उम्मीद और आशंकाओं के बीच बातचीत

कुलदीप तलवार Updated Sat, 08 Feb 2014 12:58 AM IST
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Interaction between hope and fear

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पाकिस्तान में सरकार के प्रतिनिधियों और तालिबान की ओर से नामांकित दल के बीच शांति वार्ता के लिए माहौल बनाने को लेकर पहली औपचारिक बातचीत हुई है। इस बातचीत का उद्देश्य एक दशक से पाकिस्तान में जारी हिंसा को खत्म करने के लिए शांति वार्ता की जमीन तैयार करना है। इसमें सरकार की तरफ से तालिबान के सामने पांच बुनियादी शर्तें रखी गई हैं।
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पहली और महत्वपूर्ण शर्त यही है कि बातचीत के दौरान किसी भी तरह की हिंसक घटना नहीं होगी। पिछले दिनों प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने नेशनल एसेंबली में भी कहा था कि दहशतगर्दी के साथ बातचीत नहीं चल सकती, इसलिए तालिबान को बातचीत के दौरान आतंकी हमले बंद करने होंगे। इसके अलावा, बातचीत संविधान के दायरे में करने, बातचीत का केंद्र हिंसा प्रभावित इलाकों को ध्यान में रखकर तय करने, तालिबान के नौ सदस्यीय समिति की, जिसे उसने अलग से गठित किया है, भूमिका के बारे में स्पष्टीकरण देने और बातचीत को लंबा न खींचने जैसी शर्तें भी रखी गई हैं। तालिबान के प्रतिनिधियों का कहना है कि वे अपने शीर्ष नेतृत्व को इन शर्तों के बारे में जानकारी देंगे और उसके बाद ही सरकार को इसके बारे में बताएंगे।
दरअसल नौ महीने पुरानी मुस्लिम लीग (नवाज) सरकार के लिए देश में फैली दहशतगर्दी एक बड़ी चुनौती है, जिसके कारण उसकी फजीहत हो रही है। पाकिस्तान में ऐसे लोगों की कमी नहीं, जिनका मानना है कि देश का राजनीतिक नेतृत्व चरमपंथी तत्वों के सामने बौना लगता है, जिसके कारण दहशतगर्दी पर काबू नहीं पाया जा रहा। इस आतंकवाद के लिए पिछली सरकारें भी जिम्मेदार हैं, जिन्होंने इसे खत्म करने के बजाय पालने का काम किया, जिसका खामियाजा अब मुल्क को भुगतना पड़ रहा है। तालिबान द्वारा 2007 से जारी हिंसक घटनाओं में अब तक हजारों लोग मारे गए हैं।
ऐसी पृष्ठभूमि में इस बातचीत ने वहां के लोगों में शांति की उम्मीदें तो जगाई ही हैं, लेकिन सवाल उठता है कि तालिबान और सरकार के बीच बातचीत की सफलता की कितनी संभावनाएं हैं। माना जा रहा है कि अगर पंजाब तालिबान के इस छोटे गुट के साथ सरकार का कोई समझौता हुआ भी, तो उसे मौलाना फजलुल्लाह के नेतृत्व वाला पाक तहरीक-ए-तालिबान नहीं मानने वाला। सच तो यह है कि तालिबान का यह सबसे बड़ा गुट सरकार से बातचीत करना ही नहीं चाहता। उसका मानना है कि पिछली सरकार की तरह नवाज शरीफ की मौजूदा सरकार भी अमेरिका की कठपुतली है और तालिबान से बातचीत की पहल दरअसल उसका ढोंग है।

पाकिस्तान में होता वही है, जो फौज और आईएसआई चाहती है। देखने की बात यह है कि इस बातचीत पर फौज क्या रुख अपनाती है। सरकार के भीतर भी रियाज पीरजादा और दूसरे कुछ मंत्रियों का मानना है कि तालिबान के साथ बातचीत से कुछ हासिल नहीं होने वाला। दरअसल इसके पीछे अतीत का अनुभव है। सच्चाई यह है कि अभी तक सरकार और तालिबान के बीच जो समझौते हुए हैं, वे ज्यादा देर नहीं टिक पाए।

स्वात घाटी को लेकर जो समझौता हुआ था, वह ज्यादा देर नहीं चला। आखिरकार सरकार को स्वात घाटी में फौजी कार्रवाई करनी ही पड़ी थी। पिछली सरकार के साथ जब तालिबान ने बातचीत करने का फैसला लिया था, तब दहशतगर्दों ने हमले तेज कर दिए थे। इस बार भी संभव है कि तालिबान के बड़े गुट हमलों में तेजी लाकर बातचीत में रुकावट डालें। अगर ऐसा होता है, तो सरकार का मकसद कामयाब नहीं हो पाएगा।

बहरहाल जब सरकार ने शांति वार्ता की पहल की है, तो उसका नतीजा देखने के लिए अभी इंतजार करना होगा। लेकिन पाकिस्तान इस समय जिस दौर से गुजर रहा है, उससे बाहर निकलने का केवल एक ही रास्ता है कि दहशतगर्दों के साथ सख्ती से पेश आया जाए। जब तक मुल्क से आतंकवाद को पूरी तरह खत्म नहीं किया जाता, वहां के नागरिकों की जान-माल की सुरक्षा में सरकार सफल नहीं हो पाएगी। नतीजतन शांति बहाल नहीं हो पाएगी, जो न केवल पाकिस्तान के लिए, बल्कि इस पूरे क्षेत्र के लिए बहुत जरूरी है।

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