भाजपा- आगे से लेफ्ट : कई लोगों के लिए यह इंदिरा गांधी को खारिज करने का अवसर था

shankar aiyyarशंकर अय्यर Updated Tue, 23 Jul 2019 03:46 AM IST
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बैंकों का राष्ट्रीयकरण
बैंकों का राष्ट्रीयकरण - फोटो : a

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समाजवादी राजनीति का बुनियादी सिद्धांत अमीरों से धन का दोहन कर गरीबों के पक्ष में खर्च करना और सत्ता अर्जित कर अमीरों में भय पैदा करना है। बीस जुलाई को बैंकों के राष्ट्रीयकरण की पचासवीं वर्षगांठ थी। उम्मीद के मुताबिक ही, इस अफसाने को तार्किक और तीखी आलोचना के साथ याद किया गया। कई लोगों के लिए यह इंदिरा गांधी को खारिज करने का अवसर था, तो दूसरों के लिए इतिहास को दोष देने का।
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नीतियों के मूल्यांकन में संदर्भ और परिस्थिति महत्वपूर्ण होती हैं। मेरी पुस्तक एक्सीडेंटल इंडिया के दास कैपिटल अध्याय में एक साथ आने वाले राजनीतिक और आर्थिक संकट के बारे में बताया गया है। बड़े पूंजीपति, जो बैंकों के मालिक भी थे, बचत को हथिया लेते थे और आपस में कर्ज बांट लेते थे, जिससे हरित क्रांति और छोटे उद्योगों के लिए धन मिलना मुश्किल हो जाता था। राजनीतिक धरातल पर इंदिरा गांधी ने एक आर्थिक जरूरत को राजनीतिक गुण में बदल दिया।


भारत की सबसे बड़ी गलती थी, उदारीकरण के बाद भी राज्य के स्वामित्व को बनाए रखना। आम तौर पर सामाजिक कारण राजनीतिक कारण में परिवर्तित हो गया, जिससे याराना पूंजीपतियों को कर्ज मिलना आसान हो गया और इसी के फलस्वरूप एनपीए अब नौ लाख करोड़ रुपये का हो गया है।

जब सरकार ने बैंकिंग क्षेत्र में निजी खिलाड़ियों को लाइसेंस जारी किया, तो उसे स्टेट बैंक और संभवतः अन्य बड़े बैंकों को अपने पास रखना चाहिए था और निजी निवेशकों को छोटे बैंकों के प्रबंधन का प्रस्ताव देना चाहिए था, जिसमें सरकार की सीमित हिस्सेदारी होती। लेकिन ऐसा नहीं हुआ, न तो कांग्रेस के शासन में और न ही भाजपा के शासन में। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक पवित्र गाय बने रहे।
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