आखिर कब पास होगा महिला आरक्षण बिल?

Jay singh Rawatजयसिंह रावत Updated Sun, 15 Mar 2020 09:15 AM IST
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आरक्षण विधेयक 2010 से लटका पड़ा है.
आरक्षण विधेयक 2010 से लटका पड़ा है. - फोटो : अमर उजाला

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अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस जा चुका है और हर साल की तरह जिस तरह महिला शक्ति का महिमा मण्डन और सम्मान उमड़ा उसे देख कर तो लगता है कि राम से पहले सीता का नाम लेने और पार्वती को शिव की शक्ति का प्रतीक मानने वालों के इस देश में सचमुच ’’यत्र नार्यस्तु पूज्यते रमते तत्र देवता’’ की हमारी पौराणिक धारणा सचमुच साकार ही रही है। लेकिन व्यवहार में देखा जाए तो कथनी और करनी में जमीन आसमान का अंतर है।
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घरेलू हिंसा, दुष्कर्म, दहेज हत्या, कार्यस्थल में उत्पीड़न जैसी बुराइयां समाज में गहरी जड़ें जमाए हुए तो हैं ही, मगर राजनीति क्षेत्र में भी देखें तो महिलाओं को विधानसभाओं और संसद में एक तिहाई आरक्षण विधेयक 2010 से लटका पड़ा है मगर उसे पास कराने की चिंता किसी को नहीं है जबकि राज्यसभा में बहुमत न होने के बावजूद ऐसे संविधान संशोधन पास हो गए जिनके कारण आज देश में अशांति मची हुई है और दुनिया हमारी धर्मनिरपेक्ष छवि पर ऊंगली उठा रही है।
राजनीतिक अधिकारों के लिए शुरू हुआ महिला दिवस
महिला दिवस को जब सबसे पहले वर्ष 1910 में सोशलिस्ट इंटरनेशनल के कोपेनहेगन सम्मेलन में अन्तर्राष्ट्रीय दर्जा दिया गया तो उस समय इसका मुख्य उद्देश्य महिलाओं को वोट देने का अधिकार दिलवाना ही था, क्योंकि उस समय अधिकतर देशों में महिलाओं को वोट देने का अधिकार नहीं था।

यद्यपि समाजवादी देश तब से ही 8 मार्च को महिलाओं के अधिकारों और समानता की आवाज के रूप में इस दिवस का मनाते रहे हैं, लेकिन 1977 में संयुक्त राष्ट्र ने भी इसे अंगीकार किया तो भारत में भी इस अवसर पर हर साल जलसे होने लगे। लेकिन महिलाओं को राजनीति में समान अधिकार देने की मूल भावना अब भी नदारद है। जबकि इसी भारत ने दुनिया की दूसरी महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी दी थी जिसने दुनिया का राजनीतिक भूगोल ही बदल डाला और अमेरिका जैसे महाबली की धमकियों की परवाह न कर पाकिस्तान को तोड़ कर एक नया देश ही बना डाला।

यही नहीं भारत प्रतिभा पाटिल जैसी एक महिला राष्ट्रपति बन गई, सुमित्रा महाजन लोकसभा की स्पीकर बन गई, मायावती और जयललिता जैसी महिलाएं राज्यों की सफल मुख्यमंत्री बनीं। भारत में एक महिला सीतारमन रक्षा मंत्रालय का नेतृत्व भी कर चुकी हैं। मगर हमारा पुरुष प्रधान राजनीतिक तंत्र अब भी महिलाओं को देश का भविष्य तय करने के लिए विधायिकाओं में उनकी भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए महिला आरक्षण बिल पास कराने को तैयार नहीं है।
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