लंबे संघर्ष के बाद बोडो जनजातीय को मिला हक

Ravishankar Raviरविशंकर रवि Updated Tue, 28 Jan 2020 04:38 PM IST
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अमित शाह-एके भल्ला
अमित शाह-एके भल्ला - फोटो : ANI

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एक लंबे आंदोलन के बाद असम के ब्रह्मपुत्र घाटी में फैले बोडो जनजातीय को आखिर अपना हक मिल गया। वैसे उनका आंदोलन अलग राज्य के लिए आरंभ हुआ था, लेकिन 27 जनवरी को केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह, असम के मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल तथा बोडोलैंड क्षेत्रीय परिषद के अध्यक्ष हाग्रामा मोहिलारी की मौजूदगी में हुआ केंद्र सरकार, असम सरकार, बोडोलैंड क्षेत्रीय परिषद तथा उग्रवादी संगठन सभी नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट आफ बोड़ोलैंड के सभी चार गुटों  एवं ऑल बोडो स्टूडेंट्स यूनियन के बीच हुआ नया बोडो समझौते से बहुत हद तक उनकी मांगे पूरी हो गई हैं। इसलिए यह माना जा रहा है कि अलग बोडो राज्य की मांग समाप्त हो जाएगी और असम का विभाजन नहीं होगा।

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समझौते से खुश सर्वानंद सोनोवाल ने बताया कि असम का विभाजन हुए बिना बोडो जनजातीय लोगों की मांगों को मान लिया गया है। इस समझौते से असम का विभाजन नहीं होगा और बोडो समस्या का समाधान हो जाएगा।

वैसे अलग बोडो राज्य की मांग 1966 में प्लेन ट्राइबल काउंसिल ऑफ असम की अगुवाई में आरंभ हो गई थी। तब ‘उदयाचल’ नामक अलग राज्य के गठन के लिए तत्कालीन राष्ट्रपति जाकिर हुसैन को एक स्मारपत्र भी सौंपा गया गया था। बाद में उग्रवादी हिंसा आरंभ हो गई। उसी बीच ऑल बोडो स्टूडेंट्स यूनियन का गठन हुआ और इसके अध्यक्ष उपेन ब्रह्म ने असम को 50-50 बांटने के लिए लंबा आंदोलन किया।
इधर, सरकारी दमन बढ़ा तो एक के बाद दूसरे उग्रवादी संगठन का जन्म होने लगा। पहले बोड़ोलैंड सिक्यूरिटी फोर्स (बीएसएफ) नामक उग्रवादी संगठन का जन्म हुआ। 20 फरवरी, 1993 को भारत सरकार, असम सरकार ऑल बोड़ो छात्रसंघ (आब्सू) और बोड़ो पीपुल्स एक्शन कमिटी के बीच समझौता हुआ था। जिसके अंतर्गत बोड़ोलैड स्वायत्त परिषद का गठन हुआ। उसके बाद बीएसएफ ने हथियार डाल दिया। लेकिन गुटीय तनाव बढ़ा तो नए उग्रवादी संगठन नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड का गठन हुआ। उसमें भी विभाजन हुआ और हाग्रामा मोहिलारी के नेतृत्व में एक नय संगठन- बोडो लिबरेशन टाइगर्स का जन्म हुआ। इन दोनों संगठनों के बीच गुटीय हिंसा में सैंकड़ों लोग मारे गए। उतार-चढ़ाव के बीच आंदोलन चलता रहा।

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