क्रूर संघवाद का प्रदर्शन, केंद्र-राज्य संबंधों को बदलने की घातक कोशिश

पी चिदंबरम Updated Sun, 13 Sep 2020 04:35 AM IST
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केंद्रीय मंत्रिमंडल (फाइल फोटो)
केंद्रीय मंत्रिमंडल (फाइल फोटो) - फोटो : PIB

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संसद के दोनों सदनों का विलंबित मानसून सत्र कल से शुरू हो रहा है। यह सिर्फ भौतिक उपस्थिति का सत्र होगा। कुछ दिनों पूर्व राज्यसभा के सभापति ने मेरा यह सुझाव खारिज कर दिया कि जो सदस्य सशरीर मौजूद होने में असमर्थ हों, उन्हें परोक्ष रूप से उपस्थित होने की अनुमति दी जाए। यहां तक कि उपस्थिति संतोषजनक हो, तब भी माहौल अवास्तविक होगा। मुझे लगता है कि सदन ऐसे संसदीय लोकतंत्र की तरह काम करेंगे, जहां भावना अनुपस्थित होगी और आत्मा लापता। एक देश और हर चीज एक जैसी
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दोनों सदनों का मुख्य काम होगा लंबित विधेयकों तथा सत्रों के बीच के अंतराल के दौरान जारी किए गए 11 अध्यादेशों को पारित करवाना। यह समझ से परे है कि जब देश कई तरह के संकटों-आर्थिक तबाही, बढ़ती महामारी और चीन की धमकी-का सामना कर रहा है, सरकार आखिर क्यों प्रमुख क्षेत्रों में केंद्र-राज्य संबंधों को बदलने की घातक कोशिश कर रही है। अध्यादेश प्रधानमंत्री के इस पसंदीदा सिद्धांत का हिस्सा हैं कि हर हाल में 'एक देश और हर चीज एक जैसी' हो। यह सिद्धांत राज्यों और केंद्र के बीच के उस सांविधानिक समझौते की जड़ को काटता है कि भारत राज्यों का संघ होगा तथा संघवाद-विधायी और कार्यकारी शक्तियों इसका बुनियादी सिद्धांत होगा।
बरसों से राज्यों ने अपनी अनेक शक्तियां केंद्र सरकार को हस्तांतरित की हैं। सारी पार्टियों ने भारत पर शासन किया है और इसके लिए सारी पार्टियों को दोषी ठहराया जा सकता है। नरेंद्र मोदी ने राज्यों की शक्तियों को हड़पने को एक नई ऊंचाई पर पहुंचा दिया है और कार्यकारी कार्रवाई तथा कानून के जरिये यह हमला लगातार जारी है। जरा कुछ नए अध्यादेशों पर गौर कीजिए। बैंकिंग (नियंत्रण) अधिनियम आज सारे बैंक, कुछ  गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियां (एनबीएफसी) और सारी बड़ी वित्तीय मध्यवर्ती संस्थाएं बैंकिंग (नियंत्रण) अधिनियम से नियंत्रित होती हैं। पहले से ही बोझ कम नहीं है। नियामक के रूप में रिजर्व बैंक का रिकॉर्ड मिला-जुला है : उसकी नाक के नीचे कई घोटाले हुए हैं। राज्यों के अधीन और उसकी निगरानी में जो एकमात्र महत्वपूर्ण वित्तीय मध्यवर्ती संस्था है, वह है को-ऑपरेटिव बैंक। अधिकांश राज्यों में जिला केंद्रीय सहकारी बैंक और शहरी सहकारी बैंक हैं। ये जिला स्तर के सर्वोच्च बैंक हैं और ये सदस्य सहकारी बैंकों को वित्त पोषित करते हैं।
कुछ जिला केंद्रीय सहकारी बैंक तथा शहरी सहकारी बैंक का प्रदर्शन शानदार है, तो कुछ का खराब। अच्छे हों या बुरे, उन्हें नियंत्रित करने के लिए राज्य सरकार के पास पर्याप्त शक्तियां हैं। इस स्थिति को क्यों बदलना चाहिए? मोदी सरकार ने एक अध्यादेश के जरिये सारे जिला केंद्रीय सहकारी बैंकों और शहरी सहकारी बैंकों को केंद्र के अधीन ला दिया है और रिजर्व बैंक को इसका नियामक नियुक्त किया है। सहकारी बैंक के सदस्यता ढांचे और वित्तीय ढांचे में बदलाव लाने के लिए शक्तियां वापस ले ली गई हैं, जिसके फलस्वरूप नियंत्रण तथा प्रबंधन अजनबियों और लुटेरों को हस्तांतरित हो सकता है। इस अध्यादेश के पीछे की भावना यही है कि सारी बड़ी वित्तीय मध्यवर्ती संस्थाओं को केंद्र सरकार के अधीन होना चाहिए और सारे जिला केंद्रीय सहकारी बैंकों तथा शहरी सहकारी बैंकों के प्रबंधन (निर्वाचित निदेशकों) को केंद्र सरकार के प्रति वफादार होना चाहिए। यह अध्यादेश राज्यों के अधिकारों का खुला अतिक्रमण है।

आवश्यक वस्तु अधिनियम

मेरा मानना है कि आवश्यक वस्तु अधिनियम (ईसी अधिनियम) का संबंध कमी और नियंत्रण के दौर से था। भारत में जब खाद्यान्न का सरप्लस भंडार है और उसके पास मांग के अनुरूप आवश्यक वस्तुओं के उत्पादन की क्षमता है, वाकई इसकी कोई जगह नहीं होनी चाहिए। फिर भी इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि मौसमी तंगी या बाढ़ या सूखा के समय जमाखोरी और कालाबाजारी करने वाले फायदा उठाते हैं। इसीलिए आवश्यक वस्तु अधिनियम कानून की किताब में बना हुआ है और राज्य सरकारों को कारोबार को नियंत्रित करने के पर्याप्त अधिकार देता है, जिसमें विभिन्न मध्यवर्ती संस्थाओं पर स्टॉक जमा करने की सीमाएं तय करने का अधिकार शामिल है। यदि केंद्र सरकार कानून को और मुक्त करना चाहती थी, तो वह एक नीति पत्र वितरित करती या एक मॉडल ऐक्ट लागू करती और इसका नियंत्रण राज्यों को सौंपती। लेकिन ऐसा कोई कदम मोदी सरकार के इरादों को संतुष्ट नहीं कर पाएगा। अध्यादेश के जरिये राज्य सरकारों की 'नियंत्रण' करने की शक्तियों में कटौती हो गई और 'स्टॉक जमा करने की सीमा' तय करने का अधिकार छलावा हो गया। शर्त तथा स्पष्टीकरण उपखंड के जरिये अध्यादेश ने स्टॉक सीमा की अवधारणा को छलावा और अर्थहीन कर दिया। यदि यह अध्यादेश कानून बन जाता है, तो जमाखोर जश्न मनाएंगे।

एपीएमसी एक्ट तथा अनुबंध की स्वतंत्रता 

मेरा मानना है कि कृषि उत्पाद विपणन समिति (एपीएमसी) अधिनियम में समय-समय पर संशोधन होने चाहिए और कृषि उत्पाद का विपणन - धीरे उदार किया जाना चाहिए। इस लक्ष्य को हासिल करने का रास्ता आदर्श कानूनों तथा दृढ़ निश्चय से निकलता है, न कि विधायी रास्ते से। अध्यादेश के जरिये केंद्र सरकार ने राज्य के विधायी एपीएमसी ऐक्ट को निरस्त कर दिया है। सबसे बुरी तरह प्रभावित हैं पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और कई अन्य राज्य, जिन्होंने सार्वजनिक खरीद तथा किसानों को एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) देने में भारी निवेश किया है। आशंका इस बात की है कि मोदी सरकार शांता कुमार समिति की विवादास्पद सिफारिशों को अमल में लाने की कोशिश कर रही हैं, जिसका प्रभाव सार्वजनिक खरीद में कमी, सार्वजनिक वितरण प्रणाली, एमएसपी सिद्धांत तथा खाद्य सुरक्षा पर पड़ेगा। अनुबंध की स्वतंत्रता से संबंधित इसके साथ लाया गया अध्यादेश खरीदार को उत्पाद के एवज में एमएसपी से कम का भुगतान न करने के लिए बाध्य नहीं है, जिससे संदेह हो रहा है कि एमएसपी को हटाया जा सकता है। इन अध्यादेशों के विरोध में पंजाब के किसान सड़कों पर हैं, पंजाब विधानसभा ने इन दोनों अध्यादेशों को सर्वसम्मति से खारिज किया है। अकाली दल ने प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया। छत्तीसगढ़ ने विधेयकों को वापस लेने की मांग की है। हरियाणा और मध्य प्रदेश बिना किसी स्पष्टीकरण के चुप्पी साधे हुए हैं। यह स्पष्ट है कि राज्य सरकारों का नजरिया कुछ भी क्यों न हो, मोदी सरकार अपने क्रूर बहुमत का उपयोग करेगी और संशोधनों को पारित करेगी और संघवाद को एक और झटका दिया जाएगा। एक राष्ट्र, हर चीज एक जैसी, का सिद्धांत अंततः एक राष्ट्र को तबाह कर देगा।

 
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