एमएसएमई को कैसे मिले आसान कर्ज, बता रही हैं सविता शंकर

Savita Shankarसविता शंकर Updated Thu, 23 Jul 2020 01:19 AM IST
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MSME Sector - फोटो : Social Media

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कोविड-19 संकट और उसके परिणामस्वरूप लगाए गए लॉकडाउन ने भारत में सूक्ष्म, लघु और मध्यम दर्जे के उद्योगों (एमएसएमई) के लिए विशेष रूप से कठिन चुनौतियां पैदा कर दी हैं, जो उनके सीमित वित्तीय संसाधनों से उपजी हैं।
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नतीजतन भारत सरकार ने देश के 6.34 करोड़ एमएसएमई की मदद के लिए कई उपायों की घोषणा की है, क्योंकि भारतीय अर्थव्यवस्था में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका है-वे 1.10 करोड़ लोगों को रोजगार देते हैं और देश के सकल घरेलू उत्पाद में 29 फीसदी का योगदान करते हैं।
सबसे बड़ी पहल 45 लाख एमएसएमई को अतिरिक्त सुविधा की मंजूरी के लिए 40 अरब डॉलर की क्रेडिट गारंटी वाले प्रावधान की घोषणा थी, जो अभी बैंकों और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) से सुविधाओं का लाभ उठाते हैं।
हालांकि कर्ज लेने वाले एमएसएमई को ऐसी राहत प्रदान करना महत्वपूर्ण है, पर इससे केवल एक छोटे हिस्से को मदद मिलती है, जो कि बैंकों और एनबीएफसी से कर्ज लेने में सक्षम हैं। 2018 की आईएफसी-इंटेलकैप अध्ययन का अनुमान है कि भारतीय एमएसएमई का ऋण अंतराल (क्रेडिट गैप) 25.8 खरब रुपये (340 अरब डॉलर) है, जिसका मतलब है कि इस क्षेत्र की जरूरतों को पूरा करने के लिए एमएसएमई वित्तपोषण को तीव्र गति से बढ़ाने की आवश्यकता है। रोजगार सृजन के दृष्टिकोण से इस क्षेत्र के महत्व को देखते हुए एमएसएमई कर्ज को समर्थन देने वाले बुनियादी ढांचे में निवेश करना महत्वपूर्ण है, भविष्य में इसका बेहतर लाभ मिलने की संभावना है।

एमएसएमई ऋण देने में एक बड़ी चुनौती इस क्षेत्र की कंपनियों के क्रेडिट इतिहास और विश्वसनीय वित्तीय विवरणी की कमी के चलते क्रेडिट मूल्यांकन को पूरा करने की कठिनाइयों के कारण पैदा होती है। कर्ज देने वालों को अपने आकलन में काफी समय और श्रम देने की जरूरत होती है, जिसके कारण लेनदेन की लागत ज्यादा होती है। कुछ कर्जदाता उद्यमी की निजी संपत्ति बंधक रखने के आधार पर कर्ज देना पसंद करते हैं। यह एक ऐसी नीति है, जिसे उच्च क्षमता वाले एमएसएमई भी पूरा करने में अक्षम होते हैं।

हालांकि कर्जदाता हाल के डिजिटलीकरण की घटनाओं का तेजी से दोहन कर रहे हैं, जिससे एमएसएमई के बारे में सूचना के नए स्रोत उपलब्ध हुए हैं। जीएसटी और इंडिया स्टेक, ओपन एप्लीकेशन प्रोग्राम इंटरफेस जैसे डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे की उपलब्धता खासकर ऐसे कर्जों के लिए उपयोगी है। इसके अलावा व्यापार प्राप्तियों की नीलामी का इलेट्रॉनिक मंच ट्रेड रिसिवेवल्स डिस्काउंटिंग सिस्टम भी एमएसएमई उधारदाताओं के लिए मददगार है। पारंपरिक रूप से इस क्षेत्र को कर्ज देने की लागत ज्यादा होती है, लेकिन डिजिटल डाटा का उपयोग लागत को घटा देता है। ऐसे डाटा एमएसएमई उधारदाताओं के लिए भी उपयोगी होते हैं, जो विश्वसनीय वित्तीय विवरणों की अनुपल्बधता के कारण उद्यमियों के नकदी प्रवाह के आधार पर कर्ज देते हैं।

एक समय एमएसएमई को कर्ज देने के मामले में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का वर्चस्व था, दिसंबर, 2019 में उनकी हिस्सेदारी 49.8 फीसदी थी, जबकि शेष हिस्सेदारी निजी बैंकों तथा एनबीएफसी की थी। 2015 में लघु वित्त बैंकों को लाइसेंस मिलने से निजी बैंकों की एक नई श्रेणी सामने आई, जो विशेष रूप से एमएसएमई क्षेत्र पर ध्यान केंद्रित करती है। कई प्रकार के एमएसएमई केंद्रित एनबीएफसी भी सामने आए हैं। पहले जहां ज्यादातर एनबीएफसी ट्रकों के लिए कर्ज देने पर ध्यान केंद्रित करते थे, नए एनबीएफसी विशिष्ट समूहों टेक्सटाइल और कृषि मूल्य श्रृंखला जैसे क्षेत्रों में वित्तपोषण की संभावनाएं खोज रहे हैं।

दिसंबर 2017 से दिसंबर 2019 के बीच, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के एमएसएमई ऋणों पर एनपीए दर 16.6 प्रतिशत और 18.7 प्रतिशत के बीच थी, जो निजी क्षेत्र के बैंकों की एनपीए दरों की सीमा से ऊपर थी (जो कि 3.5 से पांच फीसदी के बीच थी)। इसी अवधि के दौरान एनबीएफसी की एनपीए दरें 4.9 प्रतिशत से 7.6 प्रतिशत के बीच रहीं।

ये आंकड़े दर्शाते हैं कि देश में एमएसएमई ऋण का समर्थन करने के लिए बुनियादी ढांचे में निवेश करने की आवश्यकता है, ताकि उधारदाता सही निर्णय लेने में सक्षम हों। उदाहरण के लिए, एमएसएमई क्षेत्र के कर्जदाता और उधारकर्ता उस नीतिगत पहल से लाभान्वित हो सकते हैं, जो विभिन्न कर्ज देने वाली संस्थानों में भारी मात्रा में डाटा इकट्ठा करने के लिए ऋणदाताओं को प्रोत्साहित करता है। इस तरह आंकड़ा इकट्ठा करने से एमएसएमई के वित्तीय विवरण आंकड़ों का एक भंडार तैयार हो सकता है, जो उधारदाताओं को विभिन्न एमएसएमई के लिए बेंचमार्क विकसित करने में सक्षम बनाता है, जिनमें से कई औपचारिक वित्तीय प्रणाली के लिए नए हो सकते हैं।

जानकारी इकट्ठा करने एक और अधिक उन्नत रूप ऋणदाताओं के वित्तीय प्रदर्शन, ऋण, और डिफॉल्ट डाटा की तुलना कर सकता है, ताकि सभी उधारदाता ऋण मॉडल विकसित करने में सक्षम हो सकें, जिसके ऋणदाता स्तर के मॉडल की तुलना में पूर्वानुमान लगाने में अधिक बेहतर होने की संभावना है। ऐसी एक पहल का उदाहरण जापान का 'क्रेडिट रिस्क डाटाबेस' है, जिसके माध्यम से सदस्य बैंक वित्तीय प्रदर्शन और डिफॉल्ट से संबंधित एसएमई डाटा साझा करते हैं। भारतीय संदर्भ में, यह क्रेडिट रिस्क डाटाबेस स्थापित करना उपयोगी हो सकता है, जिसमें बैंक और एनबीएफसी दोनों शामिल हैं, क्योंकि एनबीएफसी भी एमएसएमई को ऋण देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

डिजिटल डाटा की उपलब्धता, नए प्रकार के एमएसएमई ऋणदाताओं का प्रवेश, और ऋण देने के लिए नए दृष्टिकोण सकारात्मक विकास हैं, जिससे कई नए एमएसएमई उधारकर्ताओं को ऋण मिलने की संभावना है। फिर भी, प्रक्रिया अनिवार्य रूप से जोखिम को बढ़ाती है, क्योंकि उधारदाता नए क्षेत्रों में प्रवेश कर रहे हैं और नए ग्राहक क्षेत्रों के बारे में सीख रहे हैं। नई जानकारियों की तुलना करने और उन्हें साझा करने के लिए बुनियादी ढांचे में निवेश करना अब अनिवार्य हो गया है। यह एमएसएमई क्षेत्र में कर्ज देने वालों के लिए लाभप्रद हो सकता है।

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