वर्षों बाद दिल्ली से बाहर

तस्लीमा नसरीन Updated Wed, 17 Feb 2016 07:22 PM IST
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After years out of Delhi

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मेरे पैर में जंजीर थी। सख्त जंजीर। पिछले दिनों मैंने वह जंजीर तोड़ी। जंजीर तोड़कर मैं दिल्ली से निकली, भारत के दूसरे शहर में गई। अब तक दिल्ली से मेरे बाहर निकलने का अर्थ होता था भारत से बाहर होना। दिल्ली छोड़कर भारत के दूसरे किसी राज्य में प्रवेश करने का मुझे अधिकार नहीं मिलेगा, अधिकार मिलने पर भी उस राज्य के मुस्लिम मेरे विरुद्ध जुलूस निकालेंगे, और राज्य सरकार मुझे तत्काल बाहर निकालेगी-अब तक मैं यही समझती थी। किंतु मेरी इस सोच को जिस राज्य ने पिछले दिनों गलत साबित किया, वह केरल है।
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हैदराबाद प्रेस क्लब में मेरे ऊपर हुए हमले के बाद वर्ष 2007 में मुझे इस जंजीर से जकड़ा गया था। हमलावरों को हालांकि किसी ने दंडित नहीं किया। मुझे ही सजा दी गई। तब कोलकाता के अपने निवास पर मुझे चार महीने तक नजरबंद रहना पड़ा था। दबाव डाला गया था कि मुझे कोलकाता से, पश्चिम बंगाल से, भारत से बाहर निकाल दिया जाए। अंततः एक गढ़े हुए दंगे का आरोप लगाकर मुझे पश्चिम बंगाल सरकार ने भगा दिया था। तीन साल बाद हालांकि भारत में रहने की राजनीतिक अनुमति मिली।
मुझे लगा था कि शायद अब दिल्ली से बाहर कभी जाना नहीं होगा। अनेक आमंत्रण मैंने ठुकरा दिए थे। दिल्ली विश्वविद्यालय में भाषण देने के लिए मुझे बुलाया गया था, मैंने मना कर दिया। लेकिन कुछ दिन पहले दिल्ली में टाइम्स लिटरेरी फेस्टिवल और दिल्ली लिटरेचर फेस्टिवल में भाग लेने के बाद मेरी आशंका कुछ कम हुई। हालांकि इन दोनों समारोहों में भागीदारी की शर्त मैंने यह रखी थी कि किसी भी खबर या विज्ञापन में मेरा नाम नहीं जाएगा, मैं अचानक उपस्थित होऊंगी। आयोजकों ने मेरी शर्त मान ली थी।
इतने दिनों में पहली बार मैंने दिल्ली से कहीं बाहर जाने की तैयारी की। केरल लिटरेचर फेस्टिवल में भागीदारी के लिए प्रख्यात मलयाली लेखक और कवि के सच्चिदानंदन का आमंत्रण देखकर महसूस हुआ कि बाहर जाने का समय हो गया है, एक जगह रहकर शरीर में जैसे जंग लग गई है। मैंने कह दिया, जाऊंगी। पैरों की जंजीर झनझना उठी। कुछ घनिष्ठ मित्रों ने वहां न जाने की हिदायत दी। कहा, कालीकट में बड़ी मुस्लिम आबादी है, कुछ भी हो सकता है। पर मैंने किसी की बात नहीं सुनी। के सच्चिदानंदन ने भी मुझे भरोसा दिलाया। उन्होंने कहा, कालीकट अच्छी जगह है, यहां के मुस्लिम शांतिप्रिय हैं। कालीकट हवाई अड्डे पर पुलिस का भारी पहरा था। टोपी लगाए सैकड़ों मुस्लिमों को भी मैंने वहां देखा। मुझे भय हुआ, पर हवाई अड्डे के अधिकारियों ने बताया कि हैदराबाद से कोई मुस्लिम धर्मगुरु आए हैं, उन्हीं के दर्शन के लिए ये लोग आए हैं।

होटल में पुलिस का भारी जमावड़ा देख मुझे अच्छा नहीं लगा। मैंने कहा, मैं वीआईपी नहीं हूं। पुलिस पहरा तो ठीक है, पर पुलिस के इतने जवान क्यों? कुछ महिला पुलिस के जवान मेरी सुरक्षा में थे, जिनकी कमर से पिस्तौल लटक रही थी। होटल में मुझे इलायची और लौंग की माला पहनाई गई। ललाट पर चंदन का टीका लगा दिया गया। केरल मैं इससे पहले भी गई हूं, वहां मैंने देखा, लोग या तो मलयालम बोलते हैं या अंग्रेजी, पर हिंदी नहीं बोलते।

कालीकट के समुद्र तट पर आयोजन था। अगले दिन समारोह स्थल तक पहुंचने के रास्ते में पत्रकारों और फोटोग्राफरों की भारी भीड़ थी। क्यों? क्या उन्हें पता था कि मैं आ रही हूं? मेरे नाम का तो कहीं जिक्र नहीं था। संभवतः पुलिस की भीड़ से उन्होंने अनुमान लगाया हो।

साहित्य समारोह में तिल धरने की जगह नहीं थी। मंच पर समारोह के अध्यक्ष के सच्चिदानंदन के साथ साहित्य, नारी, समाज, राजनीति जैसे मुद्दों पर करीब डेढ़ घंटे तक बातचीत हुई। अपनी कुछ कविताओं का अंग्रेजी अनुवाद मैंने पढ़ा। सच्चिदानंदन ने भी मेरी कुछ कविताएं पढ़कर सुनाईं। दर्शकों में अनेक शिक्षित लोग थे, मुस्लिम भी थे। भीड़ में किसी ने नारा नहीं लगाया, मुझे मारने के लिए उठकर कोई नहीं आया।

कालीकट से आने से पहले इंटरव्यू, सेल्फी, ऑटोग्राफ, समुद्र दर्शन के साथ चाय-पान और सुबह समुद्र के किनारे चहलकदमी-सब कुछ हुआ। 'मिडिया वन' नामक एक टीवी चैनल ने मेरा लंबा इंटरव्यू लिया। वे लोग होटल के मेरे कमरे में इंटरव्यू लेने आए थे। इंटरव्यू खत्म होने के बाद मेरे पूछने पर पत्रकार ने अपना नाम सोहेल बताया। यह भी पता चला कि 'मीडिया वन' जमायते इस्लाम का चैनल है। पर उन्होंने मेरा अहित नहीं किया।

कालीकट में मैंने टोपी और बुर्के में अनेक मुस्लिमों को देखा। ठीक है, वे अच्छे हैं, और हिंसा में विश्वास नहीं करते। लेकिन मिस्र से आए कालीकट के बोहरा मुसलमानों में औरतों में खतने की प्रथा है। मैंने महसूस किया कि साहित्य समारोह के आयोजकों में से ज्यादातर को इस बारे में पता नहीं था।

केरल का खान-पान मुझे कभी बहुत अच्छा नहीं लगा। लेकिन आयोजन की रात वहां के एक रेस्टोरेंट का डिनर मुझे स्वादिष्ट लगा। वहां से बाहर निकलते हुए देखा, कुछ कम उम्र मुस्लिम महिलाएं बाहर खड़ी थीं, संभवतः भीतर जगह न होने के कारण बाहर इंतजार कर रही थीं। उन महिलाओं के सिर पर हिजाब था। मेरे निकलते समय वे मेरे पास आ गईं। उन्होंने मुझसे कुछ कहने के बजाय दो छोटी बच्चियों को मेरे सामने कर दिया। ऑटोग्राफ मांगते हुए उन बच्चियों ने कहा, हम आपके फैन हैं, आपकी रचनाएं पढ़ती हैं।

मैं समझ गई, ये बच्चियां मेरे लेखन से परिचित नहीं होंगी। उन महिलाओं ने उन्हें जो कहा होगा, वही ये मुझे कह रही हैं। ऑटोग्राफ देते हुए मैंने उम्मीद की कि ये बच्चियां एक दिन प्रतिवाद की भाषा बोलने का साहस अर्जित करेंगी। वे एक दिन खतने की प्रथा और हिजाब के खिलाफ खड़ी होंगी।
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