एक शांत टापू से उठ रहीं अशांति की उग्र लहरें

राजेश बादल Updated Thu, 06 Jun 2019 11:45 PM IST
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श्रीलंका
श्रीलंका - फोटो : सोशल मीडिया

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समंदर के बीच बसे इस शांत और सुंदर सिंहल टापू से इन दिनों अशांति की तेज लहरें उठ रही हैं। इक्कीस अप्रैल को ईस्टर के रोज चर्च और होटलों पर आत्मघाती हमलों ने द्वीप के बाशिंदों को हिला कर रख दिया है। कभी हिंदुस्तान से जाकर बसे सिंहल बौद्ध, तमिल हिंदू और मुसलमान यक ब यक अपने रिश्तों को असंतोष और संदेह के बुखार से तपता महसूस कर रहे हैं। बहुसंख्यक बौद्धों के तेवर देखते हुए अल्पसंख्यक हिंदू और मुसलमान एक मंच पर खड़े हैं। मुल्क के अंदरूनी सामाजिक ढांचे में यह नौबत पहली बार आई है। तमिलईलम के नाम पर सिंहली और तमिल हिंदू पहले भी बरसों तक टकराते रहे हैं, लेकिन अब कट्टरपंथी बौद्धों ने अल्पसंख्यक हिंदुओं और मुस्लिमों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।
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असल में एक बौद्ध संन्यासी अथुरालिये रत्ना का आमरण अनशन इस पूरे घटनाक्रम की जड़ में है। रत्ना प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे की पार्टी यूएनपी से सांसद भी हैं। संन्यासी होने के नाते उनकी धार्मिक पहचान है और सारे बौद्ध संगठन उन्हें समर्थन देते हैं। पिछले सप्ताह शुक्रवार को वे कैंडी के बौद्ध मंदिर में आमरण अनशन पर बैठ गए थे। उनका आरोप है कि ईस्टर हमलों के पीछे दो मुस्लिम गवर्नरों और एक मंत्री का हाथ है।
उनके तार आईएस से जुड़ते हैं इसलिए उन्हें हटाया जाए। अनशन को व्यापक समर्थन मिला। बुद्धिस्ट पावर फोर्स के एक और कट्टर भिक्षु गलागोडा ज्ञानसारा भी रत्ना के साथ आ गए। बता दें कि ज्ञानसारा हाल ही में छह साल तक जेल में बंद थे। उन पर सर्वोच्च न्यायालय की अवमानना का आरोप था। राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरिसेना ने उन्हें इस आरोप से माफी दे दी और वे रिहा हो गए।
रविवार को ज्ञानसारा ने सरकार को अल्टीमेटम दिया कि अगर इन तीन मुस्लिम राजनेताओं को नहीं हटाया गया तो पूरे देश में उग्र आंदोलन होगा। इस दरम्यान भी अनेक शहरों में तेज प्रदर्शन हुए। दो दिन मुस्लिम आबादी ने दहशत में काटे। चर्च पर हमले के बाद भी मुस्लिमों के घरों और कारोबारी स्थानों को निशाना बनाया गया था। सोमवार की दोपहरी में दोनों मुस्लिम गवर्नरों ने पद छोड़ दिया, उनके इस्तीफे मंजूर कर लिए गए। इसके बाद रत्ना ने भूख हड़ताल समाप्त कर दी। मंगलवार को मंत्रिपरिषद में शामिल सभी नौ मुस्लिम केबिनेट, राज्य और उप मंत्रियों ने भी त्यागपत्र दे दिए।

हालांकि अन्य मंत्रियों पर कोई आरोप नहीं थे। मगर श्रीलंका मुस्लिम कांग्रेस के सांसद रउफ हकीम के मुताबिक देश में चल रहे मुस्लिम विरोधी आंदोलन को खत्म करना जरूरी है। मुसलमान अपने पर लग रहे आरोपों से मुक्त होना चाहते हैं। इस्तीफों के बाद सरकार निष्पक्षता से जांच कर सकेगी। हकीम का कहना है कि सरकार को उनके इस्तीफों से अस्थिरता का खतरा नहीं है। त्यागपत्र दे चुके सभी मंत्री संसद सदस्य के नाते सरकार के साथ हैं।

मुस्लिम मंत्रियों और गवर्नरों के त्यागपत्र के विरोध में तमिल हिंदू भी सामने आ गए हैं। तमिल नेशनल एलाइंस और तमिल प्रोग्रेसिव एलाइंस ने कहा कि वे सारे मुस्लिम मंत्रियों के साथ हैं। अगर सरकार बौद्ध संन्यासियों के दबाव में काम करेगी तो गौतम बुद्ध भी इस देश को नहीं बचा सकते। कल तक बौद्धों-सिंहलियों के निशाने पर तमिल हिंदू थे। आज मुस्लिम हैं। कल कोई और समुदाय भी हो सकता है। ऐसे में सारा संसार श्रीलंका को बौद्ध देश के तौर पर मंजूर नहीं करेगा। यह तो गौतम बुद्ध का अपमान है। वैसे समूचे राष्ट्र में मुस्लिमों के इस्तीफों की आलोचना हो रही है। नवसम समाज पार्टी ने तो बौद्ध सांसद अथुरालिये रत्ना को गिरफ्तार करने की मांग की है। उसका कहना है कि रत्ना ने देश में राजनीतिक अस्थिरता पैदा करने की कोशिश की है।

पार्टी ने तो यहां तक कहा कि आमरण अनशन दिखावा था और बौद्ध भिक्षु चोरी से भोजन ले रहे थे। श्रीलंका में त्यागपत्र देने वाले मुस्लिम मंत्रियों को मिल रहे व्यापक जन समर्थन को देखते हुए सभी बौद्ध संगठनों के महासंघ ने रक्षात्मक रवैया अख्तियार किया है। महासंघ ने सभी मुस्लिम मंत्रियों से इस्तीफे वापस लेकर अपना काम संभालने का अनुरोध किया है। महासंघ ने कहा है कि सभी जांच एजेंसियों को सहयोग करें। जो भी दोषी होगा, वह दंड पाएगा। यह देश के लिए कठिन समय है। ऐसे में सभी को साथ आतंकवाद से लड़ना चाहिए।

गौरतलब है कि इन दिनों प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे और राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरिसेना के रिश्ते अच्छे नहीं हैं। पूर्व राष्ट्रपति महिंद्रा राजपक्षे खुलकर राष्ट्रपति का साथ दे रहे हैं। दूसरी ओर प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे को तमिल हिंदुओं और मुस्लिम समुदाय का भी समर्थन हासिल है। ऐसे में जानकारों का एक वर्ग इस पूरे घटनाक्रम के पीछे महिंद्रा राजपक्षे का हाथ देख रहा है, जो हर हाल में विक्रमसिंघे को सत्ता से हटाना चाहते हैं।

राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि राजपक्षे ईस्टर पर हमलों का सियासी फायदा उठाना चाहते हैं। एक वर्ग तो यह भी मानता है कि रत्ना और ज्ञानसारा को खुश करके राजपक्षे और सिरिसेना श्रीलंका के बहुसंख्यक वोट बैंक को अपनी ओर खींचना चाहते हैं। संदर्भ के तौर पर बता दें कि प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे भारत के प्रति सहानुभूति रखते हैं, जबकि राजपक्षे का झुकाव चीन की ओर है।राजपक्षे के कार्यकाल में ही चीन को हंबनटोटा बंदरगाह सौंपा गया था। चीन ने महिंद्रा राजपक्षे के चुनाव का पूरा खर्च भी उठाया था।

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