मध्य प्रदेश: एक बार फिर चक्रवर्ती हुए शिवराज, लेकिन बेहद कठिन होगी चौथी पारी 

Rajesh Badalराजेश बादल Updated Tue, 24 Mar 2020 12:32 PM IST
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शिवराज के लिए एक नई कई चुनौतियां होंगी सामने
शिवराज के लिए एक नई कई चुनौतियां होंगी सामने - फोटो : SELF
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मध्य प्रदेश में एक बार फिर शिवराज सिंह चौहान। मुख्यमंत्री के रूप में चौथी पारी। बचे हैं क़रीब क़रीब साढ़े तीन साल। तीसरी पारी शिवराज ने बेशक़ बड़े तनाव में खेली थी और तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों में वे अंत तक पिच पर डटे रहे। पार्टी के अंदर अपने सारे विरोधियों को चित करते हुए।वह भी तब जबकि उनके सारे आलोचक बीजेपी आला कमान के क़रीब तथा भरोसे मंद थे।
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शिवराज ने किस किसको ख़फ़ा नहीं किया। सूची लंबी है - उमाभारती , प्रभात झा, नरेंद्र सिंह तोमर ,कैलाश विजयवर्गीय ,राकेश सिंह ,नरोत्तम मिश्रा ,लक्ष्मी नारायण शर्मा ,रघुनन्दन शर्मा और गोपाल भार्गव जैसे अनेक नाम। चौथी बार उनके मुखिया बनने के समय भी कमोबेश यही प्रतिस्पर्धी थे। लेकिन इस बार आलाकमान ने उनका ही चुनाव किया। इस बार उन्होंने कमलनाथ जैसे दिग्गज की सरकार गिराकर बीजेपी की सरकार बनाने में जो भूमिका निभाई है ,उसने उनके आलोचकों की बोलती बंद कर दी है। आज की तारीख़ में भारतीय जनता पार्टी के भीतर इतना मज़बूत प्रोफाइल किसी और नेता का नहीं है।
   
लेकिन पिछली तीन पारियों से यह पारी सर्वथा भिन्न है। इस बार उन्होंने कांग्रेस की तलवार से अपने विरोधियों को पटखनी दी है। ज्योतिरादित्य सिंधिया को साथ लेकर उन्होंने अपने दलीय सहयोगियों/आलोचकों को साफ़ सन्देश दे दिया है कि राष्ट्रीय स्तर पर भले ही उनकी ढाल के रूप में सुषमा स्वराज और अरुण जेटली नहीं रहे मगर अब सिंधिया का साथ उनके राजनीतिक भविष्य को संरक्षित करने वाला हो सकता है।

फ़िलहाल तो नहीं ,पर आने वाले दिन शिवराज के लिए निस्संदेह चुनौती भरे होने वाले हैं। उनके लिए आने वाले दिनों में विधानसभा के चौबीस स्थानों पर होने वाले उप चुनाव सबसे बड़ी परीक्षा होंगे। न केवल शिवराज ,बल्कि सिंधिया का भी वे भविष्य सुरक्षित करेंगे। इसकी एक वजह यह भी है।

चंबल और मध्य भारत इलाक़े में विधानसभा की अनेक सीटें ज्योतिरादित्य के असर वाली हैं या यूंं कहें कि सिंधिया राजपरिवार के प्रभाव क्षेत्र की हैं। महल आगे आगे चलता है ,पार्टी पीछे पीछे। चाहे वह कांग्रेस हो अथवा भारतीय जनता पार्टी। पिछले चालीस बरस से यहांं की सियासत कांग्रेस केंद्रित थी। माधवराव सिंधिया के रहते महल-कांग्रेस ही पनपी। यद्यपि विजयाराजे सिंधिया उन दिनों जीवित थीं मगर वे बेटे की राह में रोड़ा कभी नहीं बनीं। ज्योतिरादित्य के बीजेपी में आते ही महल-कांग्रेस के कट्टर समर्थक धर्मसंकट में हैं।
 
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