सुशांत सिंह राजपूत और फिल्मी दुनिया: फ्राइडे पर निर्भर रहता है फिल्मी सितारे का भविष्य

Mukesh kumar singhमुकेश कुमार सिंह Updated Fri, 19 Jun 2020 05:28 PM IST
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फिल्म उद्योग एक पूरी तरह से असंगठित उद्योग है- सांकेतिक तस्वीर
फिल्म उद्योग एक पूरी तरह से असंगठित उद्योग है- सांकेतिक तस्वीर - फोटो : पेक्सेल्स

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सार

  • फिल्म उद्योग एक पूरी तरह से असंगठित उद्योग है।
  • फिल्म इंडस्ट्री को 'फ्राइडे टू फ्राइडे' इंडस्ट्री भी कहा जाता है।
  • फिल्म इंडस्ट्री में एक कहावत मशहूर है, 'रोज कुआं खोदो, रोज पानी पियो'।
  • जब तक फिल्म उद्योग के चेहरे से चमक दमक का नकाब नहीं उतरेगा, जब तक यहां से भय और अनिश्चितता का माहौल समाप्त नहीं होगा।

विस्तार

कभी आपने बहुत तेज रोशनी देने वाला बल्ब देखा है? इतनी तेज रोशनी की आंखें चुंधिया जाएं। सब कुछ रोशनी से सरोबार हो जाए। जो भी उसके दायरे में आए चमक जाए। लेकिन वह बल्ब जितनी तेज रोशनी देता है, उसके पीछे उतना ही घना अंधेरा होता है।
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लेकिन इस हकीकत को या तो वह बल्ब जानता है या उस बल्ब को बनाने वाला। बाकी लोग तो बस उस रोशनी में नहाते हैं और वाह-वाह करते हैं। फिल्म उद्योग भी ऐसी एक जगह है जिसकी चकाचौंध से पूरा देश सरोबार होता है, उस की चमक दमक से पूरा देश प्रभावित होता है लेकिन मेकअप पुते हुए चेहरों और टीवी तथा अवार्ड शोज में लगने वाले ठहाकों के पीछे की हकीकत केवल वही लोग जानते हैं जो इस उद्योग से जुड़े हुए हैं।
इसके उजाले की चकाचौंध इतनी ज्यादा है कि जब तक सुशांत सिंह राजपूत जैसा कोई प्रख्यात अभिनेता आत्महत्या नहीं कर लेता, कोई भी इसके पीछे झांकने की कोशिश नहीं करता।

फिल्म उद्योग एक पूरी तरह से असंगठित उद्योग है जहां किसी भी काम के लिए आपको किसी भी तरह की योग्यता की बाध्यता नहीं है। अन्य क्षेत्रों में काम पाने के लिए आपको एक निश्चित शैक्षणिक योग्यता या तकनीकी जानकारी की आवश्यकता होती ही होती है लेकिन यहां ऐसा कुछ नहीं है।

एक इंजीनियर भी अभिनेता बन सकता है, एक डॉक्टर भी बन सकता है, एक खदान मजदूर भी बन सकता है और एक भीख मांगने वाला भी बन सकता है। दूसरे क्षेत्रों में अनुभव का भी एक बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान होता है। आप जितने अनुभवी होते जाते हैं उतना ही आपके पद की ऊंचाई बढ़ती जाती है आपकी सैलरी बढ़ती जाती है लेकिन यहां ऐसा भी कुछ नहीं है।

हो सकता है आपको इसलिए काम ना मिले क्योंकि आप ज्यादा अनुभवी हैं। एक से एक सफल और अनुभवी निर्देशकों और अभिनेताओं के साथ आज काम करने को कोई तैयार नहीं है। यह भी हो सकता है कि आज आप यदि एक रुपए कमाते थे तो कल आपको 50 पैसे में ही काम करना पड़े, अर्थात् आप कभी निश्चिंत नहीं हो सकते कि अच्छा मैंने अब यह मुकाम तो हासिल कर लिया है तो अब मुझे यहां से आगे ही आगे जाना है।

आप कभी भी धड़ाम से जमीन पर आ सकते हैं और कभी भी आसमान पर पहुंच सकते हैं। इसीलिए फिल्म इंडस्ट्री को 'फ्राइडे टू फ्राइडे' इंडस्ट्री भी कहा जाता है। एक सफल फिल्म के साथ फ्राइडे को एक सितारा जन्म लेता है और अगले फ्राइडे को एक असफल फिल्म के साथ एक सितारा डूब जाता है और यही अनिश्चितता इस उद्योग से जुड़े लोगों के लिए सबसे घातक होती है।

दूसरे क्षेत्रों में आप साल या 2 साल में एक बार नौकरी के लिए इंटरव्यू देते हैं और हो सकता है सफल हों, हो सकता है असफल हों। अर्थात अगर आप असफल हो भी गए तब भी साल 2 साल के बाद आपको एक बार निराशा का मुख देखना पड़ता है लेकिन क्या आप जानते हैं कि एक एक्टर को एक रोल पाने के लिए कितनी बार असफलता का मुंह देखना पड़ता है? दर्जनों  या कभी-कभी सैकडों स्क्रीन टेस्ट देने के बाद किसी को एक रोल मिलता है।
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काम की अनिश्चितता, काम मिलने के बाद भी पैसे मिलेंगे या नहीं मिलेंगे इसका भय...

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