PV Narasimha Rao: क्या यह पी.वी. नरसिंहा राव का ‘राजनीतिक पुनर्जन्म’ है?

अजय बोकिल Updated Tue, 30 Jun 2020 03:20 PM IST
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स्व. पी.वी. नरसिंहराव देश के उन प्रधानमंत्रियों  में हैं, जो  इतिहास पर अमिट छाप छोड़ गए- फाइल फोटो
स्व. पी.वी. नरसिंहराव देश के उन प्रधानमंत्रियों  में हैं, जो इतिहास पर अमिट छाप छोड़ गए- फाइल फोटो - फोटो : Social media

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सार

  • स्व. पी.वी. नरसिंह राव देश के उन प्रधानमंत्रियों  में हैं, जो ‘एक्सीडेंटली’ बने, लेकिन इतिहास पर अमिट छाप छोड़ गए।
  • पी.वी. नरसिंह राव निश्चित ही साहसी राजनेता थे। यह बात तो खुद डाॅ.मनमोहन सिंह ने स्वीकार की है।

विस्तार

देर से ही सही, इतिहास न्याय तो करता है। 28 जून को देश के प्रमुख अखबारों में जब पूर्व प्रधानमंत्री पी.वी.नरसिंह राव की 99 वीं जयंती पर श्रद्धांजलि स्वरूप फुल पेज के विज्ञापन देखे तो सुखद आश्चर्य के साथ लगा कि दुनिया में देर है, अंधेर नहीं।
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हैरानी की बात यह थी कि ये विज्ञापन उस कांग्रेस पार्टी ने नहीं दिए थे, जिसमें नरसिंह राव ने अपनी पूरी जिंदगी खपा दी थी,  बल्कि महज 20 साल पहले जन्मी और अब तेलंगाना में सत्तारूढ़ तेलंगाना राष्ट्र समिति ( टीआरएस) सरकार ने दिए थे। इसमें पी.वी. को ‘तेलंगाना का गौरव’ और ‘भारत की शान’ बताया गया था।
विज्ञापन में ‘भारत माता के परमप्रिय पुत्र को महा अभिवादन’ के साथ राज्य के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव ने प्रदेश में साल भर तक चलने वाले ‘नरसिंह राव जन्म शती समारोह’ की शुरुआत की घोषणा की। स्व. राव की जयंती पर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और सांसद राहुल गांधी ने भी श्रद्धांजलि तो दी, लेकिन उसमें सांत्वना भाव ज्यादा था, स्वीकार्यता का कम।
 
स्व. पी.वी. नरसिंहराव देश के उन प्रधानमंत्रियों  में हैं, जो ‘एक्सीडेंटली’ बने, लेकिन इतिहास पर अमिट छाप छोड़ गए। इस श्रेणी में राजीव गांधी, पी.वी.नरसिंह राव और डाॅ.मनमोहन सिंह को रखा जा सकता है। क्योंकि इन लोगों ने पीएम के बनने के लिए कोई अलग से जोड़ तोड़ नहीं की और न ही देश उन्हें ‘भावी प्रधानमंत्री’ के रूप में देखता था।

परिस्थितिजन्य मजबूरी ने उन्हें पीएम के तख्ते पर बिठाया और इस अवसर को उन्होंने ‘स्वर्णिम’ बनाने की पूरी कोशिश की। बिना इसकी चिंता किए कि भावी इतिहास उनके कामों का किस रूप में मूल्यांकन करेगा, किस रूप में उसे स्वीकार करेगा।
 
पी.वी. नरसिंह राव तो राजनेता होने के साथ-साथ बहुभाषी विद्वान भी थे। वे उस तेलंगाना ( पूर्व की हैदराबाद रियासत) क्षेत्र से आते थे, जो ‘एक भाषा-एक प्रांत’ की राजनीति के तहत पहले आंध्र प्रदेश का हिस्सा बना और बाद में क्षेत्रीय अस्मिता की राजनीति के चलते आंध्र से अलग होकर वापस तेलंगाना बना।
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