कोरोना काल में पाकिस्तान के अल्पसंख्यक

mariana babarमरिआना बाबर Updated Fri, 08 May 2020 12:18 AM IST
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पाकिस्तान का झंडा
पाकिस्तान का झंडा - फोटो : Social media

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कोरोना वायरस के कारण पश्चिमी जगत, पश्चिम एशिया और दक्षिण एशिया के किसी भी देश में हाशिये के नागरिक सबसे असुरक्षित हैं। चाहे अमेरिका हो या ऑस्ट्रेलिया, सबसे ज्यादा प्रभावित होने वालों में हाशिये के वे लोग हैं, जो कोरोना से संक्रमित हुए। कोरोना के बाद के प्रभावों में आर्थिक चुनौतियां भी शामिल हैं, जिनका आज ये लोग सामना कर रहे हैं। इन देशों और समाजों में अल्पसंख्यक हाशिये पर हैं। ताजा रिपोर्टों के मुताबिक, ब्रिटेन में सबसे ज्यादा प्रभावितों में दक्षिण एशियाई लोग हैं, जिनमें पाकिस्तानी, भारतीय और बांग्लादेशी शामिल हैं। अमेरिका में अश्वेत समुदाय अल्पसंख्यक हैं।
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पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की आबादी कम होने के कारण समस्याओं से जूझने के बावजूद वे बड़े पैमाने पर प्रभावित नहीं है, जैसा कि इस क्षेत्र में दिखाई देता है। इसके अलावा रमजान के इस महीने में पाकिस्तानी गरीबों  की मदद करने के लिए निकले और कोरोना वायरस के दौर में अल्पसंख्यकों की मदद की। हर मुस्लिम परिवार के लिए गरीबों को दी जाने वाली खैरात और जकात अनिवार्य है। धर्मार्थ दान के मामले में पाकिस्तान एक उदार देश है और स्टैंडफोर्ड सोशल इनोवेशन रिव्यू के एक अध्ययन के मुताबिक, यह जीडीपी का एक फीसदी से ज्यादा दान करता है।
पाकिस्तान सेंटर फॉर फिलॉन्थ्रॉपी के एक अध्ययन से पता चलता है कि यह मुल्क सालाना 240 अरब रुपये धर्मार्थ दान करता है वर्ष 1947 में पाकिस्तान में 23 फीसदी अल्पसंख्यक थे, जो आज घटकर चार फीसदी रह गए हैं। पाकिस्तान में कई छोटे-छोटे धार्मिक समूह हैं, जिनमें सिख, पारसी, जिकरी, बहाई, बौद्ध और कलश शामिल हैं, लेकिन हिंदू, ईसाई और अहमदिया बड़े और बेहद प्रमुख अल्पसंख्यक धार्मिक समूह हैं। इसके अलावा ट्रांसजेंडर समूह भी हैं, जिन्हें सरकार ने राष्ट्रीय पहचान पत्र, ड्राइविंग लाइसेंस और पासपोर्ट प्रदान किए हैं।
ट्रांसजेंडर मरीजों के लिए इस्लामाबाद के अस्पताल में विशेष वार्ड बनाए गए हैं। हाल ही में लॉकडाउन के कारण पीड़ित ट्रांसजेंडर समुदाय के सदस्यों के बीच राशन बांटा गया। कोरोना वायरस ने सभी पाकिस्तानियों के लिए चुनौतियां पैदा की हैं, लेकिन ज्यादातर शिकायतें ईसाई समुदाय से आई हैं। हिंदू अल्पसंख्यकों की ओर से बहुत ज्यादा शिकायतें सुनने को नहीं मिली हैं, क्योंकि उनके बीच कुछ बहुत ज्यादा अमीर, धनवान व्यापारी और जमींदार लोग हैं। इसके अलावा उनके बीच आपसी रिश्ते बहुत मजबूत हैं।

हिंदुओं की बड़ी आबादी सिंध में रहती है, जहां वे एक-दूसरे की मदद करती है। लेकिन अमेरिकी अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग की शिकायत थी कि पाकिस्तान में कोविड-19 के प्रसार के बीच हिंदुओं और ईसाइयों को भोजन की मदद जान-बूझकर नहीं दी जा रही। आयोग के निशाने पर खासकर कराची था, जहां से ऐसी खबरें आई हैं कि बेघर और मौसमी कामगारों की मदद के लिए स्थापित एक गैर-सरकारी संगठन सयानी वेलफेयर इंटरनेशनल ट्रस्ट, हिंदुओं और ईसाइयों को खाद्य सहायता देने से इन्कार करता रहा है।

सरकार ने तुरंत इस शिकायत पर ध्यान दिया और समस्या का हल किया। प्रधानमंत्री इमरान खान ने एक बार फिर दोहराया कि अल्पसंख्यकों का खासकर ध्यान रखा जाए, क्योंकि ये पाकिस्तानी नागरिक हैं। लॉकडाउन की वजह से नौकरी गंवाने वाले गरीबों आदि के लिए भी बड़े पैमाने पर आर्थिक कार्यक्रम चलाया गया है, जिसके तहत हर महीने हर आदमी को 12,000 रुपये दिए जा रहे हैं। इसका पैमाना मजहब नहीं है, लिहाजा सभी लोग मदद के लिए आवेदन कर सकते हैं, पर उन्हें यह साबित करना होगा कि वे मुश्किलों का सामना कर रहे हैं।

इसके अलावा पाकिस्तान में वॉलंटियर्स खासकर उन इलाकों में राशन का थैला बांट रहे हैं, जहां अल्पसंख्यक रहते हैं। मुझे पेशावर से एक खबर मिली, जिसमें कहा गया था कि असंगठित क्षेत्र के अल्पसंख्यकों को नगर
निगम में काम करने वालों की तुलना में ज्यादा परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले (जिसमें अल्पसंख्यकों के लिए एक निकाय की जरूरत बताई गई थी) के छह साल बाद सरकार अल्पसंख्यकों के लिए राष्ट्रीय परिषद बनाने के इरादे से एक बिल लाने वाली है, जिसे आगे की कार्यवाही के लिए संसद में पेश किया जाएगा।

मसौदा विधेयक के मुताबिक, परिषद के सभी सदस्य गैर-मुस्लिम होंगे और यह विधेयक लंबे समय से उत्पीड़न के डर में जी रहे धार्मिक अल्पसंख्यकों को अपने भाग्य का फैसला स्वयं करने का अधिकार देगा। विधेयक बताता है कि यह न केवल धार्मिक अल्पसंख्यकों के सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक अधिकारों की रक्षा करने, बल्कि उन्हें बढ़ावा देने में भी महत्वपूर्ण साबित होगा। नतीजतन यह मुल्क की राजनीतिक नींव भी मजबूत करेगा।

पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के साथ व्यवहार हमेशा एक विवादास्पद मुद्दा रहा है, लेकिन अल्पसंख्यकों की सदस्यता वाला निकाय सरकार को यह बता सकता है कि उत्पीड़न से बचाने के लिए वास्तव में क्या जरूरी है। इस हफ्ते जैसे ही कोरोना संक्रमित लोगों की संख्या बीस हजार पार कर गई, सरकार ने राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के गठन को अंतिम रूप दे दिया। यह बिल अल्पसंख्यकों की लंबे समय से मांग का जवाब है, जो चाहते थे कि सरकार रोजगार, शिक्षा और समाज में भेदभाव को रोकने के लिए कानून बनाए और नफरत फैलाने वाली चीजों को किताबों से हटाया जाए। यदि यह बिल संसद से पारित हो जाता है, तो यह देश में रहने वाले अल्पसंख्यकों को मौलिक अधिकारों की गारंटी देने वाले कानूनी ढांचे को मजबूत करेगा। (लेखिका वरिष्ठ पाकिस्तानी पत्रकार हैं।)
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