कोरोना से ऐसे लड़ रहा है पाकिस्तान

mariana babarमरिआना बाबर Updated Sat, 23 May 2020 08:52 AM IST
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पाकिस्तान के कराची में एक मस्जिद में नमाज अदा करते लोग।
पाकिस्तान के कराची में एक मस्जिद में नमाज अदा करते लोग। - फोटो : PTI

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पाकिस्तान में कोविड-19 से संक्रमित लोगों की संख्या 50,000 से अधिक है, जबकि मौत का आंकड़ा 1,000 पार कर गया है। यह महसूस करते हुए, कि संक्रमण का आंकड़ा अब भी इतने खतरनाक स्तर पर नहीं पहुंचा है कि कोरोना के वक्र को समतल करने के लिए कदम उठाए जाएं, पाकिस्तान ने थोड़े दिन पहले एनसीओसी (नेशनल कमांड ऐंड ऑपरेशन्स सेंटर) का गठन किया, जिसके पीछे मंशा यह थी कि कोरोना से निपटने के लिए केंद्र, प्रांतीय सरकारें और सैन्य नेतृत्व एक साथ आएं।
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हालांकि डॉक्टरों और दूसरे विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा आंकड़े की तुलना में हालात ज्यादा गंभीर हैं। उनका कहना है कि पाकिस्तान कोविड-19 के एक ऐसे चरण में है, जहां जांच, संक्रमण, मौतें और हकीकत में भारी विसंगति है। इस मुद्दे पर बातचीत के लिए केंद्रीय योजना और विकास मंत्री असद उमर के नेतृत्व में  लगातार वीडियो कॉन्फ्रेंस हो रही है, जिनमें गिलगित-बाल्टिस्तान समेत सभी प्रांतों के मुख्यमंत्रियों के अलावा मुख्य सचिव हिस्सेदारी कर रहे हैं। ऐसी कई बैठकों में प्रधानमंत्री इमरान खान और सेनाध्यक्ष जनरल कमर जावेद बाजवा भी शामिल हुए।
एयर डिफेंस कमांड के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल हमुद उज्जमान खान को एनसीओसी का प्रमुख बनाया गया है। इस संस्था का काम कोविड-19 की जांच करना, संक्रमितों का पता लगाना और इसके लिए रणनीति बनाना, इलाज के लिए उपलब्ध सुविधाओं का आकलन करना और कोरोना के इलाज के लिए जरूरी मेडिकल उपकरणों के घरेलू उत्पादन की संभावनाएं तलाश करना है।
इस महामारी से निपटने के लिए केंद्र और प्रांतीय सरकारों के बीच तालमेल बनाना एनसीओसी का एक प्रमुख काम है। चूंकि सरकार की कोशिशों के बावजूद देश में संक्रमण के मामले बढ़ रहे हैं, ऐसे में, फैसला यह भी किया गया कि इस मुद्दे पर केंद्र और प्रांतीय सरकारों के बीच तालमेल की कोशिशों पर सेना नजर रखेगी।

लेकिन कोरोना से लड़ने के लिए जब केंद्र और प्रांतीय सरकारों के बीच तालमेल होना चाहिए, तब देखा यह जा रहा है कि केंद्र और सिंध की पीपीपी (पाकिस्तान पीपल्स पार्टी) सरकारें एक दूसरे के खिलाफ खड़ी हैं। वे न सिर्फ एक दूसरे को कमतर बता रही हैं, बल्कि उनकी रणनीति की आलोचना भी कर रही हैं, जिनसे साजिश रचने के आरोपों और लोगों की नाराजगी बढ़ने को बल मिल रहा है।

फिलहाल केंद्र सरकार पसोपेश में है कि वह लॉकडाउन को सख्ती से लागू करे या इसमें ढील देते हुए इसे धीरे-धीरे खत्म करे, ताकि दुकानों और उद्योगों को खोला जा सके। इसी स्थिति से गुजर रहे दुनिया के दूसरे देशों की तरह पाकिस्तान भी यह चाह रहा है कि जीविका के लिए लोग अपना कारोबार शुरू करें, लेकिन साथ में यह भी सुनिश्चित करें कि संक्रमण न फैले।

इस सिलसिले में सरकार ने हफ्ते में चार दिन दफ्तरों और कारोबार को खोलने की मंजूरी देकर सही फैसला किया है, जबकि शुक्रवार, शनिवार और रविवार को लॉकडाउन का सख्ती से पालन किया जाएगा। लेकिन प्रधानमंत्री इमरान खान तब हैरान रह गए, जब सुप्रीम कोर्ट के प्रधान  न्यायाधीश ने जब सरकार के इस फैसले पर स्वतः संज्ञान लेते फैसला दिया कि ईद के कारण हफ्ते में सातों दिन दुकान और बाजार खुले रहेंगे। उन्होंने कहा, 'हमारे मुल्क के लोग गरीब हैं, लिहाजा उन्हें रोजी- रोटी कमाने की जरूरत है।'

बहुतेरे लोगों ने जहां सुप्रीम कोर्ट के फैसले को सराहा, वहीं कुछ लोगों ने अदालत के इस लोकप्रियतावादी फैसले की नुक्ताचीनी करते हुए कहा है कि यह फैसला देने से पहले प्रधान न्यायाधीश को चिकित्सा विशेषज्ञों से सलाह लेनी चाहिए थी, क्योंकि सातों दिन बाजार खुले रहने से संक्रमण तेजी से फैलेगा।

प्रधान न्यायाधीश ने देश भर के मॉल्स को भी खोले जाने का आदेश दिया, जबकि केंद्र और प्रांतीय सरकारों ने भीड़ बढ़ने की आशंका से मॉल बंद रखने के लिए कहा था। सिंध की सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले की सख्त आलोचना करते हुए कहा है कि सुप्रीम कोर्ट को यह ध्यान में रखना चाहिए था कि जो फैसला उसने दिया है, वह दरअसल सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा कोविड-19 को वैश्विक महामारी घोषित करने के निर्णय के विपरीत लगता है। हकीकत यह है कि इस वायरस से दुनिया भर में 50 लाख से अधिक लोग संक्रमित हुए हैं और मारे गए लोगों का आंकड़ा तीन लाख पार कर गया है। लेखक और विश्लेषक जाहिद हुसैन कहते हैं, 'यह साफ है कि केंद्रीय नेतृत्व में संजीदगी का अभाव है, और वह अस्तित्व पर आए इस संकट से कारगर ढंग से निपटने में सक्षम नहीं है।

लोगों के स्वास्थ्य पर अर्थव्यवस्था को तरजीह देते हुए उसने बेवजह ही एक विवाद खड़ा कर दिया है। जबकि मुद्दा इन दोनों के बीच बेहतर संतुलन बनाने का है। अदालत के ताजा फैसले और केंद्र सरकार के ढुलमुल रवैये ने महामारी के इस मुश्किल दौर में देश को अराजक स्थिति में धकेल दिया है।'

देश के नामचीन धर्मगुरुओं ने मस्जिदों में न आकर घर में ही इबादत करने के सरकार के फैसले को मानने से जिस तरह इन्कार कर दिया है, वह भी हालात की गंभीरता के बारे में बताता है। दरअसल मार्च में ही संक्रमण रोकने के इरादे से धार्मिक जमावड़े पर प्रतिबंध लगा दिया था। संक्रमण फैलने के शुरुआती दौर में ही पंजाब सरकार द्वारा तब्लीगी जमात के आयोजन को मंजूरी देने के फैसले की तीखी आलोचना हुई थी, क्योंकि उसी से सैकड़ों लोग संक्रमित हुए थे। उसके बाद धर्मगुरुओं के दबाव में आकर केंद्र सरकार को जुमे की नमाज की इजाजत देनी पड़ी। जबकि सिंध की सरकार ने जुमे को भी लॉकडाउन की सख्ती जारी रखी।

इसी सप्ताह नामचीन धर्मगुरुओं और विद्वानों ने देश भर की मस्जिदों में पांचों वक्त की नमाज के दौरान लोगों के जमावड़े की फिर से शुरुआत करने की घोषणा की है। उनका मानना है कि सरकार उनके इस फैसले में रोड़े नहीं अटकाएगी। एक विशेषज्ञ का कहना है, 'ऐसे कई देशों के उदाहरण हमारे सामने हैं, जहां कोविड-19 से मरने वालों का आंकड़ा बहुत अधिक है; ये वे देश हैं, जिन्होंने शुरुआती दौर में इसे संजीदगी से नहीं लिया। पाकिस्तान का स्वास्थ्य ढांचा पहले से ही भारी दबाव में है और सैकड़ों डॉक्टर व स्वास्थ्यकर्मी संक्रमित हो चुके हैं। ऐसे में, रोजमर्रा के जनजीवन को खोलने के फैसले से संक्रमण बढ़ना तय है।' (वरिष्ठ पाकिस्तानी पत्रकार)
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