लेखक और राष्ट्रवाद: देश की भाषा, संस्कृति और परंपराओं से जुड़ाव 

रामचंद्र गुहा Updated Sun, 30 Jun 2019 04:13 AM IST
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Rabindranath Tagore
Rabindranath Tagore - फोटो : social media

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करीबन एक शताब्दी पहले, ठीक-ठीक कहें तो 10 अप्रैल 1919 को, फ्रैंच लेखक रोमां रोलां ने बांग्ला लेखक रवींद्रनाथ टैगोर को एक पत्र डाक से भेजा था। वे कभी मिले नहीं थे, लेकिन एक दूसरे को जानते थे। दोनों की उनके अपने देशों में और उससे बाहर पर्याप्त ख्याति थी। दोनों को साहित्य के नोबेल पुरस्कार से नवाजा गया था।
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इस पत्र में, जो कि टैगोर को लिखा गया उनका पहला पत्र था, इस फ्रांसीसी शख्स ने इस भारतीय से एक बयान, डिक्लरेशन ऑफ द इंडिपेंडेंस ऑफ स्पिरिट (आत्मा से मुक्ति का घोषणापत्र), पर हस्ताक्षर करने का आग्रह किया, जिसका मसौदा खुद उन्होंने तैयार किया था। मानव इतिहास का सबसे रक्तरंजित युद्ध अभी अभी खत्म हुआ था; और लेखकों तथा बुद्धिजीवियों ने इसे भड़काने और आगे बढ़ाने में अपनी भूमिका निभाई थी। 
जैसा कि रोलां ने लिखा, 'विचारकों और कलाकारों ने इस महाविपत्ति में बेहिसाब जहरीली घृणा उड़ेली जो कि यूरोप के शरीर और उसकी आत्मा को नष्ट कर रही है'। बहुत से लेखकों ने खुद को एक राजनीतिक या सामाजिक वंश, एक राज्य, एक पितृभूमि और एक वर्ग के जुनून और अहंकारी हितों का साधन बना लिया था। इन लेखकों की युद्ध में निभाई भूमिका से स्तब्ध और शर्मिंदा होकर रोलां ने इस बयान का मसौदा तैयार किया था, जिसमें उन्होंने उनसे खुद को 'समझौतों', 'अपमानजनक गठबंधनों' और 'गोपनीय दासता' से मुक्त करने का आग्रह किया। 
उन्होंने जोर देकर कहा कि हमारी भूमिका और हमारा कर्तव्य तो यह होना चाहिए कि हम भावनाओं के तूफान और अंधियारे के बीच ध्रुव तारे की तरह राह दिखा सकें। इस बयान में लेखकों से कहा गया कि वे खुद को किसी और चीज के बजाए मुक्त सत्य के लिए समर्पित करें, जिसकी कोई सरहद न हो और जो किसी दायरे में सिमटा नहीं हो और जो नस्ल या जातियों के प्रति पूर्वाग्रह से मुक्त हो।

पश्चिम के भीतर रोलां को उनके इस 'डिक्लरेशन ऑफ द इंडिपेंडेंस ऑफ द स्पिरिट' को लेकर अन्य लोगों के साथ जिनका समर्थन मिला उनमें महान इतालवी इतिहासकार बेनेडेटो क्रोस, महान ब्रिटिश दर्शनशास्त्री बर्टेंड रसेल और महान जर्मन उपन्यासकार हर्मन हेस शामिल थे। वह पूर्व से भी हस्ताक्षर चाहते थे, इसीलिए उन्होंने टैगोर से अपील की। टैगोर ने उन्हें जवाब लिखा कि 'इस घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर करने वाली मुक्त आत्माओं के साथ शामिल होकर उन्हें खुशी हो रही है'।

लेखकों के बीच नैतिक जिम्मेदारी लेने को लेकर शुरू हुआ यह पत्र व्यवहार कई वर्षों तक जारी रहा। इस पत्र व्यवहार पर हाल ही एक शानदार किताब आई है, ब्रिजिंग ईस्ट ऐंड वेस्ट, जिसका संपादन साहित्य इतिहासकार चिन्मय गुहा ( इस लेखक से जिनका कोई संबंध नहीं है) ने किया है। जैसा कि यह किताब दिखाती है कि रोलां और टैगोर दोनों ही अपने खुद के देश से गहराई से प्रेम करते थे, इसके बावजूद उन्हें देश के भीतर मौजूद गहरी राष्ट्रवादी भावनाएं पीड़ा देती थीं। फ्रांसीसी अंधराष्ट्रवाद से आहत होकर रोलां स्विटजरलैंड के विलेनयूवे शहर में जा बसे थे। जैसा कि उन्होंने एक रूसी सहयोगी को लिखा, 'अगर मैं स्विट्जरलैंड में बस गया हूं, तो यह इंगित करना है कि मेरा विचार-केंद्र फ्रांस नहीं है, बल्कि सभी देशों से परे एक सर्वदेशीयता में है, जो सभी जातियों और सभी देशों के सभी मुक्त पुरुषों को गले लगाता है।'

कई वर्षों तक पत्र व्यवहार के अलावा रोलां और टैगोर की यूरोप में कई मुलाकातें भी हुईं। दोनों के रिश्ते बहुत अच्छे रहे; रोलां ने एक साझा मित्र, संगीतकार और रहस्यवादी दिलीप कुमार रॉय से कहा था कि, किसी अन्य जीवित कलाकार ने मुझ पर इतना सहज और आध्यात्मिक प्रभाव नहीं डाला। इस बीच, टैगोर ने एक अन्य साझा मित्र और इतिहासकार कालीदास नाग से कहा, पश्चिम के जितने लोगों से मैं मिला, उनमें रोमां रोलां मेरे दिल और मेरी भावना के करीब थे।

टैगोर ने नाग को बताया कि इस फ्रांसीसी की किस चीज ने उन्हें सर्वाधिक प्रभावित कियाः 'रोलां जैसे व्यक्ति ने स्वेच्छा से मानवता के कल्याण के लिए तपस्या और शुद्धि को करियर चुना। उन जैसे व्यक्तियों के लिए उनके अपने देश और ब्रह्मांड में कोई फर्क नहीं होता। यही वजह है कि देशभक्ति और राष्ट्रवाद के पहरुए उन्हें निशाना बनाते हैं। लेकिन मेरा दिल रोलां और उनके सहयोगियों के छोटे से समूह के साथ है। अंतिम जीत हमारी है क्योंकि हम सत्य के पक्ष में हैं, जिसमें वास्तविक स्वतंत्रता और मुक्ति निहित है।'

यह पत्र मई, 1922 में लिखा गया था। उसी महीने टैगोर ने रोलां को लिखाः जैसा कि आप जानते हैं कि हमारे देश में भारी राजनीतिक उथल-पुथल मची हुई है। इसमें संदेह नहीं कि इसने लोगों के दिमागों को भड़का दिया है, लेकिन यह सब संकीर्ण रास्ते से किया जा रहा है और लगातार हमारे साथ गलत कर और ऐसी संस्कृतियों का अपमान कर जो भारत के लिए विदेशी हैं, उन्हें दुष्ट भावनाओं को उभारने का मौका मिल गया है। जो बात मुझे गहराई से कचोटती है, वह यह है कि यह आंदोलन मानवता की एक बड़ी दृष्टि से प्रेरणा लेने में विफल रहा है, लेकिन इसके विपरीत, यह जानबूझकर अनुयायियों के मन में धुंध पैदा कर राष्ट्रीय व्यक्तिवाद की चेतना को भड़काने का काम कर रहा है।

रोमां रोलां ने एक बार टैगोर और महात्मा गांधी ( जिन्हें वह जानते थे और उनके भी प्रशंसक थे) के बीच दिलचस्प तुलना की। उन्होंने लिखा, इन दोनों महान व्यक्तियों में एक दूसरे के प्रति आदर है, लेकिन दोनों एक दूसरे से देवदूत और संत की तरह अलग हैं, जैसे सेंट पॉल और प्लेटो।

उम्र बढ़ने के साथ ही रोलां ने अपने मूल देश से सामंजस्य बिठाने की कोशिश कर रहे थे। दिसंबर, 1937 में उन्होंने टैगोर को लिखा, फ्रांस के कामगार और किसान वर्ग के उभार (सामाजिक, नैतिक और बौद्धिक) ने मुझे महान सुख और ढेर सारी उम्मीद दी है। विशेष रूप से पिछले दो से तीन वर्षों में वे अपनी एकता और अपनी ताकत को लेकर जागरूक होने के साथ ही विशाल मानवता के प्रति अपनी जवाबदेही को लेकर सजग हुए हैं। इसके अगले वर्ष रोलां स्विटजरलैंड से फ्रांस वापस आ गए और जंगलों और पहाड़ियों से घिरे छोटे से एक मध्ययुगीन कस्बे में बस गए।

रोलां और टैगोर के बीच हुए पत्रव्यवहार को एक शताब्दी बाद पढ़ना वाकई काफी दिलचस्प है। कोई भी इन लेखकों की अपने देश की भाषा, संस्कृति और परंपराओं से जुड़ाव की प्रशंसा किए बिना नहीं रह सकता। इनसे समझा जा सकता है कि किस तरह से उन्होंने सार्वजनिक बहसों में हस्तक्षेप किया और किन्हीं खास नीतियों और कार्यक्रमों को लेकर एक दृष्टिकोण अपनाया। हालांकि लेखक इसके बावजूद सतर्क थे कि वे किसी राजनीतिक या सामाजिक वंश, या राज्य या पितृभूमि या किसी वर्ग के जुनून और अहंकारी हितों का साधन न बनें।  
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