कैसे हो संसदीय कामकाज में सुधार

वरुण गांधी Updated Sun, 24 Jan 2016 06:47 PM IST
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How improve parliament working

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बिस्मार्क ने कहा था कि कानून सॉसेज (मांस से भरी खाद्य वस्तु) की तरह होता है, जिसे बनते हुए न देखना ही बेहतर है। भारतीय संसद के बारे में भी यही कहा जा सकता है। हम सभी के मन में संसद के प्रति सम्मान है, पर यह अक्सर मरणासन्न, निष्क्रियता, भ्रष्टाचार, खराब कानून निर्माण और लोकलुभावनवाद की साक्षी लगती है। इस संस्था का यह द्वैध सुधार की इसकी क्षमता को सीमित करता है। संस्थागत गतिरोध के बजाय इसे सरकार के कामकाज को मजबूत बनाने का काम करना चाहिए।
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संसद के समय का दुरुपयोग एवं स्थगन शासन को सुस्त और राजनीतिक विमर्श को सतही बनाता है। ऐसे में, संसद का कामकाज मुश्किल होता गया है। हमारी संसद में नीतियों पर विमर्श और बहस बहुत कम होता है, जिसे मजबूत बनाने की जरूरत है। भारतीय संसदीय प्रणाली सत्तारूढ़ अभिजात वर्ग को एजेंडा तय करने का पूरा अधिकार देती है। सांसदों को पता ही नहीं होता कि बहस के लिए कौन-सा विषय है, इसलिए वे तैयारी करके नहीं आते हैं। यह उनके औसत दर्जे के बहस से परिलक्षित होती है। राजनीतिक दलों के बीच बहस को अंतिम क्षणों में राजनीतिक सौदों का बंधक बनाने के बजाय विधायी फैसला लेने में सांसदों की ज्यादा से ज्यादा भागीदारी होनी चाहिए। राजनीतिक फायदा उठाने के लिए महत्वपूर्ण विधेयकों को चुनावी मौसम के लिए क्यों छोड़ दिया जाना चाहिए?
संसद में सभ्यता एक अनूठी सोच है, पर हम सबको इसे बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए। पिछले दो सत्रों से व्यवधान के चलते संसद में कामकाज नहीं हुआ। गुमराह सदस्यों को निलंबित करने के अध्यक्ष के अधिकार का इस्तेमाल सरकार के समर्थन के बगैर शायद ही होता है। सदन में अंधाधुंध व्यवधान के लिए दंड होना चाहिए।
लोकसभा परिचालन के नियम में इस संबंध में पर्याप्त निर्देश दिए गए हैं, जिसमें किसी सदस्य द्वारा दूसरे को बीच में नहीं टोकने, अध्यक्ष द्वारा अनुमति मिलने पर ही बोलने और वेल में विरोध प्रदर्शन करने से रोकने जैसे प्रावधान शामिल हैं। काम नहीं तो वेतन नहीं और विपक्ष को संसद ठप करने से रोकना के लिए दंड को लागू करना चाहिए।

संसद को समयबद्ध बनाने की जरूरत है, ताकि बहस के लिए बैठकें हो सकें। इसकी बैठकों की संख्या सरकार पर छोड़ने के बजाय निर्धारित होनी चाहिए। एक निकाय जो सरकार की अनुमति के बिना खुद सत्र बुला सकती है, वह विधायी मामलों में ज्यादा स्वतंत्र होगी। प्रश्नकाल को अनिवार्य बनाकर इसे लगातार आयोजित किया जाना चाहिए, ताकि मंत्रियों को जवाबदेह बनाया जा सके। जो मंत्री पूरी तैयारी के साथ नहीं आएं, उनकी निंदा की जानी चाहिए।

किसी भी संसद को अपनी सदियों पुरानी परंपरा और कार्यप्रणाली पर टिके नहीं रहना चाहिए। कनाडा की संसद हर संसदीय सीट को ज्यादा प्रतिस्पर्द्धी बनाने के लिए उनमें आनुपातिक प्रतिनिधित्व के तत्वों को शामिल करने पर विचार कर रही है। ब्रिटिश संसद ने हफ्ते में एक दिन सामान्य बहस करने की शुरुआत की है, जिसमें मतदान जरूरी नहीं है। यह नीति संबंधी परामर्श देने, रिपोर्ट तैयार करने या कानून में परिवर्तन करने के लिए विभिन्न समितियों को और अधिकार भी देती है। सांसद बिना किसी शोर-शराबे के बहस करते हैं और उन्हें असंसदीय भाषा के इस्तेमाल की अनुमति नहीं है।

सार्वजनिक समितियों को, जिन्हें एक बार भंग कर दिया गया था, बाद में बिना किसी विशेषज्ञता के अधिकार संपन्न बनाया गया, क्योंकि सदस्यों को सूचना देने की क्षमता सुधारने, लोक भागीदारी को बढ़ावा देने और संसदीय निगरानी की रक्षा करने के लिए ज्यादातर सरकारी विधेयकों को लिखित एवं मौखिक सुबूत के प्रावधान के कारण लोक सुनवाई की जरूरत थी। ऐसे में विशेषज्ञों द्वारा कानून को आकार दिया जाता है। अब व्यावहारिक अनुभव प्रदान करने के लिए स्थायी विशेषज्ञ विधायी समितियां बनाने की तरफ कदम बढ़ाया जा रहा है। हमारी संसदीय स्थायी समितियों की अप्रासंगिकता देखने लायक है। मूलतः इन्हें विधायी विशेषज्ञता में सुधार के लिए बनाया गया था, पर वे ज्यादातर उपेक्षित रहती हैं। उन्हें सरकार के कामकाज पर वास्तविक रूप से नियंत्रण रखते हुए सत्ता का प्रतीक होना चाहिए। अमेरिका और ब्रिटेन की तरह हमें ऐसी समितियों के साथ विशेषज्ञों को जोड़ने पर विचार करना चाहिए।

गैर-मंत्रालयी सांसदों को बहुत कम सुविधा हासिल है। दलबदल-विरोधी कानून और पार्टी के भीतर सीमित लोकतंत्र भी स्थितियों को मुश्किल बनाता है। वर्ष 1970 से अब तक कोई भी प्राइवेट मेंबर बिल संसद में पारित नहीं हुआ है। सांसदों को विकास की जरूरत और वास्तविक चुनाव के प्रति उत्तरदायी बनने के लिए अपने निर्वाचन क्षेत्र एवं संसद के बीच समय का बंटवारा करना होगा। सांसदों को हर सत्र में एक पूरा सप्ताह अपने सरोकारों से जुड़े मुद्दों पर बहस के लिए क्यों नहीं दिया जा सकता है? ब्रिटेन और कनाडा में सभी सांसदों को हर वर्ष बीस दिन इसके लिए दिया जाता है। सांसदों को उच्च गुणवत्ता वाले कर्मचारियों की आवश्यकता है, जो उन्हें कानूनी बारीकियों और लेखा-परीक्षा की नीतियों पर बहस करने में मदद करें। विधेयकों पर मतदान को सारणीबद्ध करके विश्लेषित किया जाना चाहिए और फिर इंटरनेट पर डाल देना चाहिए, ताकि लोग जान सकें कि उनके प्रतिनिधियों ने किस मुद्दे पर किस तरह मतदान किया है।

पिछले कुछ दशकों में सुप्रीम कोर्ट विधायी गतिविधियों का केंद्र बन गया है और संसद पृष्ठभूमि में है, तो इसकी वजह तलाशना जरूरी है। संसद की इस सुस्ती से नीतिगत पक्षाघात बढ़ा है।

देश के मतदाताओं की आकांक्षाएं बढ़ गई हैं, जिन्हें केवल सोची-समझी लोकनीति के जरिये ही पूरा किया जा सकता है। इसलिए बिना किसी निहित स्वार्थ के बहस एवं विचार-विमर्श के जरिये कानून बनाना जरूरी है।
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