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अंग्रेजीपंती को ठेंगा दिखाओ

sudheesh pachauriसुधीश पचौरी Updated Thu, 21 Jul 2016 08:04 AM IST
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सुधीश पचौरी
सुधीश पचौरी
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मानव संसाधन विकास मंत्रालय में नए राज्यमंत्री महेंद्रनाथ पांडे के हवाले से अंग्रेजी के एक अखबार में खबर छपी है कि वह चाहते हैं कि जो फाइलें उनके पास आएं, उनमें हिंदी में नोटिंग होनी चाहिए। साथ ही संसद में पूछे जाने वाले प्रश्न भी हिंदी में होने चाहिए। मंत्री जी का यह आग्रह हिंदी के विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम कहा जा सकता है।
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सब जानते हैं कि वर्तमान केंद्रीय सरकार के ज्यादातर मंत्री हिंदी प्रेमी हैं, शपथ लेते वक्त उनमें से अधिकांश ने हिंदी में शपथ ली है और इन दिनों संसद में होने वाली बहसों में भी बोलचाल की हिंदी का ही बोलबाला रहता है। प्रधानमंत्री समेत ज्यादातर मंत्री हिंदी में बोलते हैं। प्रवासी भारतीय तो प्रधानमंत्री की हिंदी के दीवाने बताए जाते हैं और अंग्रेजी के पत्रकार तक उनकी हिंदी वक्तृता की तारीफ करते हैं। फिर भी, मंत्री जी के उक्त आग्रह से संकेत मिलता है कि सरकार के दैनिक कामकाज में अब भी हिंदी का अपेक्षित उपयोग नहीं हो रहा। शायद इसीलिए मंत्री महोदय ने अपने विभाग को हिंदी में काम करने का आदेश दिया है।

राजभाषा कानून बने इतने बरस हो गए, लेकिन शासन के दफ्तरी कामकाज की भाषा अंग्रेजी बनी रही। कानून कागज पर ही बना रह गया। भाषाएं कानूनों से न बनती हैं, न चलतीं हैं। वे व्यवहार में बनती और चलती हैं। अगर हिंदी को प्रशासन में पूरी तरह सक्षम भाषा बनना है, तो वह ऐसे ही व्यवहार से बनेगी। इस मानी में महेंद्रनाथ पांडे का यह कदम मूल्यवान है।

किसी भी सरकार को अगर जनता तक पहुंचना है और पारदर्शी रहना है, तो उसे कामकाज में ‘भाषागत परदेदारी’ को हटाना जरूरी है। फाइल शुरू करने से लेकर अंतिम नीति निर्णय और उसके अमल में लाए जाने तक की प्रक्रिया अगर अंग्रेजी में ही होती है, तो वह पारदर्शी कैसे हो सकती है? वह देश की दो-तीन प्रतिशत अंग्रेजी जनता के लिए तो पारदर्शी हो सकती है, लेकिन बाकी जनता के लिए तो एक अजनबी दुनिया ही है। इसीलिए सरकारों और जनता के बीच एक दूरी बनी रहती है। ऐसी सत्ता जनता को अपनी-सी महसूस नहीं होती, चाहे वह लाख कहे कि वह जनता का ‘मेंडेट’ लिए है।

चुनावों में जब नेता लोग जनता से ‘जनादेश’ लेने आते हैं, तब तो प्रायः हिंदी में जनादेश मांगा करते हैं और जब सत्ता में आ जाते हैं, तो निर्णय प्रक्रियाओं में अंग्रेजी का बोलबाला चलने देते हैं? क्या जनता ने किसी सरकार को कभी अंग्रेजी में काम करने का जनादेश दिया है? ऐसा जनादेश न पिछली सरकारों को दिया था, न इसे दिया है। तब कामकाज में अंग्रेजी का बोलबाला क्यों?
शुरू में ऐसी खबरें जरूर आई थीं कि नई सरकार ने बाबुओं को हिंदी में काम करने के लिए हिंदी सीखने को कहा है, लेकिन अगर ढाई साल बाद एक नया मंत्री साग्रह कहता है कि उसके दफ्तर में आने वाली फाइलों की नोटिंग हिंदी में होनी चाहिए, तो यह बात कुछ और ही कहानी कहती है।

बहरहाल, हिंदी की एक समस्या उसके लिए बनाई गई प्रशासनिक एवं तकनीकी पारिभाषिक शब्दावली भी है, जो हिंदी वालों के लिए खासी कठिनाई पैदा करती है। वह अंग्रेजी की प्रशासनिक पदावली का हिंदी अनुवाद भर होती है। यह पदावली हिंदी को एकदम कृत्रिम बना डालती है। इससे हिंदी की अपनी सहजता, सरलता और पाठ की रवानगी खत्म हो जाती है और कई बार वह इतनी कठिन होती है कि उसका अर्थ समझने के लिए अंग्रेजी की शरण लेनी पड़ती है!

ऐसी हिंदी से तो हिंदी वाले भी दूर भागते हैं। ऐसी हिंदी से क्या फायदा, जिसे समझने के लिए अंग्रेजी का सहारा लेना पड़े? कामकाज की हिंदी में जब तक ऐसी हिंदी का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा, जिसमें हिंदी का स्वाद हो, रस हो और उसका जातीय ठाठ हो, तब तक उसमें दम नहीं आ सकता। न हिंदी की ठसक ही आ सकती। भाषाएं अपनी ठसक से मानी और जानी जाती हैं। वे मात्र अनुवाद नहीं होतीं। और न वे किसी की बांदी यानी अनुवाद बनकर चल पाती हैं। ऐसा नहीं है कि हिंदी को बरतने में कुछ समस्याएं नहीं आएंगी, लेकिन जब तक हिंदी बरतेंगे नहीं, तब तक उसके उपयोग के दौरान पैदा होने वाली नई-नई समस्याओं का पता कैसे चलेगा? बरतने की प्रक्रिया में ही मालूम पड़ेगा कि कितनी शुद्ध हिंदी चल सकती है, कितनी दैनिक बोलचाल वाली हिंदी चल सकती है और रोजमर्रा के चलन में आ चुकी तकनीकी पदावली के लिए अंग्रेजी के कितने शब्दों को नागरी में लिखकर काम किया जा सकता है? सामूहिक कामकाज में शुद्ध हिंदी से काम करने का हठ भी नादानी होगी। एक ‘त्रिमिश्रत भाषा’ ही अंग्रेजी की जगह ले सकती है। वह नई ‘हिंग्रेजी’ ही हो सकती है, जिसमें हिंदी, अंग्रेजी और उर्दू के अलावा चलन में आ गए अन्य भाषाओं के शब्द भी रहें। असल उद्देश्य सीधे संप्रेषण है। वह तीन-चार भाषाओं के मिश्रण से हो या दो भाषाओं के मिश्रण से हो! सरकारी आदेशों और गजट की भाषा ऐसी क्यों हो, जो अपठनीय हो?

किस तरह की भाषा सरकारी कामकाज में सटीक होगी? इसका पता भी तब लगेगा, जब एकाधिक मंत्रालय अपना ज्यादातर कामकाज हिंदी में शुरू करें। एक अवधि के बाद उसका मूल्यांकन किया जाए और फिर कोई नई कामकाजी भाषा की नीति बने और नया शब्दकोश विकसित हो। नए मंत्री महेंद्रनाथ पांडे स्वयं ही हिंदी वाले हैं, इसलिए उम्मीद की जा सकती है कि वह शुद्ध हिंदी से पैदा होने वाली समस्याओं से वाकिफ होंगे और एक नई कामकाजी भाषा की खोज में दिलचस्पी रखते होंगे। क्या पता इसी रास्ते से हिंदी सरकारी कामकाज में पूरी तरह सक्षम भाषा बनकर उभरे। दुर्भाग्य यह है कि अब तक हिंदी को हिंदी दिवस की भाषा ही माना गया। उसमें काम करने की जिद किसी ने नहीं ठानी! आशा की जानी चाहिए कि नए मंत्री का हिंदी-आग्रह उसे हिंदी दिवस की भाषा की छवि से मुक्त करके एक सक्षम कामकाजी भाषा बनने में मदद करेगा!

हिंदी साहित्यकार एवं आलोचक
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