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गरीबी हटाओ बनाम राष्ट्रवाद

sudheesh pachauriसुधीश पचौरी Updated Wed, 27 Mar 2019 07:10 PM IST
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राहुल आए। मुस्कराए। राहुल ने न्यूनतम आय योजना की घोषणा की, फिर पत्रकारों से कुछ इस तरह कहने लगे ः आप ‘चौंक’ गए न! ‘न्यूनतम आय योजना’ एक ‘धमाका’ है। ऐसी योजना दुनिया में कहीं नहीं है। हम पांच करोड़ सर्वाधिक गरीब परिवारों को 6,000 रुपये महीने देंगे। और इस तरह हम बची-खुची गरीबी को पूरी तरह खत्म कर देंगे।
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एक टीवी चैनल ने इस योजना के राजनीतिक आशय को तत्काल ताड़ा और पूछा कि क्या यह घोषणा भाजपा के ‘राष्ट्रवाद’ के नैरेटिव की जगह ले सकती है। यानी क्या राहुल का यह 'धमाका' राष्ट्रवाद और विकास के 'दुधरे' को बेकार कर सकता है? शायद इसी आशंका से विचलित होकर वित्त मंत्री जेटली ने इस घोषणा को धोखा कह कर इसकी हवा निकालने की कोशिश की और कांग्रेस के 'गरीबी हटाने वाली पार्टी' की छवि पर हमला बोला कि कांग्रेस ने गरीबी हटाने के नाम पर गरीबी का वितरण ही किया है।

लेकिन ऐसी 'घोषणाओं' को आज की जनता किस तरह से लेती है? इस सवाल पर किसी ने विचार नहीं किया। अगर किया होता, तो मालूम पड़ता कि आज की जनता इस तरह की घोषणाओं को 'चुनावी तिकड़म' मानती है। वह जानती है कि यह सब वोट लेने की चाल है। यानी कि आज की जनता सत्तर के दशक की जनता नहीं है, जो दानदाता का एहसान माना करती थी। अब वह ऐसे किसी एलान को ‘चुनावी रिश्वत’ मानती है।

चुनाव घोषित होने से कुछ पहले मोदी ने ‘किसान सम्मान निधि' योजना के तहत गरीब किसानों को छह हजार रुपये प्रतिवर्ष देने की घोषणा की थी, तब उसे भी वोट लेने के लिए बांटी जाने वाली ‘खैरात’ की तरह देखा गया था। हमारे दल अपने-अपने विचारों के किलों में बंद रहते हैं। वे अब भी अपने को ‘दाता’ समझते हैं। वे जनता को उसी तरह से भूखी-नंगी समझते हैं, जिसको कुछ दे देंगे, तो वह खुश हो जाएगी, जबकि आज की गरीब जनता में स्वाभिमान और अकड़ का एक नया मूल्य घर कर गया है कि अब वह आपकी उतरन नहीं पहनना चाहती और न आपकी जूठन खाना चाहती है। मोबाइल और सोशल मीडिया से सज्जित, इस अति बतकूटी दुनिया में इस जनता का नारा है ः साडा हक इथ्थै रख!

हमारी ‘गरीब जनता’ भी अब ‘बेचारी’ नहीं रह गई है। आज ‘हमदर्दी’ शब्दकोश से बाहर का शब्द है। आम जनता यानी गरीब जनता का व्यवहार बहुत तेजी से बदला है। और उधर, मीडिया ने दलीय राजनीति और चुनाव को इतना पारदर्शी बना दिया है कि जनता की शक्की निगाह से किसी का छल-कपट छिपता नहीं है। वह मानती है कि हर दल छल-कपट करता है और इसलिए सबसे अधिक छलिया ही उसे पसंद है, यानी कि जो उसे अच्छी तरह छले, लेकिन कष्ट महसूस न होने दे। यानी जोर का झटका, लेकिन धीरे से लगे! मोदी के झटके भी ऐसे ही रहे हैं।

मुद्दा यह नहीं है कि राहुल की ‘न्यूनतम आय योजना’ के लिए पैसा कहां से आएगा? इसका जवाब यही है कि वह वहीं से आएगा, जहां से मौजूदा सरकार के पास आ रहा है। जब भाजपा सरकार अपनी कल्याणकारी योजनाओं के लिए भारत के खजाने से खर्च कर सकती है, तो कांग्रेस भी कर ही सकती है। लेकिन, ऐसा तभी संभव होगा, जब राहुल की सरकार बने या ऐसी सरकार बने, जिसमें राहुल का पूरा दखल हो और यह तब होगा, जब इस योजना की सूचना उस वोटर तक पहुंच जाए, जो इस ‘न्यूनतम आय योजना’ में आने वाला ‘अति गरीब और वंचित’ है। अगर ऐसा हो सका, तो यह योजना राहुल को गद्दी पर बिठा देगी। कांग्रेस की यही सबसे बड़ी ‘पहेली’ है ः सत्ता तब मिलेगी, जब सबसे गरीब के वोट मिलें और वोट तब मिलेंगे, जब सत्ता मिले और ये योजना लागू हो। यानी न बाबा आवै न घंटा बाजै!

अब रह जाता है यह सवाल कि बालाकोट के बाद समारोहित भाजपा के राष्ट्रवादी हल्ले को क्या ‘न्यूनतम आय योजना’ किनारे कर पाएगी? यहां हमें संघ और भाजपा के 'राष्ट्रवाद' का उपहास उड़ाने की जगह उसे कुछ गंभीरता से लेना चाहिए, क्योंकि यह एक दिन अचानक 'घोषित' की गई योजना नहीं है, बल्कि संघ की पुरानी और स्थायी ‘योजना’ है और पिछले पांच साल से सत्ता से लेकर हिंदू संगठनों द्वारा नाना प्रकार से इसे चलाया गया है। भाजपा का 'राष्ट्रवाद' और 'विकास' का विमर्श इस तर्क से आगे बढ़ता है कि राष्ट्र पर खतरा है। उसे सुरक्षा चाहिए। उसके लिए एक ‘मजबूर' सरकार की जगह एक 'मजबूत' सरकार चाहिए। मजबूत सरकार को मजबूत नेता चाहिए और ऐसा दल भाजपा और ऐसे नेता मोदी ही हो सकते हैं। अगर मजबूत नेता होगा, तो मजबूत सरकार होगी, और फिर फैसले जल्दी होंगे। वे अनिर्णय के विंध्याचलों में नहीं खोएंगे और इस तरह विकास भी तेजी से होगा। राष्ट्र पड़ोसियों से असुरक्षित है। उसे सुरक्षा चाहिए। वह सुरक्षा मोदी ही दे सकते हैं।

पांच साल से चला आता यह विमर्श कोई एक दिन का विमर्श नहीं है। इस तरह मजबूत नेता, मजबूत राष्ट्र, मजबूत राष्ट्रवाद कोई मामूली विमर्श नहीं है। वे जाति, लिंग और धर्म के पार जाकर काटते हैं। इसके मुकाबले ‘न्यूनतम आय योजना’ सिर्फ पांच करोड़ परिवारों के लिए वादे की तरह ही है।

हमारे लेखे 'गरीब' की याद भी राहुल को कुछ देर से आई और अगर आई भी, तो ‘राजनीतिक निवेश’ की तरह आई। प्रश्न रह जाता है कि क्या इस योजना से 2019 के चुनावों के लिए भाजपा का खोजा गया 'मजबूत राष्ट्रवाद' का नारा फीका पड़ पाएगा? यानी क्या ‘न्यूनतम आय योजना’ का राहुल का कार्ड राष्ट्रवाद जैसे ‘भावनात्मक’ मुद्दे को उखाड़ पाएगा! यानी क्या 'नकद नारायण' मिलने की ‘उम्मीद’ राष्ट्रवादी और अंध राष्ट्रवादी जज्बातों को कमजोर कर सकेगी? शायद नहीं।

माना कि 'रोटी-रोजी' महत्वपूर्ण है, लेकिन ‘जज्बात’ की खातिर आम आदमी बहुत से कष्ट तक सह लेता है। इस देश का आम आदमी 'संकट निवारण' के लिए पांच-सात दिन का व्रत तो यों ही करता रहता है। ध्यान रहे, एक कमजोर आदमी को ताकतवर राष्ट्र अधिक काम्य होता है, क्योंकि उसे लगता है कि ताकतवर राष्ट्र ही उसे ताकत दे सकता है। आगे आने वाले दिनों में चुनावी मुद्दा राहुल की ‘न्यूनतम आय योजना’ बनती है या उस पर ‘राष्ट्रवाद का नारा’ हावी रहता है, यह देखना दिलचस्प होगा! 
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