कड़वाहट के बीच बजट सत्र

नीरजा चौधरी Updated Mon, 22 Feb 2016 07:13 PM IST
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budget session in mid of bitterness

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हरियाणा में आरक्षण की मांग को लेकर जाट समुदाय का हिंसक आंदोलन, जेएनयू के छात्रों पर देशद्रोह के मुकदमे, इससे देश भर के केंद्रीय विश्वविद्यालयों के अनेक लोगों में आक्रोश और विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा कथित उत्पीड़न के चलते हैदराबाद विश्वविद्यालय में एक दलित शोध छात्र की त्रासद आत्महत्या (जिसका देश के विभिन्न हिस्सों में दलित समुदायों पर स्वाभाविक असर पड़ा है) जैसे अत्यंत विवादास्पद मुद्दों की पृष्ठभूमि में आज से संसद का बजट सत्र शुरू हो रहा है। इसके अलावा आगामी अप्रैल में असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, पुड्डुचेरी और केरल में होने वाले विधानसभा चुनावों की छाया भी बजट सत्र पर रहेगी। चुनावों वाले राज्यों में अपने मतदाताओं को संबोधित करने की अनिवार्यता के चलते न तो सत्ताधारी दल और न ही उन राज्यों में दखल रखने वाले विपक्षी दल संसद में अपने रुख में नरमी दिखाना चाहेंगे और इसका असर बजट सत्र में दिखेगा।
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रोहित वेमुला की आत्महत्या के बाद भाजपा खुद को बैकफुट पर पा रही है, बावजूद इसके कि नुकसान की भरपाई के लिए उसने क्या-क्या नहीं किया। मसलन, उसने साबित करने की कोशिश की कि रोहित दलित नहीं था। पर कुछ भी उसके पक्ष में नहीं दिख रहा। उसे यह भी पता है कि संसद में उसे भारी विरोध का सामना करना पड़ेगा।
उसके बाद जेएनयू का प्रकरण शुरू हुआ और भाजपा ने इस मुद्दे को उछालने की अनुमति दी, कन्हैया कुमार पर देशद्रोह का मुकदमा चलाकर 'राष्ट्रवाद' का कार्ड खेला, जो उसके लिए काफी सुविधाजनक है और जो संसद में अपने विरोधियों पर पलटवार करने की उसे क्षमता प्रदान करता है।
जाट आरक्षण के मुद्दे पर व्यापक हिंसा ने हरियाणा की खट्टर सरकार की अक्षमता उजागर करने के साथ-साथ भाजपा को बचाव की मुद्रा में ला दिया है। दलित और जाट, दोनों ने पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा को वोट दिया था और अगले साल उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में उनकी बड़ी भूमिका होगी। वह चुनाव इसलिए भाजपा के लिए काफी महत्वपूर्ण होगा। इसी कारण सरकार इस सत्र को लेकर बहुत परेशान है, जिसमें न केवल उसे बजट पारित करवाना है, बल्कि जीएसटी जैसे महत्वपूर्ण कानून पारित करवाने के साथ लंबित कामकाज को भी आगे बढ़ाना है।

विपक्ष और सत्ता पक्ष, दोनों तरफ से हो रहे शोर से ऐसा नहीं लगता कि वित्तीय कामकाज को छोड़कर संसद में और कुछ हो पाएगा। संभव है कि सत्र के पहले हफ्ते का, जिसमें रिवाज के मुताबिक राष्ट्रपति दोनों सदनों को संबोधित करते हैं, रेल बजट, आर्थिक सर्वेक्षण और केंद्रीय बजट पेश किया जाता है, कामकाज चलने दिया जाए। अतीत में भी गंभीर गतिरोध के बावजूद विपक्ष ने बजट पारित कराने में सरकार का सहयोग किया है, ताकि सरकार के पास पैसा उपलब्ध रहे और किसी तरह का सांविधानिक गतिरोध पैदा न हो।

समस्या यह है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच कड़वाहट कम नहीं हुई है। रोहित वेमुला की आत्महत्या और जेएनयू विवाद के बाद तो इसमें कुछ इजाफा ही हुआ है। इस बार प्रधानमंत्री ने खुद ही मोर्चा संभाला और पहली बार सभी दलों के नेताओं को अपने साउथ ब्लॉक स्थित कार्यायल में बुलाया। उन्होंने संसद के कामकाज को सुचारु रूप से चलने देने की अपील की। आम तौर पर सत्र शुरू होने से पहले लोकसभाध्यक्ष विभिन्न दलों के नेताओं को बुलाते हैं। इस बैठक में मोदी ने बहुत कुछ नहीं कहा, सिवा इसके कि वह सिर्फ भाजपा के प्रधानमंत्री नहीं है, बल्कि पूरे देश के हैं और विपक्षी दलों का कहा सुनना चाहते हैं।

बेशक प्रधानमंत्री की यह पहल स्वागतयोग्य है, पर कुछ सवाल हैं, जिनसे इन्कार नहीं किया जा सकता। जैसे कि प्रधानमंत्री अगर विपक्षी दलों तक पहुंचना चाहते हैं और महत्वपूर्ण लंबित विधेयकों को पारित कराने के लिए उनका सहयोग चाहते हैं, तो जीएसटी को, जो राज्यसभा में भाजपा का बहुमत नहीं होने के कारण अटकने वाला एकमात्र विधेयक है, सदन में लाने से कुछ ही दिन पहले उन्होंने गांधी परिवार पर व्यक्तिगत हमला क्यों किया? सार्वजनिक रूप से संसद को ठप करने का उन पर आरोप क्यों लगाया, जबकि वह जानते थे कि इससे कांग्रेस आहत होगी? इसी तरह भाजपा के अन्य नेताओं ने प्रधानमंत्री की बैठक के एक दिन पहले राहुल पर 'जेएनयू में राष्ट्रविरोधी ताकतों को उकसाने' का आरोप क्यों लगाया? ऐसा बयान देने का समय बड़ा अजीब था। बैठक के ठीक दो दिन बाद प्रधानमंत्री ने फिर विपक्ष और एनजीओ के खिलाफ एक और करारा हमला किया, कि वे उनकी सरकार को गिराना के लिए साजिश कर रहे हैं। इससे लोग हैरान हैं। क्या प्रधानमंत्री ने यह मान लिया है कि विपक्ष सहयोग नहीं करने वाला है, इसलिए राज्यसभा में बहुमत के अभाव में विधायी रास्ते के बजाय वह प्रशासनिक रास्ते से अपने सुधार कार्यक्रमों को आगे बढ़ाएंगे। लेकिन इससे संसद की गरिमा और उसके महत्व का क्या होगा?

संसद का कामकाज सुचारु रूप से चले, यह सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी है। यही वजह है कि सत्तारूढ़ दल जीत के लिए झुकता है, विरोधी समूहों तक पहुंच बनाता है, विपक्षी नेताओं को राजी करता है और इसके लिए कुछ अपनी कहता और कुछ उनकी सुनता है। चुनाव के समय सत्तारूढ़ पार्टी विपक्षी दलों पर करारा प्रहार करती है। लेकिन सरकार में रहने पर रुख बदलना पड़ता है। और अपेक्षित बहुमत नहीं होता है, तो अन्य दलों के भरोसे पर निर्भर रहना पड़ता है।

अगर सरकार ऐसा नहीं करती, तो विपक्ष भी जिद्दी बन जाता है। सरकार अब चाहे कुछ भी कहे, पर कांग्रेस यह बात नहीं भूल सकती कि जब यूपीए सत्ता में था, तब भाजपा ने उसके साथ कैसा सुलूक किया था। उस कारण संसदीय कामकाज बाधित हुआ था।

हाल के वर्षों में संसदीय गतिरोध पैदा होना कोई नई बात नहीं है। लेकिन अब चीजें बदल गई हैं और संसद जैसी संस्था के प्रभाव के बारे में चिंता पैदा होना इसी बदलाव का सूचक है।
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