संक्रमण मुक्त रक्त की जरूरत, इन दो चुनौतियों का सामना कर रहा देश

Bijan Mishraबिजन कुमार मिश्रा Updated Fri, 09 Oct 2020 01:35 AM IST
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देश में 19.5 लाख यूनिट रक्त की कमी
देश में 19.5 लाख यूनिट रक्त की कमी

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जैसा कि आयुष्मान भारत, राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति और राष्ट्रीय डिजिटल स्वास्थ्य मिशन जैसी पहलों के माध्यम से भारत 2030 के आते-आते यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज (यूएचसी) प्राप्त करने की ओर अग्रसर है, पर्याप्त और सुरक्षित रक्त जैसी स्वास्थ्य देखभाल से जुड़ी आवश्यकताओं पर ध्यान देने का यही उचित समय है। गौरतलब है कि भारत में अब भी विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, लगभग 19.5 लाख यूनिट रक्त की कमी है। राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन (एनएसीओ) ने एक आरटीई में बताया कि भारत भर में लगभग 1,342 लोगों को 2018-19 में खून चढ़ाने के क्रम में एचआईवी संक्रमण हो गया। इससे रक्त के आदान-प्रदान के दौरान सुरक्षा और गुणवत्ता संबंधी गंभीर चिंताएं पैदा हुई हैं। कोविड-19 महामारी ने इस संकट को और गंभीर बना दिया है और हमें याद दिलाया है कि हमें अब भी रोगियों को पर्याप्त और सुरक्षित रक्त की उपलब्ध कराने के लिए एक लंबा रास्ता तय करना है।
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रक्त की आपूर्ति में कमी और ट्रांसफ्यूजन-ट्रांसमिटेड इंफेक्शन (टीटीआई) दो बड़ी चुनौतियां हैं, जिनका देश आज सामना कर रहा है। परिचालन स्तर पर, हम पाते हैं कि रक्त ट्रांसफ्यूजन सेवा असंगठित और खंडित है, जिसके परिणामस्वरूप ब्लड बैंकों और अंतिम उपयोगकर्ताओं के बीच संवाद की कमी की स्थिति पैदा हो जाती है। इसके कारण मांग और आपूर्ति में असंगत अंतर आने लगता है और परिणामस्वरूप रक्त की उपलब्धता और गुणवत्ता प्रभावित होती है। दूसरी तरफ, स्वैच्छिक रक्तदान के महत्व के बारे में लोगों में जागरूकता की कमी है। डब्ल्यूएचओ के अनुसार, स्वस्थ आबादी के एक फीसदी लोगों द्वारा नियमित रक्त दान सुरक्षित रक्त की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त है, क्योंकि इन्हें रक्तदाताओं का सुरक्षित समूह माना जाता है। यह निराशाजनक है कि दूसरा सबसे अधिक आबादी वाला देश होने के बावजूद हम अब भी इस मामूली से लक्ष्य को पाने में सक्षम नहीं हैं। 
मरीजों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और सार्वजनिक स्वास्थ्य को बढ़ावा देने के लिए भारत के केंद्रीकृत हीमोविजिलेंस प्रोग्राम को लागू किया जाना जरूरी है। लेकिन इसके लिए सरकार द्वारा स्वास्थ्य सुरक्षा और परिवार कल्याण के लिए अनिवार्य माने जाने वाले राष्ट्रीय जैव प्रौद्योगिकी संस्थान, नोएडा जैसे संस्थानों द्वारा इस वपर एक विस्तृत अध्ययन की आवश्यकता हो सकती है। हीमोविजिलेंस कार्यक्रम भारत में पहली बार 10 दिसंबर, 2012 को पहले चरण में 60 मेडिकल कॉलेजों में शुरू किया गया था। साथ ही रक्त संचरण और रक्त उत्पाद प्रशासन से संबंधित प्रतिकूल प्रतिक्रियाओं की निगरानी के लिए एक बेहतर ढंग से तैयार कार्यक्रम की भी शुरुआत की गई थी। ऐसा हो सकता है कि जिन ब्लड बैंकों में रक्त का सबसे ज्यादा आदान-प्रदान होता है, वे ट्रांसफ्यूजन ट्रांसमिसिबिल संक्रमण के लिए रक्त का सबसे कम परीक्षण करते हैं। जबकि हमें उम्मीद यह होती है कि मरीजों को टीटीआई संक्रमण की उच्च आशंका को देखते हुए ये बैंक रक्त का ज्यादा बेहतर परीक्षण करते होंगे। 
2011 और 2019 के बीच विभिन्न राज्यों के अस्पतालों में किए गए सर्वेक्षणों से पता चला है कि सात से बहत्तर फीसदी वयस्क थैलसीमिया रोगी अपर्याप्त रक्त सुरक्षा उपायों की वजह से टीटीआई (एचसीवी, एचबीवी, एचआईवी) पॉजिटिव पाए गए। भारत में रक्त कैंसर के रोगियों, थैलसीमिया रोगियों, गर्भवती महिलाओं, सड़क दुर्घटना के शिकार लोगों, वैकल्पिक सर्जरी के जरूरतमंद और विभिन्न लोगों के बीच इस संबंध में जागरूकता पैदा करने के लिए संचार अभियान चलाया जाना चाहिए कि 'सुरक्षित रक्त क्या है'? 2010-2017 के दौरान किए गए अध्ययनों के आधार पर केवल थैलसीमिया रोगियों में एचआईवी, एचबीवी और एचसीवी का अनुमानित संचरण पांच रोगियों में एक की खतरनाक दर पर है। यह संख्या मरीजों को एक ऐसा ब्लड बैंक चुनने की स्वतंत्रता देने की जरूरत को उजागर करती है, जो सबसे सुरक्षित रक्त प्रदान करे। ऐेसे हालात में हमें बिना विलंब पीएमजेएवाई 'आयुष्मान भारत' के तहत सभी नागरिकों के लिए सुरक्षित और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य देखभाल सुनिश्चित कराने में अब देर नहीं करनी चाहिए। 

(संस्थापक, पेशेंट सेफ्टी ऐंड ऐक्सेस इनिशिएटिव ऑफ इंडिया) 
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