ग्राम प्रधान विचारधारा वाले महात्मा गांधी का शहरों से रिश्ता

रामचंद्र गुहा Updated Sun, 06 Oct 2019 06:24 AM IST
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Gandhi and Cities : Mahatma Gandhi worked in many big cities in many countries

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महात्मा गांधी की कही यह बात काफी प्रसिद्ध हुई कि, भारत अपने गांवों में बसता है। उनके राजनीतिक और सामाजिक कार्य तथा उनके दार्शनिक लेखन का जोर इस बात पर रहा कि भारत अनिवार्यतया एक कृषि सभ्यता थी और उसे इसी रास्ते पर चलना चाहिए।
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लेकिन, वास्तव में भारत हमेशा से अपने शहरों में बसता आया है। हमारे महाकाव्य पौराणिक शहरों अयोध्या और इंद्रप्रस्थ के बारे में बताते हैं। बनारस के बारे में दावा किया जाता है कि वह दुनिया का सबसे प्राचीन शहर है। मध्यकालीन उत्तर भारत में मुगलों ने दिल्ली, आगरा और लाहौर जैसे शहर विकसित किए थे।
मध्यकालीन दक्षिण भारत में विजयनगर एक महान साम्राज्य था। (इसकी राजधानी हम्पी तुंगभद्रा नदी के साथ कैसे मीलों दूर तक फैली थी, उसके अवशेष देखकर समझ सकते हैं।) अंग्रेजों के आने और प्रेसीडेंसी टाउन बॉम्बे, कलकत्ता और मद्रास की स्थापना करने के काफी पहले से भारत एक शहरी सभ्यता था।
गांधी का दावा सिर्फ ऐतिहासिक अर्थ में गलत नहीं था। यह उनके जीवन से जुड़े तथ्यों से भी एकदम उलट है। वह कठियावाड़ा के शहरों में बड़े हुए और फिर पढ़ाई करने के लिए दुनिया के सबसे महान शहर लंदन गए। दक्षिण अफ्रीका में वह डरबन और जोहान्सबर्ग जैसे शहरों में रहते थे और काम करते थे। इन्हीं शहरी केंद्रों में उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की; यहीं उन्होंने करीबी दोस्त बनाए और अपना वास्तविक पेशा हासिल किया।

यह सब जानते हैं कि ट्रेन से जोहान्सबर्ग से डरबन जाते समय इत्तफाक से जॉन रस्किन की किताब 'अनटू दिस लास्ट' पढ़ते हुए गांधी पहली बार ग्रामीण जीवन की सादगी की ओर आकर्षित हुए थे। रस्किन की किताब से प्रेरित होकर उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में फीनिक्स सेटलमेंट और टॉलस्टॉय फार्म की स्थापना की थी। 

भारत लौटने के बाद साबरमती के तट पर उन्होंने जो आश्रम बनाया, वह खेतों में स्थापित किया गया था; यह कई दशक पहले की बात थी, जब फैलते अहमदाबाद शहर के कारण इन खेतों में बस्तियां बसाई जानी थीं। संभवतः उन्हें इस अतिक्रमण का एहसास हो गया था, इसीलिए 1930 के दशक में वह मध्य भारत के दूरस्थ क्षेत्र में चले गए और वहां सेवाग्राम आश्रम की स्थापना की।

सरल ग्रामीण जीवन के प्रति उनके उल्लास के साथ ही यह सोने और लालच का शहर जोहान्सबर्ग ही था, जहां गांधी ने अहिंसक प्रतिरोध की तकनीक का विचार किया, जो कि राजनीतिक विचार और व्यवहार को दिए गए उनके योगदानों में सबसे मौलिक योगदान था। इसी शहर में उनकी पहली गिरफ्तारी हुई थी; यहीं उन्होंने जेल में वक्त गुजारा था; यहीं पहली बार उन्हें मारने की कोशिश की गई थी।

भारत में बिताए वर्षों में भी गांधी का जीवन गहरे तक शहर से बंधा हुआ था। बॉम्बे के कारोबारियों ने उदारता के साथ उनके आंदोलनों को धन दिया, तो इसी शहर के आम नागरिक पूरे उत्साह के साथ उनके आह्वान पर जेल गए। बॉम्बे उनके पहले बड़े अखिल भारतीय सत्याग्रह; 1919 के रोलेट सत्याग्रह; के साथ ही उनके आखिरी सत्याग्रह; 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन; का केंद्र बिंदु था।

गांधी के तीन सबसे प्रसिद्ध उपवास का आयोजन तीन महान भारतीय शहरों में किया गया- पूना में सितंबर 1932, कलकत्ता में सितंबर 1947 और नई दिल्ली में जनवरी 1948 में। इन उपवासों के पहले और उसके बाद वह इन शहरों में अक्सर आते रहते थे और इनमें से प्रत्येक में उनके अनेक मित्र और सहयोगी थे (इनमें से प्रत्येक शहर में उनके कुछ प्रतिद्वंद्वी और विरोधी भी थे)।

सितंबर, 1947 में कलकत्ता में गांधी के उपवास ने दंगे से तार-तार शहर में शांति कायम की। इसके बाद वह ऐसे ही मिशन के लिए दिल्ली आ गए। वह हरिजन बस्ती में रहने का विचार कर रहे थे, जैसा कि अतीत में वह वहां रहे थे; लेकिन उनके जीवन को मिल रही धमकियों के कारण उन्हें उसके बजाय बिरला हाउस में ठहरने के लिए राजी किया गया। 

दिन में वह हाउस के भीतर कताई करते, ध्यान करते और आगंतुकों से मिलते थे और शाम को वह इस परिसर में स्थित मैदान में अपनी दैनिक प्रार्थना सभा के लिए बाहर निकलते थे। 30 जनवरी, 1948 की शाम 5.17 बजे उन्हें उस समय गोली मार दी गई, जब वह प्रार्थना सभा के लिए पैदल चलकर जा रहे थे।

कलकत्ता, बॉम्बे, पूना या दिल्ली के विपरीत मद्रास गांधी के किसी बड़े उपवास या आंदोलन का केंद्र नहीं रहा। इसके बावजूद उस शहर से उनका गहरा लगाव था। दक्षिण अफ्रीका के उनके आंदोलन के सबसे बहादुर सत्याग्रही तमिल देश से ही आए थे। 

मद्रास के संपादक जीए नाटेसन की तुलना में किसी और ने गांधी के काम को सबसे अधिक प्रकाशित नहीं किया और मद्रास के विद्वान और संत सी राजगोपालचारी की तुलना में कोई और भारतीय राजनेता नहीं था, जिसका गांधी जी सबसे अधिक सम्मान करते थे।

गांधी ने अपने लेखन में भले ही गांव का गौरवगान किया और शहर को तिरस्कृत किया हो, लेकिन उनकी कार्रवाइयां शहरी जीवन से उनके गहरे रिश्ते को रेखांकित करती हैं। सौभाग्य से गांधी की ऐतिहासिक भूमिका का आकलन करते हुए अध्येताओं ने उनके विचार से कहीं अधिक उनके व्यवहार पर ध्यान केंद्रित किया। 

ऐसी अनेक शानदार किताबें हैं, जिन्होंने दर्ज किया है कि कैसे गांधी ने विभिन्न शहरों को आकार दिया और कैसे बदले में उन शहरों ने उन्हें तराशा। इन किताबों में जेम्स हंट की 'गांधी इन लंदन', एरिक इत्जिकिन की 'गांधीज जोहान्सबर्ग' और उषा ठक्कर और संध्या मेहता की 'गांधी इन बॉम्बे' शामिल है।
 
गोपालकृष्ण गांधी की 'ए फ्रैंक फ्रेंडशिप' भी इन्हीं किताबों की तरह समृद्ध तरीके से अभिलिखित है और कहीं अधिक चित्रात्मक भी, जो कि संपूर्ण रूप में महात्मा के बंगाल से रिश्ते पर केंद्रित है, जिसमें महान बंगाली शहर कलकत्ता से उनके रिश्ते पर खासा ध्यान केंद्रित किया गया है।

अभी तक, जैसा कि मैं जानता हूं, ऐसी कोई किताब नहीं है जिसका शीर्षक अहमदाबाद में गांधी जैसा कुछ हो, हालांकि इस शहर पर केंद्रित केनेथ गिलियन, हावर्ड स्पोडेक और अच्युत याग्निक तथा सुचित्रा सेठ की किताबों में इस विषय को अच्छी तरह से समाहित किया गया है।

गांधी ने अपने आखिरी दिन जिस शहर में गुजारे वहां भी एक रिक्तता है। गांधी दिल्ली को अच्छी तरह से जानते थे और यहां उनके अनेक अंतरंग मित्र थे, जिनमें सुप्रसिद्ध मुस्लिम हकीम अजमल खान, प्यारे ईसाई पुजारी चार्ल्स फ्रीर एंड्रूज और निस्वार्थ हिंदू सामाजिक कार्यकर्ता बृजकृष्ण चांदीवाला शामिल थे। 

दिल्ली में ही अपने विभिन्न सत्याग्रहों से पहले और उनके बाद विभिन्न वाइसरायों से उनकी मुलाकात हुई और यहीं उन्होंने सांप्रदायिक अमन के लिए पहले 1924 और फिर 1948 में उपवास किया था। मैं उम्मीद करता हूं कि कोई अध्येता फिर वह युवा हो या बुजुर्ग, भारतीय हो या विदेशी, किसी ऐसी किताब पर काम कर रहा होगा, जो इस पर केंद्रित होगी कि दिल्ली ने कैसे गांधी को और बदले में गांधी ने कैसे दिल्ली को तराशा। यह बहुत बहुमूल्य काम होगा। 
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