यूएस-तालीबान शांति समझौता बन सकता है भारत के लिए मुसीबत

Rajesh Badalराजेश बादल Updated Sat, 07 Mar 2020 12:42 PM IST
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दोहा में अमेरिका के शांति दूत जल्मय खालिजाद और तालिबान नेता मुल्लाह अब्दुल गनी बारादर हाथ मिलाते
दोहा में अमेरिका के शांति दूत जल्मय खालिजाद और तालिबान नेता मुल्लाह अब्दुल गनी बारादर हाथ मिलाते - फोटो : PTI

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तालिबान-अफगानिस्तान समझौता इस पहाड़ी देश के गले की हड्डी बन रहा है। शिया मुस्लिमों की एक रैली पर हमला इसका सुबूत है। इस्लामिक स्टेट ने इस हमले की ज़िम्मेदारी ली है। यानी यह संगठन भी शिया विरोधी है और तालिबान भी शियाओं को फूटी आंखों नहीं देखते। इसका अर्थ यह कि दोनों संगठनों में कहीं न कहीं अंतर संबंध है।
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इससे पहले तालिबान ने अफगानी फ़ौज पर यह कहते हुए हमला किया था कि उसने तो परदेसी सैनिकों को नहीं मारने का क़रार किया है। इसके बाद सोलह राज्यों में तालिबानी हमले हुए। इसके अलावा एक फुटबॉल स्टेडियम उड़ा दिया और एक महिला को पत्थरों से पीट कर मार डाला। इस तरह एक बार फिर अपने ढंग से इस्लामी सत्ता क़ायम करने की कोशिश।     
दरअसल, तालिबान -अमेरिकी क़रार से संशय भरे सवाल उभरते हैं। अव्वल तो यह कि अब तालिबान और अफगान सरकार के रिश्ते कैसे होंगे ? तालिबान ने यह समझौता कोई मनोरंजन के लिए नहीं किया है। वे हर हाल में सत्ता में भागीदारी चाहेंगे।
अमेरिकी बैसाखियां हट जाने के बाद अफगानिस्तान की अमेरिकी कठपुतली सरकार उन्हें कैसे रोकेगी? अपनी दम पर अगर वह तालिबान को रोकने में सक्षम होती तो फिर नाटो फ़ौज की ज़रूरत ही क्या थी ?
 
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