अशांत काबुल में दो सत्ता केंद्रों की चुनौती

कुलदीप तलवार Updated Fri, 10 Oct 2014 12:24 AM IST
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Chalenge of two power centers in unrestful Kabul

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अफगानिस्तान में अशरफ गनी के राष्ट्रपति बनने और उनके प्रतिद्वंद्वी अब्दुल्ला अब्दुल्ला के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) के तौर पर कार्यभार संभालने के पूरे घटनाक्रम पर काफी समय से पूरी दुनिया की नजरें टिकी थीं। अफगान संविधान में फिलहाल सीआईओ का कोई पद नहीं है। इसके लिए अगले दो साल में अफगानों की महापंचायत (लोया जिरगा) बुलवाई जाएगी, जो इस नए पद पर मोहर लगाएगी। इस तरह का प्रयोग दुनिया के कई देशों में पहले भी हो चुका है। लेकिन अफगानिस्तान में दो विरोधियों का एक साथ सत्ता में आना कई सवाल खड़े करता है।
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इस नई व्यवस्था पर दो तरह का नजरिया सामने आ रहा है। ऐसे लोगों की कमी नहीं, जो मानते हैं कि नई सरकार ज्यादा समय तक टिक नहीं पाएगी और अगले दो साल में गनी और अब्दुल्ला व उनके समर्थकों में खींचतान शुरू हो जाएगी। अफगान मामलों के विशेषज्ञ पत्रकार यूसुफजई का मानना है कि सत्ता का साझा करने वाले दस्तावेज में अनेक खाली क्षेत्र हैं और समझौता प्रभावी रूप से नेताओं द्वारा इसकी भावना के सम्मान पर निर्भर करेगा। वहीं तालिबान ने एकता सरकार को दिखावटी करार देते हुए रद्द कर दिया है।
अब तक जो सामने आया है, उससे पता चलता है कि सत्ता के दो केंद्र बन गए हैं, ऐसे में टकराव की आशंका बनी हुई है। दूसरी तरफ ऐसे लोगों की कमी नहीं,  जो मानते हैं कि गनी और अब्दुल्ला, दोनों ही तर्जुबेकार नेता हंै और करजई सरकार में उच्च पदों पर काम कर चुके हैं। दोनों अमेरिका समर्थक हैं। फिर अशरफ गनी ने अमेरिका के साथ जो द्विपक्षीय सुरक्षा समझौता किया है, वह भी उम्मीद जगाता है।
मगर अशरफ गनी ने अनेक चुनौतियों के बीच सत्ता संभाली है। अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था बुरी तरह चरमरा चुकी है। अफगान बलों का वर्तमान स्तर बनाए रखने के लिए ही लगभग छह अरब डॉलर की जरूरत है, जबकि फौज को तनख्वाह देने के भी लाले पड़े हुए हैं। उनके सामने ऐसी विदेश नीति कायम करने की चुनौती भी है, जो

अफगानिस्तान को अपने पांव पर खड़ा कर सके। सुरक्षा के मोर्चेे पर तालिबान के अलावा अल कायदा और आईएस का खतरा भी मंडरा रहा है। गौरतलब है कि इस समय 34 प्रांतों में से 18 में तालिबान का प्रभाव है। ऐसे में, अगर तालिबान से बातचीत कर कोई समझौता करके उन्हें सरकार में शामिल कर लिया जाए, तो न सिर्फ देश में, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी शांति बहाली में मदद मिलेगी।

अगर अपने देश के संदर्भ में देखें, तो भारत पहला देश था, जिसके साथ अफगानिस्तान ने सामरिक सहयोग संधि पर हस्ताक्षर किए। अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण के लिए भारत अब तक दो अरब डॉलर की मदद दे चुका है। प्रधानमंत्री मोदी अपने अमेरिकी दौरे में उम्मीद जता चुके हैं कि अमेरिका अफगानिस्तान में वह गलती नहीं करेगा, जो उसने इराक में की थी। अफगानिस्तान को यदि खुशहाली और अमन का माहौल कायम करना है, तो दोनों नेताओं को कदम मिलाकर चलना होगा और अपने-अपने समर्थकों को नियंत्रण में रखना होगा।
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