सौ साल के एकांत से मौन तक

sudheesh pachauriसुधीश पचौरी Updated Sun, 20 Apr 2014 12:46 AM IST
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gabriel garcia marquez

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अब तक आलोचनात्मक यथार्थवाद का जमाना था, लेकिन गैब्रियल गार्सिया मार्खेज ने जादुई यथार्थवाद की लेखन की एक ऐसी विधा को जन्म दिया, जिसे दुनिया भर में न केवल पसंद किया गया, बल्कि उसे बेहद सराहा भी गया। इसमें मिथक है, गप है, अंधविश्वास है, सामाजिक असमानता है, फंतासी है और चमत्कारिक घटनाएं भी हैं, जो पाठकों को खुद से बांधे रखती हैं।
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जिस तरह से हम ‘चंद्रकांता संतति’ और ‘महाभारत’ जैसी रचनाओं में चमत्कारिक एवं अविश्वसनीय घटनाओं को देखते हैं, कुछ ऐसा ही मार्खेज के लेखन में भी देखने को मिलता है। उनकी कहानियों की बुनावट बेहद खास थी। 17वीं सदी में मिग्यूएल दा कारवांतेस के बाद स्पैनिश भाषा के सर्वाधिक लोकप्रिय लेखक माने जाने वाले और कोलंबिया में पैदा हुए गार्सिया मार्खेज ने विश्व साहित्य में वह दर्जा हासिल किया, जो मार्क ट्वेन और चार्ल्स डिकेन्स को हासिल है।
उनकी रचनाओं का जादू इस हद तक मायावी था कि लैटिन अमेरिका के बाहर भी लोग उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके। भारतीय साहित्यकारों पर भी मार्खेज के रचना संसार का असर बखूबी पड़ा है। कुछ लेखकों ने उनकी नकल करने की भी कोशिश की, लेकिन वो सफल बिलकुल नहीं हो सके। दरअसल, जादुई यथार्थवाद सौंदर्य या फिक्शन की एक ऐसी शैली है, जिसमें असली दुनिया के साथ जादुई तत्वों का मिश्रण होता है। इसे केवल मार्खेज ही साकार कर सकते थे। इसके जरिये जिंदगी की उलझन को सामने रखा गया है। इसमें इकहरापन नहीं है।
हालांकि, जादुई यथार्थवाद आलोचना में तो चला, लेकिन साहित्य में नहीं चल सका। इसके अलावा जादुई यथार्थवाद की झलक फिल्म और दृश्य कलाओं में भी दिखाई पड़ती है। मार्खेज की विश्व प्रसिद्ध रचनाओं में ‘क्रॉनिकल्स ऑफ ए डैथ फोरटोल्ड’, ‘लव इन दी टाइम ऑफ कोलरा’ तथा ‘ऑटम ऑफ दी पैट्रिआर्क’ शामिल हैं। इन रचनाओं ने बाइबिल को छोड़कर स्पैनिश भाषा की किसी रचना की बिक्री के सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए थे।

1967 में लिखी गयी उनकी मशहूर कृति ‘वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ सॉलिट्यूडट' बेहद लोकप्रिय हुआ। 'वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ सॉलिट्यूडट' लिखने का विचार 1965 में उनके दिमाग में आया और बेहद कम समय में उन्होंने इस उपन्यास को लिख डाला। इस पुस्तक ने मार्खेज को दुनिया के महान लेखकों में शुमार कर दिया। यह पहला उपन्यास था, जिसमें लैटिन अमेरिकियों ने खुद को पहचाना। 1982 में इस किताब के लिए उन्हें नोबेल पुरस्कार भी मिला था। इस उपन्यास का पहला संस्करण कुछ ही दिनों में बिक गया, जबकि अगले तीस वर्षों में इसकी दो करोड़ से भी ज्यादा प्रतियां बेची गईं। क्यूबा के तानाशाह फिदेल कास्त्रो भी मार्खेज के चाहने वालों में शामिल थे। एक साक्षात्कार में उन्होंने कास्त्रो को सांस्कारिक व्यक्ति बताया था। जबकि मार्खेज जिस धारा के लेखक थे, वह मार्क्सवाद के बिल्कुल विपरीत है।

यह सही है कि 'वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ सालिट्यूडट' को दुनिया भर में प्रशंसा मिली, लेकिन भारत में उनका उपन्यास इतना पॉपुलर नहीं हो सका। इसके भी अपने कारण हैं। हिंदी साहित्य की बात करें, तो हमारे यहां पंचतंत्र या चंद्रकांता संतति जैसी रचनाएं हैं, जिनमें कहानियों के भीतर से कहानियां निकलती हैं। ऐसे में पाठक खुद को इससे अलग नहीं कर पाता। लेकिन वर्तमान दौर में हमारे यहां ऐसे लेखक बेहद कम हैं, जो लेखन में अपनी परंपरा को तरजीह देते हों। हिंदी के लेखकों को मार्खेज से यह सबक जरूर लेना चाहिए, क्योंकि उन्होंने कभी अपनी परंपरा को नहीं छोड़ा था।

हमारे यहां ज्यादातर लेखक मेहनत नहीं करना चाहते हैं। आखिर ऐसा कौन है, जो मंटो जैसे लेखकों की कहानियों के आसपास भी पहुंच रहा हो! हमारे यहां घर की मुर्गी को दाल बराबर समझा जाता है। इस धारणा को तोड़ने की जरूरत है। लेखक के लिए जरूरी है कि वह अपने रचनाकर्म में खुद को समर्पित कर दे। मार्खेज ने अपने लेखन में यह साबित करके दिखाया है।
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