उत्तराखण्ड की ग्रीष्मकालीन राजधानी, आसान नहीं है आगे की राह

Jay singh Rawatजयसिंह रावत Updated Sat, 07 Mar 2020 09:06 AM IST
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त्रिवेन्द्र रावत सरकार ने गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाने की घोषणा कर दी।
त्रिवेन्द्र रावत सरकार ने गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाने की घोषणा कर दी। - फोटो : अमर उजाला

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उत्तराखण्ड में नेतृत्व परिवर्तन की चर्चाओं के बीच मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र रावत सरकार ने गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाने की घोषणा तो कर दी। मगर यह घोषणा सचमुच हकीकत में बदलेगी, इसमें संदेह की गुंजाइश है।
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अगर सचमुच वहां 6 महीने के लिए ना सही 4 महीने के लिए भी सारी सरकार डेरा डालती है तो यह वास्तव में एक उपलब्धि होगी। लेकिन देहरादून से पूरा शासन तंत्र कुछ समय के लिए उठाकर गैरसैंण ले जाना वर्तमान परिस्थितियों में नामुमकिन ही लग रहा है।
दरअसल, यह इसलिए लगता है कि सरकार ग्रीष्मकालीन राजधानी के नाम पर कुछ दिन के लिए गैरसैंण में केवल विधानसभा सत्र चलाना चाहती है जबकि पहाड़ की जनता पहाड़ से ही प्रदेश का शासन तंत्र चलाने की मांग करती रही है। अगर हिमाचल प्रदेश की शीतकालीन-सत्र की तरह यहां हफ्तेभर के लिए विधानसभा का ग्रीष्मकालीन सत्र चलाने भर का है तो यह पहाड़ की जनता के साथ धोखा ही होगा। 
देहरादून से सचिवालय गैरसैंण पहुंचाना होगा
पहाड़ों में एक कहावत है कि छोटी पूजा के लिए भी पांच बर्तन और बड़ी पूजा के लिए भी पांच ही बर्तनों की जरूरत होती है। अगर गैरसैंण में सचमुच ग्रीष्मकालीन राजधानी चलाने की सरकार की मंशा है तो उसे ग्रीष्मकाल में गैरसैंण से प्रदेश का शासन विधान चलाने के लिए देहरादून का समूचा सचिवालय फाइलों समेत गैरसैंण ले जाना होगा। इसलिए ग्रीष्मकालीन राजधानी के लिए गैरसैंण में भी भवन आदि उतने ही बड़े ढांचे की जरूरत होगी जितनी कि देहरादून में उपलब्ध है।
 
इसमें कम्प्यूटर ऑपरेटर और समीक्षा अधिकारी से लेकर मुख्यसचिव तक के आला आइएएस अफसरों के कार्यालय और आवासीय भवन गैरसैण या भराड़ीसैण में उपलब्ध कराने होंगे। यही नहीं वहां चपरासी और बाबू से लेकर अधिकांश विभागों के दफ्तर भी बनाने होंगे। अगर ऐसा नहीं होता है और ग्रीष्मकालीन राजधानी का अभिप्राय केवल विधानसभा के ग्रीष्मकालीन सत्र से है तो यह पहाड़ की जनता के साथ धोखा और प्रदेश के बेहद सीमित संसाधनों का दुरुपयोग होगा।

बहरहाल, फिलहाल तो मुख्यमंत्री के बयानों से यही लगता है कि उन्होंने घोषणा तो जल्दबाजी में कर ली मगर उसे धरातल पर उतारने के लिए विचार-विमर्श भविष्य में होना है।

चन्द अफसरों को ही पौड़ी नहीं भेज सकी सरकार
मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र रावत ने 29 जून 2019 को गढ़वाल कमिश्नरी के स्वर्णजयन्ती समारोह के अवसर पर कमिश्नरी मुख्यालय पौड़ी में कमिश्नरी स्तर के सभी अधिकारियों की तैनाती सुनिश्चित कर इस ऐतिहासिक नगर का पलायनग्रस्त रुतवा लौटाने का वायदा किया था, लेकिन आज तक कमिश्नर और डीआइजी को कमिश्नरी मुख्यालय पर पहुंचाना तो रहा दूर वहां कोई अदना सा अफसर भी स्थाई रूप से ड्यूटी देने नहीं पहुंचा।

अब सवाल उठ रहा है कि अगर गैरसैण में सचमुच ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाई जाती है तो वहां से ग्रीष्मकाल में सरकारी कामकाज चलाने के लिए समूचा सचिवालय जम्मू-कश्मीर की तरह देहरादून से गैरसैण पहुंचाना होगा ताकि प्रदेश का शासन कुछ महीनों तक देहरादून की जगह वहीं से चल सके और पिथौरागढ़ या जोशीमठ के लोगों का शासन सम्बन्धी काम देहरादून के बजाय भराड़ीसैण में ही हो सके।

अगर ऐसा नहीं होता तो यह इस पहाड़ी राज्य के लोगों के साथ महज एक धोखा ही होगा। त्रिवेन्द्र सरकार इससे पहले रिस्पना को ऋषिपर्णा बनाने, पहाड़ पर चकबंदी कराने, कोटद्वार से कार्बेट नेशनल पार्क के बीचों बीच रामनगर तक कण्डी मार्ग बनाने, श्रीनगर मेडिकल कालेज को सेना को सौंपने, 100 दिन में लोकायुक्त का गठन करने और सवा लाख करोड़ निवेश के उद्योग लगवाने जैसी कई घोषणाएं कर चुकी है जो कि धरातल पर नहीं उतर सकी।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नेतृत्व परिवर्तन की चर्चाओं को दबाने के लिए ही अचानक ग्रीष्मकालीन राजधानी का दांव चला गया। मगर भाजपा के अंदर ऐसे चिन्तकों की कमी नहीं जो कि इस दांव के उल्टे पड़ने की आशंका जता रहे हैं। उनका मानना है कि अगर भाजपा सरकार शेष दो सालों में वायदा पूरा नहीं कर पाई, जिसकी पूरी संभावना है, तो इससे पार्टी की स्थिति बहुत खराब हो जाएगी।
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