बांग्लादेश की सफलता की कहानी, पाकिस्तान को भी होगी हैरत

महेंद्र वेद Updated Wed, 21 Oct 2020 02:23 AM IST
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एक औसत भारतीय अपने छोटे पड़ोसी देश के साथ, वह भी नकारात्मक अर्थ में अपने देश की तुलना नहीं करता है। इसे अपनी प्रतिष्ठा के प्रतिकूल माना जाता है। बांग्लादेश भारत का एक ऐसा पड़ोसी है, जिसकी आजादी में इसने सहायता की थी। अगले वर्ष बांग्लादेश अपनी आजादी की 50वीं सालगिरह मना रहा है, इसलिए उसकी तुलना न केवल भारत से, बल्कि उस पाकिस्तान से भी हो रही है, जिससे वह अलग हुआ था। अमेरिकी राजनयिक हेनरी किसिंजर द्वारा कभी 'अंतरराष्ट्रीय भिखारी' कहलाने वाले बांग्लादेश ने काफी लंबा सफर तय किया है। कम विकसित देशों की सूची में शामिल बांग्लादेश के वर्ष 2024 तक विकासशील देशों की श्रेणी में आने की उम्मीद है। पहले से ही 39 वीं प्रमुख अर्थव्यवस्था माना जाने वाला बांग्लादेश उभरता हुआ एशियाई देश है। 
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कभी पाकिस्तान के सबसे गरीब क्षेत्रों में शुमार बांग्लादेश 1971 में मिली अपनी आजादी के बाद कई वर्षों तक गरीबी और अकाल से तबाह रहा। वास्तव में 2006 तक स्थितियां इतनी खराब थीं कि जब बांग्लादेश ने पाकिस्तान से ज्यादा तेजी से वृद्धि दर्ज की, तो उसे खारिज कर दिया गया। लेकिन इस साल बांग्लादेश प्रति व्यक्ति आय के मामले में पाकिस्तान को पछाड़ देगा, यहां तक कि क्रय क्षमता के मामले में भी। पाकिस्तान में जनसंख्या वृद्धि दर दो प्रतिशत वार्षिक है, जबकि बांग्लादेश में यह दर प्रति वर्ष 1.1 फीसदी है, यानी इसकी प्रति व्यक्ति आय पाकिस्तान की तुलना में लगभग 3.3 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से तेजी से बढ़ रही है। कल्पना कीजिए कि पाकिस्तान के लोगों के दिल में कितनी जलन हो रही होगी!
1991 की शुरुआत में जनरल इरशाद के सैन्य शासन को खत्म करने वाली राजनीतिक उथल-पुथल से उभर कर बांग्लादेश ने भारत की तुलना में उच्च जीडीपी हासिल की थी। लेकिन गंभीर आर्थिक संकट से जूझते भारत की नरसिंहराव सरकार ने सुधारों की शुरुआत की। सांख्यिकीय रूप से बीमार विशाल भारतीय अर्थव्यवस्था की तुलना आबादी में आठ गुना छोटे बांग्लादेश से की जा रही थी। आखिर कैसे चुपचाप बांग्लादेश ने सुधार किया? सभी बड़ी ऐतिहासिक घटनाओं की तरह इसका कोई निश्चित उत्तर नहीं हो सकता है, बस अनुमान लगाया जा सकता है। फिर भी, महिलाओं के सशक्तीकरण के साथ शुरू होने वाले सामाजिक परिवर्तनों द्वारा बांग्लादेश में बड़े पैमाने पर आर्थिक बदलाव आया। इसे प्रधानमंत्री शेख हसीना के नेतृत्व में लोकतांत्रिक शासन से भी अपेक्षाकृत राजनीतिक स्थिरता मिली।
बांग्लादेश ने ग्रामीण बैंक और बीएआरसी जैसे स्वयंसेवी संगठनों का नेतृत्व किया। सरकार द्वारा हाल ही में किए गए काम के साथ, बांग्लादेश ने घरेलू और सार्वजनिक, दोनों क्षेत्र में लड़कियों को शिक्षित करने और महिलाओं को मुखर बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास किए हैं। इन प्रयासों ने बच्चों के स्वास्थ्य और शिक्षा में सुधार किया है, जैसे कि बांग्लादेशियों की औसत जीवन प्रत्याशा अब 72 साल है, जबकि भारतीयों के लिए 68 साल और पाकिस्तानियों के लिए 66 साल है।

बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था की संरचना ऐसी है कि इसकी जीडीपी औद्योगिक क्षेत्र और फिर सेवा क्षेत्र से संचालित होती है। इन दोनों क्षेत्रों ने भारी संख्या में रोजगार का सृजन किया है और कृषि की तुलना में इनमें कमाई ज्यादा है। दूसरी तरफ भारत अपने औद्योगिक क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए जूझ रहा है और ज्यादातर लोग अब भी कृषि पर निर्भर हैं। बांग्लादेश सरकार जमीनी स्तर पर आर्थिक समावेशन में पहल के लिए भी श्रेय की हकदार है, जिसके सकारात्मक प्रभाव विश्व बैंक के हाल में जारी आंकड़ों में दिखाई दे रहे हैं। बैंक खातों वाले वयस्क बांग्लादेशियों में से 34.1 फीसदी ने 2017 में डिजिटल लेनदेन किया, जबकि दक्षिण एशिया में यह आंकड़ा 27.8 फीसदी का ही है। इसके अलावा बांग्लादेश में मात्र 10.4 फीसदी बैंक खाते ही निष्क्रिय हैं, जबकि भारत में 48 फीसदी बैंक खाते निष्क्रिय हैं। 

बांग्लादेश में लैंगिक समानता भी दक्षिण एशिया में सबसे बेहतर है, जो सभी क्षेत्रों में दिखाई देती है। उसकी प्रगति उसके वस्त्र निर्माण उद्योग की सफलता है, जिसके श्रम बल में 70 फीसदी से अधिक महिलाएं हैं। इस तरह से सामाजिक और आर्थिक कारक सकारात्मक रूप से बदले हैं। भारत और पाकिस्तान, दोनों में प्रतिबंधात्मक औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 लागू है, जो ठेका श्रमिकों और कार्यबल के विस्तार पर रोक लगाता है। इस कानून के बगैर पैदा होने वाला बांग्लादेश विनिर्माण कंपनियों को बड़े पैमाने पर अर्थव्यवस्था का लाभ उठाने और रोजगार पैदा करने का बेहतर माहौल प्रदान करता है। हालांकि बांग्लादेश को श्रमिकों को व्यावसायिक खतरों से बचाने और कार्य स्थिति में सुधार के लिए मजबूत कानून बनाने की जरूरत है, जो निराशाजनक है। जब किसी देश की अर्थव्यवस्था उड़ान भरती है, तो भ्रष्टाचार, वंशवाद और असमानता बढ़ जाती है, और बांग्लादेश इसके लिए कुख्यात है। इससे उसका विकास बाधित हुआ है।

बांग्लादेश की जीवंत राजनीति भी दो महिलाओं के बीच की प्रतिद्वंद्विता के कारण बाधित होती है, जो एक दूसरे की राजनीतिक विरासत का विरोध करती हैं। शेख हसीना और बेगम खालिदा जिया के बीच तालमेल की कोई गुंजाइश नहीं है। देश की राजनीति इन्हीं दोनों के बीच का खेल बनकर रह गई है। नतीजतन नेतृत्व की कोई दूसरी लाइन नहीं है, जो इन दोनों बुजुर्ग नेत्रियों का स्थान ले सके। बांग्लादेश को रूढ़िवादी समूहों और धार्मिक कट्टरपंथियों से भी गंभीर खतरा है, जो प्रगतिशील सामाजिक सुधारों में बांग्लादेश के शुरुआती निवेश का विरोध करते हैं। उन निवेशों को उलटने से एक गंभीर और लंबा आर्थिक झटका लगेगा। बांग्लादेश को कट्टरवाद द्वारा उत्पन्न जोखिमों से सतर्क रहने की आवश्यकता है। इन्हें दूर करने के लिए शेख हसीना की गहरी प्रतिबद्धता को देखते हुए सफलता की उम्मीद की जा सकती है। 

कोई याद कर सकता है कि बेगम जिया की सरकार और बाद में सैन्य सरकार ने तीन अरब डॉलर की टाटा समूह की पेशकश को विफल कर दिया था। अगर बांग्लादेश ने उस पेशकश को स्वीकार किया होता, तो शायद पहले ही आर्थिक सुधार और समृद्धि की छलांग लगा चुका होता। निष्पक्ष रूप से कहें, तो भारत ने मित्रवत हसीना सरकार के प्रति उदारता दिखाई है, जब मनमोहन सिंह और प्रणब मुखर्जी तथा बाद में नरेंद्र मोदी ने सुनिश्चित किया कि भारत की चार अरब डॉलर की एकल देश सहायता बांग्लादेश को मिले।
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