पहली चुनौती बलूचिस्तान

कुलदीप तलवार Updated Wed, 26 Jun 2013 08:42 PM IST
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पाकिस्तान में हाल ही में बलूचिस्तान की राजधानी क्वेटा से लगभग 100 किलोमीटर दूर जियारत के पहाड़ी क्षेत्र में बलूच नेशनल आर्मी ने 121 साल पुरानी उस इमारत को ध्वस्त कर दिया, जहां पाक के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना ने अपने आखिरी दिन गुजारे थे। उस इमारत को राष्ट्रीय संग्रहालय का दर्जा हासिल था।
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उसमें जिन्ना द्वारा इस्तेमाल की हुई चीजों को सजाकर रखा गया था। जिन्ना ने अपनी बेटी, बहन व बलूचिस्तान के प्रमुख नेताओं के साथ जो तस्वीरें खिंचवाई थी, वे भी दीवारों पर लटकी हुई थीं। वह इमारत एक तरह से बलूचिस्तान की पहचान ही बन गई थी। उस इमारत की तस्वीर पोस्टकार्डों, स्कूलों की किताबों, डाक टिकटों और सौ रुपये के नोट पर मौजूद है। बलूच अलगाववादियों की इस हरकत से दुनिया भर में पाकिस्तान की बदनामी हो रही है।
दरअसल बलूच अलगाववादी हमेशा से मानते रहे हैं कि जिन्ना ने ही बलूचिस्तान को पाकिस्तान में शामिल होने के लिए जबरन मजबूर किया था। इस हरकत से बलूची इस्लामाबाद के साथ-साथ बलूचिस्तान की नई सरकार को भी यह पैगाम देने में कामयाब हो गए हैं कि उन्हें जिन्ना का पाकिस्तान नहीं चाहिए, वे अलग होना चाहते हैं।
पाकिस्तान सरकार को इन दिनों जहां कराची और फाटा में दहशतगर्दों से लड़ना पड़ रहा है, वहीं बलूचिस्तान में उन बलूच राष्ट्रवादियों का सामना करना पड़ रहा है, जो अपने सांविधानिक अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं। बलूच चाहते हैं कि उनके स्कूल-कॉलेजों में बलूचिस्तान का इतिहास पढ़ाया जाए।

बलूचिस्तान के प्राकृतिक संसाधनों पर केंद्र और राज्य, दोनों का अधिकार है, जबकि बलूच इन पर अपना अधिकार चाहते हैं। क्षेत्रफल के लिहाज से बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत है, पर वहां आबादी बहुत कम है। जबकि प्राकृतिक संसाधनों के लिहाज से यह मालामाल है।

सुई में जो गैस पैदा होती है, उसकी आपूर्ति पूरे देश में होती है, लेकिन राज्य को रॉयल्टी का थोड़ा हिस्सा मिलता है। बलूच बिरादरी बलूचिस्तान से फौज को वापस बुलवाने, बलूच बेरोजगार युवकों को रोजगार दिलाने, बलूच राष्ट्रवादियों के खिलाफ झूठे मुकदमे वापस लेने और हजारों लापता लोगों का पता लगाकर उन्हें सामने लाने की मांग कर रहे हैं।

जब भी बलूच अपने अधिकारों के लिए आंदोलन तेज करते हैं, सरकारी एजेंसियां उन्हें प्रताड़ित करती हैं। पाकिस्तान की पिछली सरकार और बलूचिस्तान की प्रांतीय सरकार का भी हालात पर नियंत्रण बिल्कुल ढीला पड़ गया था। इसलिए अपनी जनता की हमदर्दी पाने के लिए पाक शासक भारत पर झूठा आरोप लगाते रहे कि वे बलूचियों को भड़का रहे हैं और उन्हें हथियार मुहैया करा रहे हैं। नए प्रधानमंत्री नवाज शरीफ चूंकि भारत से रिश्ते सुधारना चाहते हैं, इसलिए उम्मीद करनी चाहिए कि उनकी सरकार में शामिल नेतागण व अधिकारी इस किस्म का झूठा आरोप लगाने से गुरेज करेंगे।

लेकिन जिन्ना संग्रहालय को तबाह करने का संदेश साफ है कि नवाज सरकार के लिए आगे का रास्ता आसान नहीं होगा। बलूचिस्तान में पीएमएल (एन) की मिली-जुली नई सरकार को कई निर्दलीयों और छोटी पार्टियों का समर्थन प्राप्त है। पीएमएल (एन) के मुखिया और पाक प्रधानमंत्री नवाज शरीफ एक तजुर्बेकार सियासतदां हैं और बलूचिस्तान की समस्याओं को अच्छी तरह समझते हैं। वह इस कोशिश में जुट गए हैं कि बलूचियों में अलगाव की भावना को कैसे दूर किया जाए।

बलूचिस्तान के कबाईली सरदारों को खुश करने के लिए अब तक प्रांत के मुख्यमंत्री व राज्यपाल के पद पर किसी बलूच सरदार की ही नियुक्ति की जाती रही है। लेकिन इस बार नवाज शरीफ ने अपनी पार्टी के प्रांतीय विधानसभा में विधायकों की संख्या ज्यादा होने के बावजूद सहयोगी नेशनल पार्टी के डॉक्टर अब्दुल मलिक को मुख्यमंत्री बनाया है।

मलिक का संबंध बलूचिस्तान स्टूडेंट ऑर्गेनाइजेशन से है। इसी तरह नवाज शरीफ ने एक दूसरी सहयोगी पार्टी के पख्तून मोहम्मद खान अचकजई को राज्यपाल का पद सौंपा है। बलूचिस्तान में बलूच और पख्तूनों की आबादी लगभग आधी-आधी है। इसलिए नवाज शरीफ के इस फैसले की पाक में प्रशंसा हुई है। लेकिन सवाल यह है कि क्या शरीफ बलूचियों में व्याप्त अलगाववाद की भावना को रोक पाएंगे।

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