हिंदी हृदय प्रदेश में हिंदी की नाकामी

Umesh Chaturvediउमेश चतुर्वेदी Updated Thu, 02 Jul 2020 01:39 AM IST
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हिंदी - फोटो : सोशल मीडिया

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हिंदी का हृदय प्रदेश माने जाने वाले उत्तर प्रदेश की दसवीं और बारहवीं की परीक्षा में लाखों की संख्या में विद्यार्थी हिंदी विषय में फेल हों और सुर्खियां न बने, तो ही अचंभा होना चाहिए। उत्तर प्रदेश में इस साल 55 लाख से ज्यादा विद्यार्थियों ने दसवीं और बारहवीं की परीक्षा दी थी।
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उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद की इन परीक्षाओं में इस साल आठ लाख से ज्यादा विद्यार्थी उस हिंदी भाषा में फेल हुए हैं, जिसके बारे में कम से कम इस राज्य में माना जाता है कि घुट्टी में मिलती है। वैसे यह तीसरा मौका है, जब हिंदी अपने हृदय प्रदेश के ही विद्यार्थियों के पल्ले नहीं पड़ पाई है।
साल 2019 की परीक्षा में करीब दस लाख और 2018 की परीक्षा में करीब 11 लाख छात्र हिंदी में नाकाम रहे थे। यह संयोग ही है कि हिंदी का हृदय प्रदेश जिन राज्यों को माना जाता है, पिछली सदी के अस्सी के दशक में अर्थशास्त्री आशीष बोस ने इन्हें बीमारू राज्य कहा था।
बीमारू यानी अविभाजित बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश। आशीष बोस के तंज के करीब दो दशक बाद राजस्थान को छोड़ बाकी तीन राज्यों में से तीन और राज्य निकल गए हैं। झारखंड, छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड। अगर हरियाणा को जोड़ लें, तो हिंदी के हृदय प्रदेशों की संख्या आठ है। राजभाषा होने के चलते बाकी राज्यों में दसवीं तक कहीं अनिवार्य तो कहीं ऐच्छिक विषय के रूप में हिंदी पढ़ना जरूरी है। हालांकि तमिलनाडु इसका अपवाद है।

हिंदी के जानकार मानते हैं कि उदारीकरण के दौर में जिस तरह अच्छी नौकरियों पर अंग्रेजी का वर्चस्व बढ़ता जा रहा है, उससे निचले स्तर तक यह मान लिया गया है कि हिंदी की पढ़ाई में गंभीरता की जरूरत नहीं है। एक धारणा और भी विकसित हुई है कि हिंदीभाषी छात्र को हिंदी पढ़ने की जरूरत भी नहीं है। इसलिए स्कूलों में न तो हिंदी पढ़ने में छात्र दिलचस्पी ले रहे हैं और न ही उन्हें पढ़ाने में अध्यापक भी गंभीरता दिखा रहे हैं।

एनसीईआरटी के भाषा विभाग के प्रोफेसर प्रमोद दुबे आपसी बातचीत में स्वीकार करते हैं कि एक खास विचारधारा के विद्वानों ने हिंदी का हालिया पाठ्यक्रम भी ऐसा बनाया, जिसमें कल्पनाशीलता की कमी है। रही-सही कसर उत्तर प्रदेश की सरकारी तंत्र की शिक्षा व्यवस्था भी पूरी कर देती है।

यहां हिंदी के अध्यापक तभी तक अपने विषय के प्रति गंभीर रहते हैं, जब तक कि उनकी स्थायी नियुक्ति नहीं हो जाती। उदारीकरण के दौर में सरकारी तंत्र को लाभ-हानि की कसौटी पर कसा जाने लगा। इसका असर यह हुआ कि स्कूलों में स्थायी और योग्य अध्यापकों की भर्ती भी बाधित हुई।

खासतौर पर प्राथमिक विद्यालयों में इसे शिक्षा मित्रों के हवाले कर दिया गया। शिक्षा मित्रों की नियुक्ति पंचायतों के अधिकार में दे दिया गया, लिहाजा ग्राम प्रधान स्थानीय स्तर पर अपने समर्थक आधार पर अध्यापकों का चयन करने लगा। उसके लिए योग्यता से ज्यादा उसका जातीय और समर्थक आधार महत्वपूर्ण रहा। इसमें अयोग्य और कामचोर लोगों की बन आई।

इसका असर यह हुआ कि प्राथमिक स्तर से ही पढ़ाई व्यवस्था खराब होती गई। भ्रष्टाचार किस कदर बढ़ा, इसका उदाहरण हाल ही में सामने आया अनामिका शुक्ला प्रकरण है, जिसमें एक अभ्यर्थी के प्रमाण पत्रों के आधार पर तीस-तीस जगहों पर जाली नाम से अध्यापिकाएं तैनात हो गईं।

कुछ जगहों पर तो अब भी प्रधानाध्यापक, उप विद्यालय निरीक्षक और ग्राम प्रधान की मिलीभगत पर असल अध्यापक की जगह पर औने-पौने वेतन पर मजबूर बेरोजगार कार्य कर रहे हैं। कुकुरमुत्तों की तरह कथित कॉन्वेंट या अंग्रेजी माध्यम के स्कूल खुल गए हैं। कई स्कूल तो ऐसे भी हैं, जिन्हें मान्यता नहीं है।

ऐसे में आप कैसे सोच सकते हैं कि विद्यार्थियों में पढ़ने में रुचि जगेगी और वे हिंदी में फेल नहीं होंगे। उत्तर प्रदेश में लगातार लाखों विद्यार्थियों का हिंदी में नाकाम होना हमारी व्यवस्था के लिए चेतावनी है। चेतावनी हिंदी के लिए भी है। अगर हिंदी को रोजी-रोटी से नहीं जोड़ा गया, अगर उत्तर प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था की ओवरहॉलिंग नहीं की गई, तो ऐसे नतीजे बार-बार दिखते रहेंगे।
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