लोकतंत्र की साख खतरे में

कुलदीप तलवार Updated Thu, 26 Dec 2013 07:53 PM IST
विज्ञापन
Democracy in danger in Bangladesh

पढ़ें अमर उजाला ई-पेपर
कहीं भी, कभी भी।

*Yearly subscription for just ₹299 Limited Period Offer. HURRY UP!

ख़बर सुनें
बेगम खालिदा जिया के नेतृत्व में विपक्षी गठबंधन ने प्रधानमंत्री शेख हसीना के पद छोड़ने और एक कार्यवाहक सरकार के नेतृत्व में चुनाव कराने की मांग को लेकर अब जो आंदोलन शुरू किया है, उससे वहां हिंसा का एक नया दौर शुरू हो गया है। बीएनपी कार्यकर्ताओं के हुजूम ने राजमार्गों की घेरेबंदी कर डाली है, पुलिस और सुरक्षा बलों को निशाना बनाकर बम विस्फोट कर रहे हैं और कई शहरों में सत्ताधारी पार्टी के दफ्तरों पर हमले किए जा रहे हैं। पुलिस-प्रशासन की जवाबी कार्रवाई और अवामी लीग कार्यकर्ताओं द्वारा हिंसा का जवाब हिंसा से दिए जाने से अब यह आशंका पैदा हो गई है कि अगले महीने बांग्लादेश में चुनाव हो भी पाएंगे या नहीं।
विज्ञापन

दरअसल अवामी लीग पर दोतरफा हमला हो रहा है। एक हमला तो खैर राजनीतिक ही है। इसके अलावा 1971 के मुक्तियुद्ध में छात्रों और बुद्धिजीवियों का सामूहिक कत्ल करने के दोषी अब्दुल कादिर मुल्ला को फांसी पर चढ़ाए जाने से नाराज जमाते इस्लामी के लोग पहले से ही सड़क पर हैं। जबकि देश का एक बड़ा वर्ग मुल्ला को फांसी देने से खुश है और शेख हसीना सरकार का शुक्रिया अदा कर रहा है। जबकि खालिदा जिया द्वारा इसका विरोध लाजिमी है। एक तो पाकिस्तान और कट्टरपंथ से उनका लगाव जगजाहिर है। उस पर मुल्ला जिस जमाते-इस्लामी से जुड़े थे, वह बीएनपी का साझेदार है। यानी बांग्लादेश में चल रही लड़ाई उदारवाद और कट्टरपंथ के बीच में है। चूंकि जमाते-इस्लामी के शीर्ष नेताओं के खिलाफ अवामी लीग की कार्रवाई के पक्ष में लाखों युवाओं को पिछले दिनों सड़कों पर उतरते देखा गया था, इसलिए यह उम्मीद बनती है कि इस लड़ाई में जीत उदारवाद की होगी।
इसके बावजूद इस समय वहां जो हिंसा हो रही है, उसका भारी नुकसान बांग्लादेश को है। वहां के इन हालात पर अंतरराष्ट्रीय बिरादरी भी चिंतित है। अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन केरी ने शेख हसीना से मुलाकात कर उन्हें सलाह दी है कि वह खालिदा जिया के साथ बैठकर सहमति बनाएं। भारत की विदेश सचिव सुजाता सिंह ने भी बांग्लादेश की दोनों बेगमों को यही संदेश दिया है। लेकिन इसका कोई असर अभी तक तो नहीं दिखा है।
दरअसल बीएनपी की मांगें लंबी-चौड़ी हैं, जिन्हें पूरा करना आसान नहीं। उसकी सबसे प्रमुख मांग यह है कि जेल में बंद उसके तमाम नेताओं-कार्यकर्ताओं की रिहाई हो। जबकि अवामी लीग की शर्त है कि बीएनपी हड़ताल बंद करे, शहरों में दंगे-फसाद न फैलाए, तोड़फोड़, आगजनी और सत्ताधारी पार्टी के कार्यकर्ताओं की गाड़ियों को निशाना न बनाए। कानून-व्यवस्था चरमराने और हड़तालों की वजह से देश के 22 अरब डॉलर के वस्त्र उद्योग को करारा धक्का लगा है। नतीजतन श्रमिक बेकारी का सामना कर रहे हैं। शिक्षा-व्यवस्था ठप पड़ गई है, क्योंकि स्कूल-कॉलेज और विश्वविद्यालय बंद हैं। दोनों बेगमों की जिद से बांग्लादेश का लोकतंत्र भी खतरे में पड़ सकता है। एक राय यह है कि अगर बांग्लादेश की सबसे बड़ी विपक्षी बीएनपी और उसके सहयोगी दल चुनाव में हिस्सा नहीं लेते, तो 300 सदस्यीय संसद में 151 उम्मीदवार निर्विरोध चुने जा सकते हैं, जिनका संबंध सत्ताधारी अवामी लीग व उसके गठजोड़ में शामिल दूसरी पार्टियों से होगा। लेकिन इससे लोकतंत्र की साख नहीं बढ़ेगी। यह साख तभी बढ़ेगी, जब सारी पार्टियां चुनाव में हिस्सा लें।

एक आशंका यह भी बनी हुई है कि गतिरोध की ऐसी सूरत में वहां 2007 जैसे हालात पैदा न हो जाएं। वर्ष 2001 से 2006 तक वहां बीएनपी और जमात की मिली-जुली सरकार थी। यह गठबंधन 2007 में जबरन दोबारा सत्ता में आना चाहता था। वैसे में फौज की दखलंदाजी हुई और 2008 में उसकी निगरानी में आम चुनाव हुए और अवामी लीग सत्ता में आई। कोशिश करनी चाहिए कि फिर से ऐसे हालात पैदा न हों। ऐसे में यही कहा जा सकता है कि वहां लोकतंत्र को कायम रखने के लिए, गरीब अवाम के हितों का ख्याल रखते हुए जरूरी है कि दोनों पक्ष जल्दी ही किसी नतीजे पर पहुंचें। अगर ऐसा न हुआ, तो भारत को भी मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा। क्योंकि हजारों की संख्या में बांग्लादेशी नागरिक जान बचाकर पश्चिम बंगाल और असम में शरण लेने आ सकते हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Spotlight

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
Election
X

प्रिय पाठक

कृपया अमर उजाला प्लस के अनुभव को बेहतर बनाने में हमारी मदद करें।
डेली पॉडकास्ट सुनने के लिए सब्सक्राइब करें

क्लिप सुनें

00:00
00:00
X
  • Downloads

Follow Us