गर्व और शर्म के बीच हिंदी

sudheesh pachauriसुधीश पचौरी Updated Thu, 13 Sep 2018 06:47 PM IST
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हिंदी भी बड़ी विचित्र भाषा है। एक ओर उसे ऐसी बड़ी विश्व भाषा कहा जाता है, जो दुनिया में दूसरे नंबर की है, तो अगले ही पल उसे खत्म होती हुई भाषा भी मान लिया जाता है। एक ओर हिंदी पर गर्व किया जाता है, तो दूसरी ओर निराशा में डूबकर उसका मर्सिया पढ़ा जाता है। एक दिन हिंदी दिवस मनाते वक्त उसकी उपलब्धियां गिनाई जाती हैं और तरह-तरह के पोस्टर लगाए जाते हैं, लेकिन यह भी नहीं सोचा जाता कि ‘दिवस’ उसी का मनाया जाता है, जिसका अस्तित्व खतरे में होता है!
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एक ओर हम हर तीसरे-चौथे बरस विदेशों में जा-जाकर विश्व हिंदी सम्मेलन आयोजित करते हैं और दुनिया में हिंदी के फैलाव की बातें करते हैं, लेकिन हर बार हम सम्मेलनों में पारित प्रस्तावों को पूरी तरह लागू करने की बात भूल जाते हैं। एक ओर हिंदी ऐसी ताकतवर भाषा मानी जाती है, जिससे दूसरी भारतीय भाषाएं डरती हैं, और दूसरी ओर वह स्वयं अंग्रेजी से डरने वाली भाषा बन जाती है।
हिंदी को लेकर बहसें होती हैं, तो हम उसकी पैरवी में तमिलनाडु के सुब्रमण्यम भारती से लेकर टैगोर, तिलक और गांधी को तैनात कर देते हैं कि देखिए, इन सबने कहा है कि हिंदी ही देश की एकता, अखंडता और आजादी की भाषा है। और उधर हिंदी को देखते ही दक्षिण के कुछ लोग उसे देश को तोड़ने वाली भाषा बताने लगते हैं, उसके बोर्डों पर कालिख पोतने लगते हैं और एक भी हिंदी प्रेमी या लेखक इसका विरोध नहीं करता।
हिंदी महान है। वह सबको जोड़ने का काम करती है। वह महान भारतीय संस्कृति की वाहक है। लेकिन हिंदी ‘विकास’ की भाषा भी है। जीडीपी में उसका भी योगदान है, ऐसा कोई नहीं कहता। क्यों? हिंदी राजभाषा है। राजभाषा अधिनियम के तहत वह सरकारी कामकाज की भाषा मानी जाती है, लेकिन असलियत में वह सरकारी कामकाज की जगह सरकारी दफ्तरों में एक किनारे पड़ी हुई भाषा ही है।

हमारी समस्त नीतियां, पॉलिसी पेपर, मूल प्रस्ताव, दस्तावेज और बजट आदि सब पहले अंग्रेजी में बनते हैं, फिर हिंदी में अनूदित होते हैं। सरकारों के कार्यालयों में हिंदी में कुल एक फीसदी भी कामकाज हो जाए, तो बड़ी बात समझिए। कितना कामकाज हिंदी में हुआ-कितना नहीं, राजभाषा अधिनियम कितना लागू हुआ-कितना नहीं, इसकी समीक्षा के लिए संसदीय सदस्यों की कमेटियां काम करती हैं। उनकी रिपोर्टें स्वयं गवाह हैं कि हमारी सरकारों के कामकाज की असली भाषा अब भी अंग्रेजी ही है। हिंदी तो हाशिये पर भी नहीं है। वह मंत्रालयों के लेटर-हेडों के शीर्षकों में मोटे-मोटे अक्षरों में अवश्य होती है, बाकी सामग्री में अंग्रेजी ही छाई रहती है।

हिंदी दिवस हमारे लिए एक दिन की पिकनिक भर है! इतिहास गवाह है कि पिछली सदी के साठ के दशक के बीच ‘अंग्रेजी हटाओ’ जैसे आंदोलन हुए। लेकिन हटने की जगह अंग्रेजी और भी जरूरी होती गई और जिस हिंदी ने अंग्रेजी का विरोध किया, तमिल उसकी विरोधी हो गई! लेकिन पिछले पचास बरसों में हिंदी का विकास भी हुआ है। यह राजभाषा अधिनियम के कारण नहीं हुआ। मार्केट की स्पर्धा में पिछले पचास-साठ बरसों में हिंदी ने कई बड़ी छलांगें लगाई हैं और हिंदी भाषी जनता ने व्यवहारवादी होकर, अंग्रेजी से दुश्मनी छोड़ उसके साथ रहना सीखा है और बोलचाल के बहुत से अंग्रेजी शब्दों को अपने में मिक्स कर स्वयं को ‘नए किस्म की हिंदुस्तानी’ या कहें ‘हिंगलिस्तानी’ बना लिया है। दुनिया की तमाम भाषाएं अपने सर्वाइवल के लिए किसी ताकतवर भाषा से शब्द चुराती रहती हैं। यही हिंदी ने किया है।

अंग्रेजी सिर्फ भाषा नहीं हैं। वह एक इकोनॉमी भी है। वह ताकत की, पैसे की और हैसियत की भाषा है। हमारे शासक वर्ग के बिजनेस की भाषा भी अंग्रेजी ही है। उसके पीछे विश्व के बड़े कॉरपोरेटों की इकोनॉमी है, स्टॉक मार्केट है, डॉलर है, पाउंड है, यूरो है, फ्रेंक है। वह विश्व बाजार की कामकाजी भाषा है। उसे वहां से जो ताकत मिलती है, वह किसी और को नहीं मिलती।

अंग्रेजी की तुलना में, हिंदी अब भी कृषि की, किसानों की और मजदूरों की भाषा है। वह इंडस्ट्री की और कॉरपोरेट या तकनीक की भाषा नहीं है। वह कमजोर और गरीब की भाषा है, लेकिन ‘मालिक’ की भाषा नहीं है। जब तक कोई भाषा कॉरपोरेट के मालिकों की नहीं होती, तब तक उसमें पावर नहीं आती। जब तक कोई भाषा पावर की नहीं होती या पावर पैदा नहीं करती, तब तक उसका रुतबा नहीं होता। उसका हुकुम नहीं चलता! हिंदी अब भी ‘आदरणीय’ ‘सविनय निवेदन’ और ‘कृपाकांक्षी’ की भाषा ही है।

आजादी के आंदोलन वाला ‘हिंदी-अनुराग’ आज के कॉरपोरेटों में नहीं बचा है। तकनीकी क्रांति ने अंग्रेजी को जरूरी बना दिया है। अंग्रेजी ‘ईज इन बिजनेस’ की भाषा है। हिंदी नहीं है।

जिस भाषा में बिजनेस ‘ईज फील’ करेगा, वही चलेगी। कैंटीन के पकौड़ों की भाषा हिंदी हो सकती है। लेकिन ‘पकौड़ा’ भी रोमन में ही लिखा होगा। आईआईटीज और आईआईएम्स की भाषा अंग्रेजी है, क्योंकि वही ‘ईज इन बिजनेस’ की भाषा है। हिंदी सिर्फ ‘ईज इन एंटरटेनमेंट’ की भाषा है।

लेकिन हिंदी के विराट उपभोक्ता और वोट बाजार ने हिंदी के प्रति कॉरपोरेटों के नजरिये को भी बदला है। वह ग्लोबल कॉरपोरेट की मजबूरी भी बनी है। ब्रांड बेचने के लिए बाजार वालों को बोलचाल की हिंदी सीखनी पड़ती है! कॉरपोरेट की रीति-नीति अंग्रेजी में होती है, लेकिन बेचने के लिए हिंदी में आना पड़ता है। सरकारों को भी अपनी नीतियां लागू करने के लिए जनता की भाषा में बात करनी पड़ती है। सरकारें अपने दस्तावेज या पॉलिसी पेपर भले पहले अंग्रेजी में सोचें, लेकिन जनहित में लागू करते वक्त उनको हिंदी आदि भाषाओं में ही बात करनी होती है। इस तरह उन्हें अनुवाद के रूप में ही सही, हिंदी स्वीकार करनी पड़ती है।

हिंदी के बड़े बाजार ने कॉरपोरेटों को हिंदी सीखने को मजबूर किया है। हिंदी को न विद्वानों ने बचाया है, न सरकारी नीतियों ने बचाया है। उसे बचाया है, तो हिंदी जनता की विशालता ने बचाया है। हिंदी को लेकर गर्व और शर्म के बीच झूलते हुए भी हमें इस नए तथ्य और तज्जन्य बदलाव को ध्यान में रखना चाहिए!
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