माधवराव सिंधिया को अर्जुन सिंह खेमे ने बहुत सताया, लेकिन उन्होंने बुरे वक्त में पार्टी नहीं छोड़ी। वे तो पीवी नरसिंह राव की शतरंज का मोहरा बन गए थे।
ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भारतीय जनता पार्टी का दामन थामा जब वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से निराश हो चुके थे।लेकिन यह कहना भी ठीक नहीं कि कांग्रेस ने ज्योतिरादित्य के लिए कुछ नहीं किया। पिता की राजनीतिक जमीन पर उगे बेटे को केंद्रीय मंत्री पद मिला, राष्ट्रीय महासचिव का पद मिला, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र चुनाव में बड़ी जिम्मेदारी मिली मगर वे अपने को साबित नहीं कर पाए।
अपने निर्वाचन क्षेत्र से ही हार गए। ऐसी नौबत तो उनके पिता के सामने कभी नहीं आई। उन्होंने तो निर्दलीय रहते भी हार का मुंह नहीं देखा। यहां तक कि अटल बिहारी वाजपेयी जैसे दिग्गज को उनके सामने पराजय का सामना करना पड़ा। इसका क्या अर्थ लगाया जाए? ज्योतिरादित्य बुरे वक्त की भट्टी में कुंदन की तरह नहीं निखरे। दबाव में बिखर जाने की बीमारी का शिकार हो गए।
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कांग्रेस भी कम जिम्मेदार नहीं

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