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कोरोना नहीं उसके बाद की चिंता खाए जा रही है प्रवासी मजदूरों को

Prabhakar Mani Tewariप्रभाकर मणि तिवारी Updated Tue, 31 Mar 2020 02:39 PM IST
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कोरोना वायरस की दहशत के बीच घर लौटने को मजबूर मजदूर
कोरोना वायरस की दहशत के बीच घर लौटने को मजबूर मजदूर - फोटो : प्रतीकात्मक तस्वीर
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कोरोना वायरस ने देश में कई तरह के बदलाव किए हैं। इनमें प्रवासी मजदूरों का बड़े पैमाने पर वापसी भी शामिल है। पूरे देश में इस जानलेवा वारस का असर फैलने की वजह से लॉकडाउन होने के कारण जहां इन मजदूरों की रोजी-रोटी छिन गई है वहीं वहां जान के लाले पड़ गए हैं। यही वजह है कि मार्च के दूसरे सप्ताह से मजदूरों के पलायन का जो सिलसिला शुरू हुआ वह अब तक थमा नहीं है।
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पहले जहां लोग जान की परवाह किए बिना भेड़-बकरियो की तरह ट्रेनों और बसों में भर-भर कर लौट रहे थे वहीं अब  सैंकड़ो मजदूर तो हजारों किलोमीटर की दूरी तय कर पैदल ही अपने गांव-घर लौट रहे हैं। अखबार और टीवी चैनल भी गुजरात, हरियाणा और दिल्ली जैसे दूरदराज से इलाकों से बिहार और उत्तर प्रदेश के गांवों तक सपरिवार पैदल ही लौटने वाले मजदूरों की तस्वीरों से भरे हैं।
पश्चिम बंगाल के विभिन्न इलाकों से कमाने के लिए दूसरे राज्यों में गए हजारों मजदूर भी लौटने लगे हैं। इनमें से कुछ मजदूरों की घरवापसी की राह में पैदा मुसीबतों की दास्तान सुन कर रोंगटे खड़े हो सकते हैं। लेकिन अब इन मजदूरों को जान की परवाह नहीं है। उनका कहना है कि अपने घर में परिवार के बाकी लोगों के साथ भूखे रहना और मरना भी मंजूर है।
पश्चिम बंगाल के उत्तर 24-परगना जिले के रहने वाले समीरन गुछाइत रोजी-रोटी के लिए केरल के कोच्चि में राजमिस्त्री का काम करते थे। यहां अपने गांव में उनको जहां रोज तीन से चार सौ रुपए मिलते थे वहीं केरल में इससे दोगुनी रकम मिलती थी। यही वजह है कि तीन साल पहले गांव के कुछ युवकों के साथ वह भी केरल चले गए थे। लेकिन अबकी कोरोना के चलते मचे आतंक और वापसी की अफरा-तफरी में उन्होंने जो कुछ भोगा है उसका शब्दों में बयान करना मुश्किल है।

समीरन बताते हैं, “मार्च के पहले सप्ताह तक सब कुछ ठीक था। लेकिन उसके बाद अचानक आतंक का माहौल बन गया। लोगों को केरल की बाढ़ औऱ दो साल पहले फैले निपाह वायरस की यादें ताजा हो गईं। इसके बाद रातोंरात भगदड़ मच गई। कुछ दिनों तक ऊहापोह में रहने के बाद दूसरे लोगों के साथ मैं भी कोलकाता के लिए रवाना हुआ। लेकिन खड़गपुर से पहले ही उस ट्रेन को रोक दिया गया और ऐलान कर दिया गया कि वह आगे नहीं जाएगी।” समीरन के साथ उनके गांव के पांच लोग और थे। बसें भी बंद थीं। आखिर उन सबने खड़गपुर से अपने गांव तक की लगभग दो सौ किमी की दूरी पैदल ही तय करने का फैसला किया।

रास्ते में उनको कम मुसीबतें नहीं झेलनी पड़ीं। वह बताते हैं, “जेब में पैसे तो कम थे ही। रास्ते में कोई दुकान भी नहीं खुली थी। ऊपर से दो-तीन जगह पुलिसवालों ने भी काफी परेशान किया। लॉकडाउन की वजह से तमाम दुकानें बंद रहने की वजह से उनलोगों को कहीं खाना नहीं मिला।” 

भूखे-प्यासे यह लोग हावड़ा पहुंचे तो एक स्वंयसेवी संस्था ने उनको भोजन कराया। अब राज्य सरकार ने कोलकाता से एक विशेष बस से उनको गांव भेज दिया है और होम क्वारंटीन में रहने को कहा है। समीरन का कहना है कि वह गांव में अपनी थोड़ी-बहुत खेती से ही गुजारा कर लेगा। लेकिन परदेस नहीं जाएगा।

 
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