आंबेडकर से भी सीखा गांधी ने

Giriraj Kishoreगिरिराज किशोर Updated Mon, 10 Feb 2020 03:03 AM IST
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महात्मा गांधी
महात्मा गांधी - फोटो : फाइल फोटो

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हिंदी के प्रसिद्ध कथाकार-उपन्यासकार तथा महात्मा गांधी के दक्षिण अफ्रीका प्रवास पर आधारित पहला गिरमिटिया के लेखक गिरिराज किशोर का रविवार को देहांत हो गया। उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए यहां पेश है उनकी पुस्तक, गांधी और समाज के संपादित अंश :
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20वीं सदी में मानवाधिकार के क्षेत्र में दो ऐसे व्यक्ति सक्रिय हुए, जिन्होंने भारतीय समाज को गहराई से प्रभावित किया है। एक महात्मा गांधी, दूसरे भीमराव आंबेडकर। मानवाधिकार दो दिशाओं में प्रभावित होता है। एक, व्यक्ति के रूप में किसी के दुख को समझना और उसका प्रतिकार, दूसरा, सामाजिक स्तर पर समाज की तकलीफ को समझना और निराकरण करना। आंबेडकर का मानवीय सरोकार दूसरे प्रकार का था। उनके सामने एक इतना बड़ा दलित वर्ग था, जिसकी यातना को उन्होंने खुद महसूस किया था। उस वर्ग की पीड़ा उनकी अपनी थी। पीड़ा का निराकरण तभी संभव हो सकता है, जब मनुष्य उसका साक्षात्कार अपने अंदर करे।
आंबेडकर ने अपने सरोकारों को समष्टि से जोड़ा। उनकी इस करुणा को बुद्ध के संदर्भ में देखा जाए, तभी हम अनुभव कर सकते हैं कि आंबेडकर ने अपने अंदर की तकलीफ को अपने तक सीमित न रखकर समष्टि से जोड़ दिया था। मानव तभी मानव बनता है, जब करुणा का भाव उसे पखारता है। यही कारण था कि आंबेडकर दलित मुक्ति के लिए जो संघर्ष कर रहे थे, उसमें मनुवादी दासता को तोड़ने, जातीय जकड़न को कमजोर करने और सामाजिक गतिशीलता को बढ़ाने में बुद्ध-दर्शन का बहुत बड़ा हाथ है। सबसे बड़ी बात है कि उनका मानवाधिकार सुधारवादी न होकर आत्म मुक्ति का आंदोलन था, जिसमें आत्म-मुक्ति का एहसास उस व्यक्ति को भी हो सके, जो सामाजिक भेदभाव से सर्वाधिक प्रताड़ित है।
दक्षिण अफ्रीका में वहां के भारतीय गिरमिटिया मजदूरों को मुक्त करने के लिए ऐसा ही संघर्ष गांधी जी ने भी किया था। भारतीय मजदूर अधिकतर या तो दलित थे या पिछड़े वर्ग के थे। इसीलिए उन्हें अपने को एक तरह से 'डिक्लास’ करना पड़ा था। रहन-सहन, खान-पान, वेश-भूषा सबको बदलकर समान स्तर पर उतरकर उनके संघर्ष में शरीक होना गांधी के लिए अनिवार्यता थी। आंबेडकर के लिए यह जरूरी नहीं था, क्योंकि उनकी अपनी जड़ें उसी वर्ग में थीं। भले ही वह परम आधुनिक ढंग से रहते थे। गांधी ने यह अनुभव किया था कि ये मजदूर उनका बहुत सम्मान करते हैं, पर उनके जीवन जीने के और रहन-सहन के तरीके से नजदीक आने में झिझकते हैं। जब तक वह उसमें परिवर्तन नहीं लाएंगे, तब तक उनमें समानता का भाव पैदा करना संभव नहीं होगा। 

यहां तक कि उनके मकान में जो मजदूर या कार्यकर्ता रात में आकर ठहरते थे, उनके पेशाब के बर्तन सुबह वह स्वयं खाली करते और धोते थे। इसी बात को लेकर कस्तूरबा और उनके बीच तनाव भी हो गया था। आंबेडकर को इस समानता का प्रमाण देने की अनिवार्यता नहीं थी। उनकी दलित मुक्ति की दौड़ गांधी के बहुत आगे से शुरू हुई थी। गांधी ने आरंभ में जाति और वर्ण व्यवस्था को अवश्य माना, परंतु बाद में अपने व्यवहार में इस व्यवस्था को अस्वीकार भी किया कि वह ऐसे किसी विवाह में शामिल नहीं होंगे, जिसमें वर और वधू में एक दलित नहीं होगा। गांधी ने अपने को आंबेडकर के प्रभाव में इस बिंदु पर पूरी तरह से बदला। यह लचीलापन आंबेडकर से अधिक गांधी में देखने को मिलता है।

आंबेडकर के सामने अपने समाज को आगे बढ़ाने की चुनौती थी। गांधी के सामने वर्चस्व वाले समाज को पीछे लाकर उपेक्षित समाज के साथ समता का रिश्ता बनाने की चुनौती थी, जो और भी कठिन थी। इसका विरोध भी हुआ और प्रतिवाद भी। पर गांधी उनकी बस्तियों में रहे। एक बहुत बड़े वर्ग को छुआछूत के घृणित सोच से बाहर निकालने में सफल भी हुए। इन सबके बावजूद एक बहुत बड़ा हिस्सा अपने 'माइंड सेट’ से बाहर नहीं आ पाया। वह जाति और वर्णवाद वाले समाज में गांधी और आंबेडकर के प्रयत्नों के बावजूद अब भी मौजूद है।
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