दौड़ में सबसे आगे

अजय बोस Updated Thu, 21 Jan 2016 06:33 PM IST
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बसपा सुप्रीमो मायावती ने हाल में अपना 60वां जन्मदिन असामान्य सादगी के साथ, मगर आत्मविश्वास भरे अंदाज में मनाया। इस बार भी मायावती ने मीडिया को संबोधित किया, लेकिन अब हीरों के चमकते आभूषण उनके गले एवं कानों की शोभा नहीं बढ़ा रहे थे। पिछले कुछ वर्षों की तरह बर्थ-डे केक भी सर्वव्यापी नहीं था। जबकि उनका यह जन्मदिन खास था। उनकी आंखों की चमक बता रही थी कि बहन जी अगले साल राज्य में होने वाले चुनाव में वापसी की बढ़ती संभावना का जश्न भीतर से मना रही हैं। दरअसल पिछले लोकसभा चुनाव में बसपा के एक भी सीट न जीत पाने के सदमे के बाद इस दलित नेत्री से जुड़ी राजनीतिक संभावनाओं में आश्चर्यजनक रूप से बदलाव दिख रहा है। खासतौर पर ऐसे समय में यह बहुत महत्वपूर्ण है, जब उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में महज एक साल बचा है। यह पहले से साफ है कि सूबे की चुनावी दौड़ में मायावती सबसे आगे हैं।
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जो नेत्री चुनाव जीतने के लिए अब तक प्रतीकों की राजनीति करती रही हैं, इस बार बेहतर प्रशासन की राजनीति उनका प्रमुख हथियार है। जातिगत समीकरणों से इतर पूर्व मुख्यमंत्री का बेहतर प्रशासनिक रिकॉर्ड और कानून-व्यवस्था पर पकड़ ने उन्हें अपने विरोधियों से ऊपर बनाए रखा है। सपा के हाथों सत्ता गंवाने के बाद के इन चार वर्षों में उत्तर प्रदेश में व्याप्त अव्यवस्था और अराजकता की वजह से उनकी साख इतनी बढ़ी है कि सत्ता में होते हुए अपनी और अन्य दलित नेताओं की मूर्तियां लगाने के उनके उन्माद एवं अहंकार भरे फैसले को भी लोग जरूरी कानून-व्यवस्था की एवज में भुलाने के लिए तैयार हैं। जाति, धर्म और समुदाय से इतर कानून-व्यवस्था की स्थिति आगामी विधानसभा चुनाव में बसपा का प्रमुख मुद्दा बन सकती है।
बसपा का प्रमुख वोट बैंक रहीं जाटव, दलित समूह और अन्य पिछड़ी जातियां, जिनका मायावती से मोहभंग हो गया था, यादवों के वर्चस्व से त्रस्त होकर एक बार फिर उनके पक्ष में एकजुट हो रही हैं। ब्राह्मणों की स्थिति भले उतनी खराब न हो, लेकिन ग्रामीण इलाकों में बंदूक की नोक पर गुंडाराज करने वालों से वे भी आजिज आ चुके हैं। मुस्लिमों को सपा से संरक्षण की उम्मीद थी, पर वे भी प्रदेश में अब नया मुखिया चाहते हैं। संदेश साफ है कि लखनऊ में बैठे सत्ताधारी भगवा बिग्रेड से अल्पसंख्यकों की सुरक्षा करने में विफल रहे हैं।
कानून-व्यवस्था ही एकमात्र मुद्दा नहीं है, जिसके बूते मायावती सत्ता में वापसी का सपना देख रही हैं। राज्य में बढ़ते कृषि संकट और खासकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गन्ना किसानों को उनकी समस्याओं से निजात दिलाने में उनकी भूमिका को उम्मीद भरी नजरों से देखा जा रहा है। प्रदेश की सपा और केंद्र की भाजपा सरकार से त्रस्त किसान बसपा के शासन को याद करते हैं, जब न केवल चीनी मिलों से समय पर गन्ने का भुगतान हो जाता था, बल्कि कीमत भी वाजिब मिलती थी। भारतीय किसान यूनियन और भारतीय किसान आंदोलन के प्रतिनिधि भी इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए बसपा के पक्ष में खड़े हैं। ऐसा पहली बार देखने को मिल सकता है, जब आपस में भिड़ने वाले पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाट किसान और जाटव समुदाय के लोग एक साथ मतदान करेंगे।

अगर केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार का कामकाज अच्छा होता और उत्तर प्रदेश में सत्ताधारी सपा को चुनौती देते हुए वह मुख्यमंत्री पद का प्रत्याशी भी सामने लाती, तो मायावती के पक्ष में संभावनाएं इतनी प्रबल न होतीं। पर लोकसभा चुनाव में दूसरी तमाम पार्टियों को बौना बना देने वाली भाजपा अपना वर्चस्व कायम रखने में विफल होती दिख रही है। दिल्ली और बिहार में पराजय के साथ मोदी मैजिक फेल होने के बाद न केवल भगवा बुल्डोजर धीमा हुआ है, बल्कि लोकसभा चुनाव में भाजपा की जीत का ताना-बाना बुनने वाले पार्टी के मुखिया अमित शाह का रुतबा भी घटा है।

उत्तर प्रदेश में प्रभावी नेताओं के अभाव और पार्टी में पारंपरिक ऊंची जातियों के आधार को नजर अंदाज कर पिछड़ी जातियों को लुभाने की आधी-अधूरी कोशिश के बाद भाजपा के पास हिंदुओं की लामबंदी के अलावा कोई कार्ड नहीं बचा है। मायावती कैंप में इसको लेकर भी घबराहट है कि भाजपा गुप्त रूप से सपा के समर्थन से सांप्रदायिक हिंसा को बढ़ावा देकर कानून-व्यवस्था और कृषि संकट जैसे मुद्दों को हाशिये पर धकेल सकती है। विहिप एक बार फिर राम मंदिर का राग अलाप रही है। कट्टर हिंदू संगठन और सपा में आजम खान जैसे नेताओं की उकसाने वाली बयानबाजी सांप्रदायिक माहौल बिगड़ने की आशंका को हवा देने का काम कर रही है।

ऐसे में, बसपा को कपटपूर्ण तरीके से सत्ता से दूर रखने की विरोधियों की इस कोशिश में मायावती के दावों को लोगों का समर्थन मिल सकता है। शांति और आर्थिक तरक्की के लिए लोग एक बार फिर उन्हें चुन सकते हैं। यह भी महत्वपूर्ण है कि मायावती के पक्ष में राजनीतिक हवा होने के बावजूद वह लोगों के बीच अपनी सामान्य छवि ही पेश कर रही हैं। हालांकि बसपा का प्रचार तंत्र बड़े पैमाने पर तैयारियों में जुटा हुआ है। बहन जी को यह बखूबी पता है कि राजनीति की बिसात पर इंतजार करने के बाद तब चाल चली जाती है, जब सामने वाला खिलाड़ी थककर कमजोर पड़ जाए। शायद इसीलिए वह कमजोर पड़ चुकी कांग्रेस के साथ गठबंधन की कोई पहल करने से पहले चुनाव के वक्त तक इंतजार करना ज्यादा मुनासिब समझती हैं। भारत की राजनीति में एक साल लंबा वक्त जरूर है, लेकिन वर्तमान परिस्थितियां बनी रहीं, तो बहन जी को मजबूती मिल सकती है। 2014 में बुरी हार के बावजूद अगले साल विरोधी दलों की बेतुकी चालबाजियों का पुरस्कार उन्हें मिल सकता है।

वरिष्ठ पत्रकार और बहन जी, ए पॉलिटिकल बायोग्राफी के लेखक

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