फासला बढ़ा रही है भारतीय रेल

सुभाषिनी सहगल अली Updated Wed, 16 Jul 2014 01:26 AM IST
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Increasing distances Indian railway

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हर साल रेल मंत्री का अपना बजट पेश करते समय दिए जाने वाले भाषण को मैं काफी आश्चर्य के साथ सुनती हूं। समझ में नहीं आता है कि वह किस रेलवे की बात कर रहे हैं। और ऐसा सिर्फ गौड़ा जी का भाषण सुनते समय नहीं लगा। हर साल ऐसा लगता है, खास तौर से हाल के वर्षों में।
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हाल के इन वर्षों में, कई नए शब्दों का प्रयोग रेल बजटों में होने लगा है। हाईटेक ट्रेन्स; स्टेट ऑफ द आर्ट रेलवे, स्टेशंस विथ स्टेट ऑफ द आर्ट फैसलिटीज; इत्यादि, इत्यादि। इन शब्दों का प्रयोग रेल मंत्री के बजट भाषण में हर साल बढ़ता ही जा रहा है। ऐसा लगता है कि इनके प्रयोग मात्र से भारतीय रेल की तमाम वास्तविकताएं बिल्कुल बदल जाएंगी। और शायद रेल मंत्री के बजट भाषण पर टिप्पणी करने वाले तमाम विशेषज्ञों को इस बात का पूरा भरोसा होता है कि ऐसा कुछ हो भी रहा है। क्योंकि यह भी हो सकता है कि उनमें से अधिकतर कभी ट्रेन से सफर करते ही नहीं हैं।
पिछले कई सालों में मोंटेक सिंह अहलूवालिया कई ऐसे पदों पर रहे, जिनका संबंध रेलवे को पैसा उपलब्ध कराने और उस पैसे के खर्च को तय करने से था। जैसा कि अखबारों से पता चला, इन तमाम वर्षों में उन्होंने केवल एक बार ट्रेन से सफर किया। राजधानी के वातानुकूलित फर्स्ट क्लास के डिब्बे में उन्होंने एक-दो घंटे का सफर तय किया। उन दो घंटों में वह काफी परेशान रहे। उन्हें लगा कि प्लेटफार्म की हालत तो बर्दाश्त के बाहर थी ही, लेकिन ट्रेन के अंदर भी स्वच्छता का स्तर संतोषजनक नहीं था। फिर उन्हें इस बात पर आश्चर्य हुआ कि ट्रेन इतनी ज्यादा हिल रही थी कि उनके चाय के प्याले से आधी चाय बाहर छलक गई। सफर का जब अंत हुआ, तो उन्होंने कहा कि पता नहीं, लोग कैसे ट्रेन में सफर करते होंगे!
बात सिर्फ अहलूवालिया जी की नहीं, उन तमाम लोगों की है, जिन्हें रेल में यात्रा करने वालों की दुर्दशा का बिल्कुल अनुभव नहीं है। वह उसकी कल्पना भी नहीं कर सकते हैं; लेकिन रेल पर क्या खर्च होगा और किस मद में खर्च होगा, उसका फैसला वह करते हैं।

भारतीय रेल का जाल 7,500 स्टेशनों तक फैला हुआ है। इस साल, रेल मंत्री महोदय ने इस बात का आश्वासन दिया है कि इनमें से 12 स्टेशन 'अंतरराष्ट्रीय स्तर' के बना दिए जाएंगे। बाकी राष्ट्रीय स्तर के ही रहेंगे, जिसका मतलब है कि इनका इस्तेमाल करने वाले यात्री कुत्तों, गाय, दुनिया के सबसे बड़े आकार के चूहों, खटमल, कॉकरोच इत्यादि के साथ प्लेटफॉर्म पर बैठेंगे, खड़े रहेंगे और अपने परिवार के साथ रात भर पड़े भी रहेंगे।

इन स्टेशनों पर लगे नल से या तो पानी निकलेगा ही नहीं या फिर टपकेगा। स्टेशन पर बने शौचालय इतने गंदे और बदबूदार होंगे कि उनका इस्तेमाल करने के बजाय पुरुष यात्री रेल की पटरी के आस-पास की जगह का इस्तेमाल करेंगे। महिला यात्रियों की पीड़ा की थाह पाना मुश्किल है।

ऐसा करना तो बहुत मुश्किल होगा कि वातानुकूलित डिब्बों में सफर करने वालों के बारे में बिल्कुल सोचना बंद करके यात्रियों के बहुमत हिस्से की परेशानियों को दूर करने की ठान ली जाए, लेकिन क्या उस बहुमत हिस्से की जरूरतों को बिल्कुल नजरअंदाज करके योजनाओं को तय करना उचित है? सवाल तो बहुत खड़े हो जाते हैं। एक सवाल तो यह भी है कि जब ट्रैक की हालत ऐसी है कि राजधानी इतनी ज्यादा हिलती है कि चाय की प्याली से चाय छलक जाता है, तो फिर उस पर सुपर फास्ट और बुलेट ट्रेन कैसे चलेंगी।
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