अरुणाचल का संकट

नीलांजन मुखोपाध्याय Updated Sun, 31 Jan 2016 08:04 PM IST
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Crisis of Arunachal pradesh

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भारत का कोरा नक्शा सामने रख देने पर कम ही लोग उसमें पूर्वोत्तर के अलग-अलग राज्यों की शिनाख्त कर पाएंगे। उन राज्यों के मुख्यमंत्रियों का नाम बताने वाले लोग और कम होंगे। यहां तक कि औसत विद्वान भी उन राज्यों के लोगों, वहां की राजनीति और संस्कृति के बारे में नहीं बता सकते। अब तक पूर्वोत्तर के सिर्फ एक राजनेता को राष्ट्रीय राजनीति में अपनी व्यापक पहचान बनाने में सफलता मिली है। चूंकि पूर्वोत्तर के प्रति हमारा रुख केंद्र सरकार के रवैये और उनकी नीति से तय होता है, ऐसे में सजगता की हमेशा जरूरत पड़ती है। अरुणाचल प्रदेश के साथ भी यही हुआ है, जो अब एक गंभीर राजनीतिक और सांविधानिक संकट से जूझ रहा है।
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अरुणाचल में विधानसभा चुनाव लोकसभा चुनाव के साथ ही हुआ था, जिसमें कांग्रेस विजयी हुई थी। साठ सीटों वाली विधानसभा में कांग्रेस को 42 सीटें मिली थीं, और नवंबर, 2011 से मुख्यमंत्री रहे नबाम तुकी दोबारा मुख्यमंत्री चुने गए थे। विधानसभा चुनाव में 11 सीटों के साथ भाजपा दूसरे स्थान पर रही थी। अरुणाचल पहला राज्य है, जहां 1998 में भाजपा को एक क्षेत्रीय सहयोगी मिला था; तब गेगांग अपांग की पार्टी कांग्रेस से टूटकर उसके साथ आई थी। अपांग बाद में भाजपा में आए और मुख्यमंत्री बने। इसी कारण भाजपा तुकी की सरकार को पलटने की ताक में थी।
विडंबना यह है कि भाजपा की इस रणनीति की निष्क्रिय कांग्रेस को भनक तक नहीं लगी। 2014 के आखिर में मुख्यमंत्री तुकी ने जब एक वजनदार मंत्री कलिखो पुल को बर्खास्त किया था, ठीक तभी से चीजें बदलनी शुरू हो गई थीं। उसी समय अपांग के नेतृत्व वाली भाजपा सत्ताधारी कांग्रेस को तोड़ने की कोशिश में लग गई थी। 2015 के मध्य में केंद्र सरकार ने एक ऐसे व्यक्ति को वहां का राज्यपाल नियुक्त किया, जो उस राज्य की राजनीति को बखूबी समझता था। दूसरी ओर, तुकी ने इस दौरान न तो प्रशासन के मोर्चे पर बेहतरी का परिचय दिया, न ही वित्तीय प्रबंधन की कुशलता का। विगत दिसंबर में जब वहां कांग्रेस में टूट-फूट की आशंका बढ़ने लगी, तब राज्यपाल ने संविधान का पालन करने के बजाय पक्षपाती राजनीति का परिचय देना शुरू किया। तय समय से एक महीना पहले विधानसभा सत्र शुरू करने के लिए कहने के बजाय राजखोवा को मुख्यमंत्री तुकी से संपर्क साधना चाहिए था। जाहिर है, राज्यपाल अगर थोड़े संजीदा होते, तो आज केंद्र सरकार पर यह आक्षेप नहीं लगता कि अरुणाचल में राष्ट्रपति शासन लागू करते हुए उसने दरअसल राजनीतिक पक्षपात का परिचय दिया है।
जब विधानसभा अध्यक्ष नबाम रेबिया ने तुकी के समर्थन से विधानसभा परिसर में सत्र बुलाने से मना कर दिया, तो अंसतुष्टों ने 11 भाजपा सदस्यों एवं दो निर्दलीय सदस्यों के साथ मिलकर 16 एवं 17 दिसंबर, 2015 को एक अस्थायी विधानसभा में डिप्टी स्पीकर टी. नोरबू थोंगडॉक की अध्यक्षता में, जो एक बागी कांग्रेसी हैं, सत्र आयोजित किया, जिसमें अविश्वास प्रस्ताव पारित किया गया। मुख्यमंत्री के खिलाफ लाए गए अविश्वास प्रस्ताव के समर्थन में 33 विधायकों ने मतदान किया। उन्होंने रेबिया के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पारित करने के अलावा पुल को सदन का नेता भी चुना।

हालांकि भाजपा का असली इरादा तब स्पष्ट नहीं था, पर पार्टी के एक नेता द्वारा हाल ही में किए गए इस दावे के बाद, कि पारंपरिक रूप से जो पार्टी केंद्र में सत्ता में होती है, वही अरुणाचल प्रदेश में शासन करती है, इसमें कोई संदेह नहीं रह गया है। यह कांग्रेस सरकार को विस्थापित कर उसकी जगह एक अनुकूल सरकार लाने में पार्टी की भूमिका और इच्छा को स्वीकार करने के समान है। इसकी शुरुआत राजखोवा द्वारा राज्य विधानसभा का सत्र बुलाने के फैसले से हुई, जिसमें राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करने की राज्यपाल की सिफारिश का फैसला लिया गया। उन्होंने इसके कारण गिनाए हैं, लेकिन राज्य में केंद्रीय शासन लागू करने के सरकार के फैसले की अब सुप्रीम कोर्ट में जांच हो रही है। सर्वोच्च न्यायालय की सांविधानिक पीठ में आज होने वाली सुनवाई पर सबकी नजर रहेगी। पहले भी ऐसे उदाहरण हैं, जब केंद्रीय शासन को संविधान का उल्लंघन बताया गया। 1990 के दशक के एस. आर. बोम्मई मामले का ऐसे संदर्भों में उचित ही हवाला दिया जाता है, और यह एक स्थापित कानून है कि सरकार के बहुमत की परीक्षा सदन में होनी चाहिए।

केंद्र एवं भाजपा का तर्क है कि सवाल तुकी के बहुमत खोने का ही नहीं है, बल्कि राजखोवा की रिपोर्ट में अन्य कारकों का भी उल्लेख किया गया है, जिसमें मिथुन (जंगली भैंसे) की बलि का भी मामला शामिल है। राजखोवा ने राज्य में वित्तीय गड़बड़ियों का भी हवाला दिया है, जिसके चलते केंद्रीय शासन जरूरी है। अदालत ही यह फैसला करेगी कि क्या राज्यपाल ने अपने अधिकार से बाहर जाकर काम किया है और क्या देश के संघीय चरित्र को कमजोर करने के लिए राजभवन का दुरुपयोग किया।

आगामी बजट सत्र और भी हंगामेदार होगा, क्योंकि राज्यसभा में कार्यवाही स्थगित करने के लिए कांग्रेस को काफी मुद्दा मिल गया है। ऐसे में राष्ट्रपति शासन लागू करने के फैसले पर संसदीय मोहर लगवाना सरकार के लिए कठिन होगा, जो छह महीने के भीतर अनिवार्य है। पर बहुत संभव है कि कांग्रेस के बागी शीघ्र ही भाजपा विधायकों के समर्थन से सरकार गठन का दावा पेश करने राजभवन जाएंगे। राज्यपाल पुल को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करेंगे, जिन्हें पहले ही बागी गुट का नेता चुन लिया गया है। वह मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेंगे और उन्हें बहुमत साबित करने के लिए पर्याप्त समय दिया जाएगा। वह आसानी से बहुमत साबित करेंगे और उसके बाद राजनीति अगले प्रकरण तक पटरी पर लौट आएगी! पूर्वोत्तर में ऐसी राजनीतिक उथल-पुथल पहले भी देखी गई है। अल्पकालिक राजनीतिक लाभ के लिए भाजपा ने खुद ही राजनीतिक संकटों को न्योता दिया है। लेकिन भाजपा से ज्यादा इसका हमारे लोकतांत्रिक गणराज्य के लिए गंभीर निहितार्थ हैं।

वरिष्ठ पत्रकार एवं नरेंद्र मोदी ः द मैन, द टाइम्स के लेखक

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