विज्ञापन

SC-ST एक्टः लेकिन दुरुपयोग कैसे रुकेगा? 

Satish Aliaसतीश एलिया Updated Mon, 10 Feb 2020 05:50 PM IST
विज्ञापन
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला तीन जजों की बैंच में दो-एक से आया है यानी सर्वसम्मत फैसला नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला तीन जजों की बैंच में दो-एक से आया है यानी सर्वसम्मत फैसला नहीं है। - फोटो : social media
ख़बर सुनें
पदोन्नति में आरक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट की दो टूक राय कि यह मौलिक अधिकार नहीं है को लेकर अपने ही एनडीए कुनबे में घिरने लगी मोदी सरकार को  दूसरे ही दिन सोमवार को केंद्र सरकार कोर्ट से राहत भरी खबर मिली है। अनुसूचित जाति जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के दुरुपयोग को रोकने के सुप्रीम कोर्ट के जिस आदेश को पलटने के लिए केंद्र सरकार ने दो साल पहले संसद में संशोधन कर जो बदलाव किए थे, अब कोर्ट ने भी उन्हें मान लिया है।
विज्ञापन
यानी एससी एसटी पर अत्याचार की शिकायत मिलने पर अब पहले की ही तरह तुरंत एफआईआर और गिरफ्तारी होना जारी रहेगा। कोर्ट ने पहले ऐसे मामलों में जांच के बाद एफआईआर और वरिष्ठ पुलिस अफसरों की सहमति का प्रावधान किया था। इसके खिलाफ देश भर में एससी एसटी संगठनों और राजनीतिक दलों ने हिंसक प्रदर्शन किए थे। इसके बाद सरकार को एससी एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम में 2018 में संशोधन किया था। इस संशोधन के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई थी।

जस्टिस भट्ट की राय महत्वपूर्ण                                                       
कोर्ट का यह फैसला तीन जजों की बैंच में दो-एक से आया है यानी सर्वसम्मत फैसला नहीं है। जस्टिस अरुण मिश्र, विनीत शरण और रवींद्र भट्ट में से भट्ट ने अपनी राय में लिखा है कि सभी नागरिकों को समान भाव से देखा जाना  चाहिए, ताकि भाईचारा बना रहे। इस राय को व्यापक दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह आम राय है। अन्य कई कानूनों की तरह एसटी एससी अत्याचार निवारण अधिनियम का भी दुरुपयोग होता रहा है। हालांकि यह भी सच है कि इस वर्ग को अब भी केवल इस वर्ग का होने के कारण अपमान और अत्याचार और अपमान झेलना पड़ता है।

इस देश का संविधान, कानून और राजनीति अब तक इन हालात को ज्यादा नहीं बदल पाए हैं। लेकिन इसके बावजूद इस कानून के दुरुपयोग के चलते कई निर्दोष प्रताड़ित हो जाते हैं। बिना जांच के लिए एफआईआर दर्ज होना और गिरफ्तारी होना बाद में निर्दोष साबित होने पर भी आधी सजा सरीखी हो ही चुकी होती है। यही वजह थी कि कोर्ट ने जांच का प्रावधान किया था। 

फ्लैश बैक 
20 मार्च 2018 को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के हो रहे दुरुपयोग के मद्देनजर सुप्रीम कोर्ट ने इस अधिनियम के तहत मिलने वाली शिकायत पर स्वत: एफआईआर और गिरफ्तारी पर रोक लगा दी थी। इसके बाद संसद में सुप्रीम कोर्ट के आदेश को पलटने के लिए कानून में संशोधन किया गया था। इसे भी सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी। अब पहले के मुताबिक ही एफआईआर दर्ज करने से पहले वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों या नियुक्त प्राधिकरण से अनुमति जरूरी नहीं होगी।            

राहत अदालत ही देगी
एससी एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम में एफआईआर और गिरफ्तारी में कोई राहत नहीं है, लेकिन फरार घोषित किएआरोपी को मामूली राहत की उम्मीद यह है कि उसकी अग्रिम जमानत कोर्ट से हो सकेगी, लेकिन तभी जब अदालत को यह लगे कि मामला प्रथम दृष्टया इस एक्ट के तहत केस नहीं बनता है। 
 
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें  [email protected] पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Spotlight

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Disclaimer


हम डाटा संग्रह टूल्स, जैसे की कुकीज के माध्यम से आपकी जानकारी एकत्र करते हैं ताकि आपको बेहतर और व्यक्तिगत अनुभव प्रदान कर सकें और लक्षित विज्ञापन पेश कर सकें। अगर आप साइन-अप करते हैं, तो हम आपका ईमेल पता, फोन नंबर और अन्य विवरण पूरी तरह सुरक्षित तरीके से स्टोर करते हैं। आप कुकीज नीति पृष्ठ से अपनी कुकीज हटा सकते है और रजिस्टर्ड यूजर अपने प्रोफाइल पेज से अपना व्यक्तिगत डाटा हटा या एक्सपोर्ट कर सकते हैं। हमारी Cookies Policy, Privacy Policy और Terms & Conditions के बारे में पढ़ें और अपनी सहमति देने के लिए Agree पर क्लिक करें।
Agree
Election
  • Downloads

Follow Us