बाजवा बने इमरान के लिए संकट

mariana babarमरिआना बाबर Updated Fri, 06 Dec 2019 01:55 AM IST
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बाजवा और इमरान
बाजवा और इमरान - फोटो : a

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दो स्वतंत्र राष्ट्र होने के बावजूद पाकिस्तान और भारत ब्रिटिश शासकों द्वारा बनाए गए विभाजन पूर्व के कानूनों का पालन करते हैं। इनमें से कुछ कानून तो 1860 के हैं। हालांकि, दोनों देशों ने रोजमर्रा के कानूनों में संशोधन किया है, लेकिन बुनियादी ढांचा अब भी औपनिवेशिक कानूनों पर आधारित है। कई बार वे पुराने ब्रिटिश कानून की नकल होते हैं। पाकिस्तान दंड संहिता (पीपीसी) पाकिस्तान में लगाए जाने वाले सभी अपराधों के लिए दंड संहिता है। इसे मूल रूप से लॉर्ड मैकाले द्वारा 1860 में भारत सरकार की ओर से भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के रूप में तैयार किया गया था।
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पिछले कुछ हफ्तों से पाकिस्तान में हंगामा मचा हुआ है, क्योंकि पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को चुनौती देते हुए फैसला सुनाया कि सेना प्रमुख को सेवा विस्तार देने की प्रक्रिया गैरकानूनी थी। उसने यह भी कहा कि कुछ मुद्दों पर पाकिस्तान सेना अधिनियम चुप है। जिस मुद्दे ने पूरे मुल्क और पड़ोसी देशों को झकझोरा, वह यह था कि प्रधानमंत्री इमरान खान सेवानिवृत्त होने वाले सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा को तीन साल का सेवा विस्तार देना चाहते थे। प्रधानमंत्री कार्यालय को यह चुनौती दी गई कि पाकिस्तान सेना अधिनियम में इस तरह के सेवा विस्तार का कोई प्रावधान नहीं है।
पाकिस्तान सेना अधिनियम को 1952 में लागू किया गया था। तब से इसमें कोई बदलाव नहीं हुआ है। आजादी के बाद से सेवानिवृत्त होने वाले सेना प्रमुख, जो मार्शल लॉ की वजह से सत्ता में थे, खुद को सेवा विस्तार दे रहे थे या तत्कालीन प्रधानमंत्री उन्हें सेवा विस्तार देते रहे हैं। यह पहली बार है, जब पाकिस्तान के प्रधान न्यायाधीश आसिफ सईद खोसा ने फैसला सुनाया कि संसद को सेना अधिनियम में संशोधन करना होगा, ताकि उसमें सेवा विस्तार का प्रावधान हो।
यह वास्तव में एक बड़ा ड्रामा था, क्योंकि सरकार उचित कानूनी अधिसूचना तैयार करने में पर्याप्त सक्षम नहीं है। आखिरकार प्रधान न्यायाधीश जस्टिट आसिफ खोसा की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय बेंच ने यह फैसला सुनाया कि जनरल बाजवा तत्काल प्रभाव से अगले छह महीने तक सेना प्रमुख बने रहेंगे, उसके बाद... 'नया कानून उनके कार्यकाल और सेवा के अन्य नियम और शर्तों को निर्धारित करेगा।' जैसे ही सेना प्रमुख (सीओएएस) का कार्यालय विवादों में घिरा, ऐसी कई आवाजें उठने लगीं, कि जनरल बाजवा को इस्तीफा दे देना चाहिए और नए सेना प्रमुख को नामित किया जाना चाहिए। क्योंकि सेवा विस्तार देने का मतलब होगा कि सेना में कोई भी सक्षम वरिष्ठ कमांडर नहीं है, जो उनका स्थान ले सके। लेकिन इमरान खान ने, जिन्हें जनरल बाजवा का बहुत समर्थन मिल रहा है, एक नए सेना प्रमुख को लाने से इनकार कर दिया, और जोर देकर कहा कि व्यापक राष्ट्रीय हित में जनरल बाजवा को पद पर बने रहना चाहिए। एक राजनीतिक विश्लेषक का कहना है कि 'सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जबसे तहरीक-ए इंसाफ पार्टी सत्ता में है, वह संकटग्रस्त जहाज की तरह एक से दूसरे संकट में फंसती रहती है। लेकिन पाकिस्तानी सेना इसके पीछे मजबूती से खड़ी है, जिसने एक से अधिक बार इसका समर्थन किया है।'

विपक्षी दलों से इमरान खान के रिश्ते अच्छे नहीं हैं और यहां तक कि उनके गठबंधन के सहयोगी भी उनसे खुश नहीं हैं, क्योंकि उन्होंने उनसे किया गया वादा पूरा नहीं किया है। जैसे ही सेना अधिनियम में छह महीने के भीतर संशोधन की मांग वाला सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया, उसके तुरंत बाद इमरान खान ने ट्वीट करना शुरू कर दिया और उन कामों के लिए अपने राजनीतिक विरोधियों को दोषी ठहराया, जो सरकार की जिम्मेदारी थी, जैसे सेना प्रमुख को सेवा विस्तार तो खुद प्रधानमंत्री दे रहे थे, विपक्षी नेता नहीं।

इमरान खान ने अपने राजनीतिक विरोधियों को लुटेरा और डकैत कहा और भ्रम फैलाने के लिए विदेशी शत्रु शक्तियों को भी दोषी ठहराया। वास्तव में विपक्ष ने नहीं, बल्कि पाकिस्तान के एक नागरिक ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करके जनरल बाजवा को सेवा विस्तार देने के खिलाफ सरकार को चुनौती दी थी। लेकिन विपक्ष की मदद के बिना संसद में सेना अधिनियम में संशोधन और बहस के लिए नया विधेयक लाना मुश्किल होगा। विपक्ष, जो सरकार की तरफ से बहुत दबाव का सामना कर रहा है, वह भी सहयोग के बदले में कुछ चाहेगा। विशेष रूप से पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के नेता बिलावल भुट्टो जरदारी और शहबाज शरीफ, जो संसद में अपनी पार्टियों का नेतृत्व करते हैं।

अंग्रेजी दैनिक द डॉन ने अपने संपादकीय में लिखा है-'विपक्ष की भूमिका महत्वपूर्ण है। यह मुद्दा जितना महत्वपूर्ण है, उसका राजनीतिकरण नहीं किया जाना चाहिए। जब कभी सरकार विपक्ष से सहयोग मांगती है, तो तनावपूर्ण संबंधों के बावजूद विपक्ष की प्रतिक्रिया सकारात्मक होनी चाहिए। संसद के भीतर रचनात्मक संबंधों के बिना कानून बनाने में जिस तरह के बहस की जरूरत होती है, उस पर बहस करना मुश्किल होगा।' लेकिन सवाल उठता है कि अगर संसद छह महीने में सेना अधिनियम में संशोधन नहीं कर पाती है, तो क्या होगा। यह निश्चित रूप से ज्यादा भ्रम पैदा करेगा। सेना प्रमुख का कार्यालय विवादों से ऊपर होना चाहिए।

पूर्व आईएसआई और सैन्य खुफिया प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल असद दुर्रानी ने हाल ही मुझे ईमेल से एक लेख भेजा। उसमें उन्होंने जनरल बाजवा के सेवा विस्तार के मुद्दे को उठाया है। वह लिखते हैं,  जनरल बाजवा के लिए सम्मानजनक यह था कि वह सेवा निवृत्त हो जाते। मैं नहीं जानता कि उन्होंने ऐसा क्यों नहीं किया, लेकिन मुझे पता है कि सेवा विस्तार को स्वीकार करने के गंभीर निहितार्थ हैं। कुछ ज्ञात निहितार्थ हैं-किसी को उसकी सही बारी से मना करना, और यह संदेश देना कि कतार में और कोई भी व्यक्ति इस पद के लायक नहीं था। अन्य कम ज्ञात, लेकिन ज्यादा महत्वपूर्ण निहितार्थ हैं-लाभार्थी संस्था के भीतर सम्मान खो देता है और यह कुछ अन्य लोगों को सेना प्रमुख के रूप में अपने राजनीतिक आका को चुनने या सेवा विस्तार देने के लिए चापलूसी करने को प्रेरित करता है।
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