गांवों में भी पांव पसार रहा है अवसाद, वजहें गिना रहे हैं प्रदीप श्रीवास्तव

Pradeep Srivastavaप्रदीप श्रीवास्तव Updated Tue, 22 Sep 2020 02:37 AM IST
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Depression
Depression - फोटो : pixabay

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भारतीय समाज में मानसिक रोग और इससे जुड़ी समस्याएं आज भी शर्म की बात मानी जाती है। लोग इसके बारे में खुल कर बात नहीं करते। मानसिक रोगी को ‘पागल’ कहकर उसकी बीमारी को ही खारिज कर देते हैं। खासकर, ग्रामीण इलाकों में इस पर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया जाता।
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भारत तेजी से प्रगति कर रहा है, लेकिन डिप्रेशन (अवसाद) की बीमारी भी चुपके-चुपके पांव पसार रही है। आंकड़े बताते हैं कि विगत दशकों में बदलते परिवेश, आधुनिक जीवन-शैली, तात्कालिक विफलता और बढ़ती बेरोजगारी के कारण ग्रामीण भारत के युवाओं में डिप्रेशन के कारण आत्महत्या करने की प्रवृति बढ़ी है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के अनुसार, 2019 में कुल 1,39,123 लोगों ने आत्महत्या की है, जिसमें बेरोजगारों की संख्या 14,019 थी, जो 2018 की तुलना में 8.37 प्रतिशत अधिक है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, देश में करीब 23 लाख लोगों को तात्कालिक तौर पर मानसिक स्वास्थ्य संबंधी देखभाल की जरूरत है। जबकि देश में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं का बुरा हाल है। देश की सवा अरब से ज्यादा आबादी के लिए करीब 5,000 मानसिक रोग चिकित्सक हैं, जबकि दो हजार मानसिक स्वास्थ्य क्लिनिक हैं।
देश में मानसिक स्वास्थ्य रोगों की देखभाल के लिए बजट का मात्र .06 प्रतिशत ही आवंटन मिलता है। बांग्लादेश में यह बजट का करीब 0.44 प्रतिशत है। लैंसेट के एक रिसर्च के अनुसार, प्रत्येक सात में से एक व्यक्ति मानसिक रोग का शिकार है, लेकिन मानसिक रोग से जुड़ी भ्रांतियां इसके इलाज में बहुत बड़ी बाधा हैं।

इसके साथ ही, सबसे बड़ी समस्या मानसिक रोगों के इलाज के लिए संसाधनों की भारी कमी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, भारत में सबसे ज्यादा मानसिक रोगी रहते हैं। देश के युवाओं में आत्महत्या की दर सबसे ज्यादा है। यही नहीं, नौ प्रतिशत भारतीयों में  डिप्रेशन की समस्या उन्हें विकलांगता की ओर ढकेलती है।

नेशनल मेंटल हेल्थ सर्वे-2015-16 के एक अध्ययन के अनुसार, करीब 7.5 प्रतिशत भारतीय किसी न किसी मानसिक रोग से ग्रस्त हैं, जबकि 20 में से एक भारतीय डिप्रेशन का शिकार है। मानसिक रोगों के प्रति समाज में फैली भ्रांतियों के कारण देश में 80 प्रतिशत से ज्यादा मानसिक रोगों से ग्रस्त लोगों को इलाज उपलब्ध नहीं है।

देश के छोटे कस्बों और गांवों में बहुत-से ऐसे युवा या युवती मिल जाएंगे, जिन्हें तुरंत इलाज की जरूरत है। लेकिन पहले तो उन्हें अपने आसपास बेहतर इलाज की सुविधा नहीं मिलती, दूसरी ओर परिवार के सदस्य यह मान कर चलते हैं कि अगर इलाज कराया, तो लोग रोगी को ‘पागल’ कहेंगे। इससे उसके भविष्य, जैसे शादी-ब्याह, नौकरी-चाकरी आदि पर बहुत असर पड़ेगा।

नेशनल मेंटल हेल्थ सर्वे- 2015-16 की रिर्पोट की मानें, तो 15 करोड़ भारतीयों को मानसिक रोगों के इलाज के लिए तत्काल डॉक्टर के पास जाने की जरूरत है। लेकिन हालात ऐसे हैं कि देश में मानसिक रोगों के इलाज में भारी संख्या में पेशेवरों की कमी है। इस कमी को अगर एक गैप की तरह, यानी इलाज और रोगी के बीच के अंतर की तरह देखें, तो यह 70 प्रतिशत है।

कहने का तात्पर्य है कि अब भी भारत में मात्र 30 प्रतिशत मानसिक रोग के मरीजों को ही इलाज मिल पाता है। संख्या के तौर पर देश में करीब तीन करोड़ लोगों को उचित इलाज मिल पाता है, जबकि सात करोड़ लोग बिना इलाज अपनी बीमारी को बढ़ता देख रहे हैं और परेशान हो रहे हैं। एनसीआरबी की 2019 की रिपोर्ट के अनुसार, आत्महत्या करने वाले बेरोजगारों का अनुपात 10.1 फीसदी है।

वर्ष 2019 में 14,019 बेरोजगारों ने आत्महत्या की, जो 2018 में 12,936 बेरोजगारों की आत्महत्या की तुलना में 8.37 फीसदी ज्यादा है। वे पांच राज्य जहां बेरोजगारों ने सबसे ज्यादा आत्महत्या की है, उनमें केरल (10,963), महाराष्ट्र (1,511), तमिलनाडु (1,368), कर्नाटक (1,293) और ओडिशा (858) शामिल हैं। वर्ष 2005 से लेकर 2014 तक यह आठ प्रतिशत से कम रही और उसके बाद से लगातार बढ़ रही है।
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