विज्ञापन

मोदी की बदलती छवि और पस्त होते आलोचक

sudheesh pachauriसुधीश पचौरी Updated Wed, 12 Nov 2014 07:57 PM IST
विज्ञापन
changing image of Modi and battered critic
ख़बर सुनें
एक पत्रकार ने कहा कि मोदी एक रॉक स्टार हैं। दूसरे ने कहा कि वह बड़े आत्मविश्वास वाले नेता हैं। तीसरे ने कहा कि वह बड़े हार्ड वर्किंग हैं। एक मंत्री ने कहा कि वह न सोते हैं, न सोने देते हैं। दूसरे ने कहा कि मोदी का रुतबा इंदिरा गांधी के रुतबे की तरह है। एक पत्रकार ने फरमाया कि मोदी बड़े कर्मठ हैं। चुनाव से पहले उनकी भाषा कुछ हो, लेकिन जब काम में लगते हैं, तो उनकी भाषा बदल जाती है। कोई कहता है कि वह वक्ता बहुत अच्छे हैं। कोई कहता है कि वह ‘नो नॉन्सेंस’ वाले व्यक्ति हैं। एक बताते हैं कि आप उनसे मिलकर उनकी कर्मठता, निर्णय करने की क्षमता और समझ के कायल हुए बिना नहीं रह सकते।
विज्ञापन
पिछले नौ महीने से मोदी के बारे में तरह-तरह की बातें सुनने में आती हैं। जो पत्रकार उनके पक्के निंदक थे, वे अब उनके कसीदे पढ़ते नजर आते हैं। जो उनको फासीवादी कहा करते थे, वे किंकर्तव्यविमूढ हैं, क्योंकि मोदी की सरकार के आने के बाद भी वे पूरी तरह आजाद हैं और फेसबुक पर लगे रहते हैं। अब वे सुर कम उठते हैं, जो कहा करते थे कि मोदी गुजरात के दंगों के लिए जिम्मेदार हैं। जनता ने मोदी की बात मानकर ऐसे बेसुरों को एकबारगी जवाब दे दिया है। ऐसे तत्वों को काठ-सा मार गया है। उनकी बोलती मोदी ने बंद नहीं की, जनता ने की है।

मोदी को अमेरिका ने वीजा नहीं दिया, तो उनके निंदक बहुत प्रसन्न रहे। मगर जब देना पड़ा, तो मोदी के जलवे से अमेरिकी सांसद तक पराभूत हो गए। मोदी के निंदक क्यों अपने जीते-जी व्यर्थ हुए? उनकी आलोचना, उनका प्रतिपक्ष क्यों गिरा और खिरा? इसका एक कारण शायद यह है कि मोदी के अब तक के कहे और किए को उनके निंदक ध्यान से न सुनते हैं, न समझते हैं। उनके मन में निहित मोदी के प्रति घृणा इतनी प्रबल है कि वे उनके सदाशय को भी पहचानने और उनके मतलब को समझने में असमर्थ रहते हैं। मोदी ने पिछले नौ महीनों में जितना बोला है और जिस तरह की एकल मेहनत की है, उसमें बहुत कुछ ऐसा है, जो मोदी के लिए भी नया है। वह जनता के साथ जैसे-जैसे आत्मीय संवाद बढ़ाते गए, वैसे-वैसे उनकी भाषा, उनकी शैली, उनकी प्रस्तुति बदलती गई और उनका आत्मविश्वास और भी बढ़ता गया।

मोदी शायद अपनी ‘अतुलनीयता’ समझ गए हैं, लेकिन इसे वह प्रकट नहीं करते, जबकि उनके निंदक धीरे-धीरे अब इसे पहचान रहे हैं, और बयान में नरमी ला रहे हैं। उनकी प्रशंसाएं ‘किंतु-परंतु’ के साथ आती हैं, जो ऐसा कहने वालों की हताशा को ही व्यक्त करती है। जिस ‘सेल्फी’ जमाने में बंदा अपने को छोड़कर किसी दूसरे का नाम तक लेना गवारा नहीं करता हो, उस समय में निंदकों की तारीफ एक ‘तरकीब’ लगती है, जो निंदकों को जनतांत्रिक तमीज वाला होने का ‘प्रमाणपत्र’  लेने के लिए होती है। यहां ‘मजबूरी’ भी ‘उपलब्धि' बनाई जाती है।

मोदी की रणनीति यह भी है कि इस तरह की बातों का कोई जवाब न दिया जाए। उनका तो मंत्र है- वह अपना काम करें, हम अपना काम करें। मोदी जब इन बदले 'बेसुरों' को सुनते होंगे, तो मन ही मन जरूर हंसते होंगे। हालांकि उनको खुलकर हंसते हुए इस देश ने अब तक नहीं देखा!
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Spotlight

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Disclaimer


हम डाटा संग्रह टूल्स, जैसे की कुकीज के माध्यम से आपकी जानकारी एकत्र करते हैं ताकि आपको बेहतर और व्यक्तिगत अनुभव प्रदान कर सकें और लक्षित विज्ञापन पेश कर सकें। अगर आप साइन-अप करते हैं, तो हम आपका ईमेल पता, फोन नंबर और अन्य विवरण पूरी तरह सुरक्षित तरीके से स्टोर करते हैं। आप कुकीज नीति पृष्ठ से अपनी कुकीज हटा सकते है और रजिस्टर्ड यूजर अपने प्रोफाइल पेज से अपना व्यक्तिगत डाटा हटा या एक्सपोर्ट कर सकते हैं। हमारी Cookies Policy, Privacy Policy और Terms & Conditions के बारे में पढ़ें और अपनी सहमति देने के लिए Agree पर क्लिक करें।
Agree
Election
  • Downloads

Follow Us