कमला हैरिस और स्त्रियों की खुशी, कितना बदलाव आएगा

क्षमा शर्मा Updated Tue, 27 Oct 2020 02:42 AM IST
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Kamla Harris
Kamla Harris - फोटो : joebiden.com

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भारतीय मूल की कमला देवी हैरिस को जब से अमेरिका के चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी के लिए उपराष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया गया, तब से लोग ऐसे खुशी मना रहे हैं, जैसे कि यह पद सचमुच किसी भारतीय को ही मिलने वाला है। हालांकि ऐसी खबरें भी आ ही रही हैं कि कमला हैरिस को अपने भारतीय अतीत पर शायद ही कोई गर्व रहा है। भारत की कश्मीर नीति की वह बड़ी आलोचक भी रही हैं। हां, इन दिनों जब इस चुनाव में अप्रवासी भारतीयों को लुभाकर उनके वोट प्राप्त करने हैं, तब उन्हें जरूर अपनी जड़ों की याद आ गई है। कभी वह बचपन के इडली-डोसा को याद कर रही हैं, तो कभी नवरात्रि की बधाई दे रही हैं। कमला को दुर्गा के अवतार के रूप में भी पेश किया गया है।
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कमला कहती रही हैं कि चर्च से उन्हें बहुत शक्ति मिलती है, लेकिन इन दिनों एकाएक वह खुद को ऐसे प्रस्तुत कर रही हैं, जैसे उनसे बड़ा हिंदू कोई है ही नहीं। डेमोक्रेटिक पार्टी की सभाओं में हिंदी में नारे लगाए जा रहे हैं। उनकी प्रेस सेक्रेटरी सबरीना सिंह ने कहा भी कि अगर बिडेन और कमला की टीम जीतती है, तो वे भारतीयों के उत्थान, रोजगार और शिक्षा के लिए काम करेंगी। बिडेन प्रशासन भारत का दोस्त होगा। कमला को लेकर अमेरिका और भारत की नारीवादी भी बहुत उत्साहित हैं। वे इसे 'ग्लास सीलिंग' तोड़ना भी कह रही हैं। पिछले चुनावों में हिलेरी क्लिंटन की हार को स्त्रीवादियों ने अपनी हार की तरह देखा था।  
कमला हैरिस मौजूदा अमेरिकी राष्ट्रपति को नस्लवादी कहती हैं। उनका मशहूर बयान है कि नस्लवाद का कोई टीका नहीं होता। उनका मानना है कि जो नेता होते हैं, उन्हें नेता की तरह ही बोलना चाहिए। कैलिफोर्निया की रहने वाली और पेशे से वकील कमला हैरिस अपने काम को याद करते हुए कहती हैं, 'मैं बच्चों के लिए और यौन अपराधों के खिलाफ काम करती रही हूं।' यदि कमला यह चुनाव जीतती हैं, तो बताया जा रहा है कि वह पहली अश्वेत और पहली ही एशियाई होंगी, जो अमेरिका के उपराष्ट्रपति के पद पर पहुंचेंगी।
हालांकि जो अमेरिका दुनिया भर को नारीवाद के पाठ पढ़ाता है, वहां आज तक कोई महिला राष्ट्रपति नहीं बनी है। यह भी सोचने की बात है कि यदि कमला इस पद पर पहुंच भी जाएं, तो क्या वह अमेरिका की हथियार संबंधी और युद्धोन्माद की नीतियों में कोई परिवर्तन कर सकेंगी। क्या अमेरिका के अंध व्यापारिक हितों के खिलाफ वह कुछ कर पाएंगी। जो नारीवादी उनके होने भर से दुनिया को बदलने के सपने देख रही हैं, वे यह जानती ही हैं कि दुनिया में युद्ध कहीं भी हो, उसका सबसे अधिक खामियाजा औरतों को ही भुगतना पड़ता है। उनके ही घर उजड़ते हैं। वे ही दर-बदर होती हैं। वैसे भी अनुभव यह बताता है कि बड़े पद पर यदि कोई महिला पहुंचे, तो हो सकता है कि बाकी की बहुत-सी औरतें उसे रोल मॉडल की तरह देखने लगें। वैसी ही बनने की सोचने लगें। पर अगर नीतियों की बात करें, तो औरतें बड़े पद पर पहुंचकर भी कोई खास बदलाव नहीं कर पातीं। एशियाई देशों में तो भंडारनायके, इंदिरा गांधी, इमेल्डा मार्कोस, बेनजीर भुट्टो, चंद्रिका कुमारतुंगे, सू की, प्रतिभा पाटिल, जयललिता, मायावती, ममता बनर्जी, आनंदी बेन पटेल आदि न जाने कितनी महिलाएं सर्वोच्च पदों पर रही हैं। लेकिन उन्होंने अपने पूर्ववर्तियों के मुकाबले समाज में क्या और कितना बदलाव किया, यह नजर नहीं आता। इसके अलावा होता यह है कि वे भी उसी जाल में फंस जाती हैं, जिससे लड़ती हुई आती हैं।

उदाहरण के तौर पर, पिछले चुनाव में कहा जाता है कि हिलेरी की टीम ने डोनाल्ड ट्रंप की पत्नी मेलानिया ट्रंप की बेहद अश्लील तस्वीरें प्रसारित की थीं। आखिर हिलेरी भी वैसी ही निकलीं कि किसी से बदला लेना हो, तो उसके घर की औरतों पर हमला बोल दो। औरतों के चरित्र के वही मानक आदर्श की तरह से पेश करो, जिससे आज तक वे पिटती आई हैं और आगे भी उससे मुक्ति की संभावना नहीं दिखती। कमला हैरिस को सचमुच औरतों के लिए कुछ करना है, तो उन्हें उन विचारों और नारों से पीछा छुड़ाना पड़ेगा जो औरतों को सरेआम अपमानित करते हैं। दुनिया की नारीवादी यदि उनके उम्मीदवार बनने या चुनाव जीतने भर को नारीवाद की बहुत बड़ी जीत मान रही हैं, तो उनके दिवास्वप्न कहीं भंग न हो जाएं।

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