चीन को सबक सिखा सकती है हमारी सेना, क्या और कैसे बता रहे हैं मारूफ रजा

Maroof Razaमारूफ रजा Updated Thu, 10 Sep 2020 05:14 AM IST
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गश्त पर निकले भारतीय सेना के जवान। (प्रतीकात्मक तस्वीर)
गश्त पर निकले भारतीय सेना के जवान। (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : PTI

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सोमवार की शाम वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के पास दोनों तरफ से गोलीबारी की खबरें आने के बाद चीन ने पलटवार की बात की है। वास्तव में भारतीय सेना को अगस्त के आखिरी हफ्ते में ही फायरिंग कर चीनी सेना को चेतावनी दे देनी चाहिए थी, जब उसने पैंगोंग त्सो के दक्षिण में 'ग्रीन लाइन' (जहां वह 1960 से दावा कर रहा है) को पार करने की कोशिश की थी।
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इसके अलावा, चीनी सेना (पीएलए) ने उन क्षेत्रों में किलेबंदी करना जारी रखा है, जहां वे पहले कब्जा कर चुके हैं, हालांकि वे अब शांति की बात भी करते हैं। भारत और चीन के रक्षा मंत्री हाल ही में रूस में मिले हैं और आज विदेश मंत्रियों की बैठक होगी।
लेकिन चीन के साथ कई दौर की बातचीत बेनतीजा रही , जैसा कि हममें से कई लोगों ने भविष्यवाणी की थी, क्योंकि चीन अब पीछे हटने के मूड में नहीं है। भारत में जो लोग युद्ध को आसन्न देख रहे हैं, उनके लिए यह आलेख वस्तुस्थिति को समझने में मददगार होगा।
विवादों का अध्ययन करने वाले छात्र भी पुष्टि करेंगे कि जब फौज का जमावड़ा होता है, तो युद्ध नहीं होते। ऐसा जमावड़ा आणविक हथियारों की तरह कवच का काम करता है। एक हकीकत यह भी है कि राजनेता तभी सैन्य विकल्प के बारे में सोचते हैं, जब कोई और विकल्प न बचा हो, या फिर उन्हें इससे कोई लाभ हो।

शी जिनपिंग का मानना है कि चीन के पास भारत पर अपने क्षेत्रीय दावों को लागू करने और अमेरिका द्वारा उत्पन्न चुनौती से निपटने के लिए पर्याप्त सैन्य शक्ति है, लेकिन वह बहुत गलत साबित हो सकते हैं।

भारत-चीन की अनिश्चित सीमा पर शांति बनाए रखने से संबंधित समझौतों को किनारे कर चीनी नेता और कमांडर मौजूदा विवाद में शुरुआती लाभ उठाने के बाद दुविधा में हैं कि कैसे अपनी आक्रमकता को बनाए रखें, क्योंकि देर से ही सही भारतीय सेना ने पूर्वी लद्दाख में एलएसी के पास चीनियों को सफलतापूर्वक रोक दिया है।

एक यूरोपीय थिंक टैंक का कहना है, 'भारत ने चीन के ही फार्मूले से उसको मात दी है...और खबरों के मुताबिक, उसने न केवल पैंगोंग झील के दक्षिणी तट पर कुछ रणनीतिक ऊंचाइयों पर नियंत्रण कर लिया है, बल्कि उत्तरी तट पर  भी...जिसने साफ तौर पर चीन के खेल को बिगाड़ दिया है।'

वास्तव में, यह हमेशा से भारतीय सेना की जवाबी कार्रवाई का एक हिस्सा था, क्योंकि पेशेवर सेना हमेशा युद्ध के मैदान में हर विकल्प के साथ युद्ध करती है। उन्हें बस आगे बढ़ने की राजनीतिक मंजूरी की जरूरत होती है।

लिहाजा पैंगोंग त्सो के दक्षिण-पूर्व की चोटियों तथा स्पैंगुर गैप और मोल्डो क्षेत्र में कब्जे के लिए बढ़ती चीनी सेना की हलचल से संबंधित सैटेलाइट से मिली जानकारी के आधार पर भारतीय बलों ने एलएसी के एक और हिस्से को पार करने की चीन की योजना को ध्वस्त कर दिया और यह उसी इलाके में हुआ जहां वरिष्ठ कमांडर स्तर की कुछ वार्ताएं हुई थीं।

इसे भारतीय सेना के जिन जवानों ने अंजाम दिया, उसमें खुफिया सैन्य इकाई तथा स्पेशल फ्रंटियर फोर्सेस (एसएफएफ) के जवान शामिल थे। लद्दाखी और तिब्बती मूल के ये जवान पहाड़ियों में होने वाले खतरनाक युद्ध के लिए प्रशिक्षित हैं। और जब पैंगोंग त्सो के दक्षिण में स्थित चोटियों पर कब्जे के इरादे से 200 से अधिक चीनी सैनिक आगे बढ़े, तो उनके साथ एसएफएफ के लोगों ने वही किया, जिसे अंजाम देने का इंतजार वे जिंदगी से भर से कर रहे थे।

दोनों पक्ष एक-दूसरे को उस जगह को खाली करने के लिए कहते रहते हैं, जिस पर वे मानते हैं कि घुसपैठ की गई है, ऐसे में अतीत से कुछ सबक लेना अच्छा रहेगा। 1950 के दशक के आखिर में चीनी किस तरह अक्साई चिन और नेफा (अब अरुणाचल प्रदेश) में घुसपैठ करते थे, और जोर देते थे कि सीमा की उनकी समझ सही है।

नेहरू सरकार की यह धारणा थी कि चीनी भारत पर हमला नहीं करेंगे, बल्कि शिमला सम्मेलन में 1913-14 में निर्धारित सीमा को मानेंगे, लेकिन उन्हें हैरानी हुई जब चीनी सेना ने हम पर हमला कर दिया। कोई भी स्पष्टीकरण इसे उचित नहीं ठहरा सकता कि हमारे नेतृत्व ने किस तरह गलती की। सबसे बुरी बात तो यह हुई कि 1962 में भारतीय सेना को लड़ने की अनुमति नहीं दी गई।

लेकिन इस बार, ऐसा लगता है कि मोदी सरकार के लिए बहुत कुछ दांव पर है, क्योंकि भारत जैसे खुले समाज में, जहां एलएसी पर होने वाली गतिविधि पर मीडिया की व्यापक दिलचस्पी है, नई दिल्ली केवल अपने अनुकूल सच की बात नहीं कर सकती।

अब 1962 से बहुत कुछ बदल गया है। भारतीय सेना ने 1962 की पराजय से काफी कुछ सीख लिया है और यह 1967 के नाथु ला और चो ला विवाद के समय ही दिख गया था। तब आधिकारिक तौर पर, भारत ने 88 सैनिकों को खोने का दावा किया था, जबकि 340 चीनी सैनिक मारे गए थे। लेकिन चीन ने केवल 65 सैनिकों के मारे जाने की बात स्वीकार की थी। इसी तरह चीन हाल में गलवां घाटी में मारे गए अपने सैनिकों के बारे में भी चुप रहा।

चीनी सेना औपचारिक समारोहों और झूठे वीडियो में प्रभावशाली दिखती है। उसके सेवा निवृत्त सैन्य दिग्गज आज खुलेआम अपने प्रति होने वाले रवैये को लेकर नाराजगी जता रहे हैं। ऐसे देश में जहां एक बच्चा नीति है, वहां के सैनिक मरने के लिए तैयार नहीं हैं। जबकि भारत में स्थिति बिल्कुल उलट है।

डिफेंस अपडेट ऑन वीपन्स ऐंड स्ट्रेटेजिज द्वारा तैयार एक यूट्यूब वीडियो में चीनी सैन्य क्षमताओं का विस्तृत विश्लेषण किया गया है, जो स्पष्ट रूप से दिखाता है कि चीन वास्तव में जो कुछ कर सकता है, अहंकार में उससे अधिक दिखाता है।

उदाहरण के लिए, चीन के तथाकथित पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान चेंग्दू-20 (जो असाधारण रूप से हाई टेक होने के कारण रडार की पकड़ में नहीं आता) को भारत के सुखोई 30 एमकेआई ने तलाश लिया था। और अगर यह पांचवीं पीढ़ी का लड़ाकू विमान है, तो चीन रूस से चौथी पीढ़ी का सुखोई-35 क्यों खरीद रहा है?

इसके अलावा, चीन की हाई-टेक पनडुब्बियां (टाइप 09 जे-क्लास) भी विश्वसनीय नहीं हैं। इसलिए मेरे जैसे लोग यह तर्क देते हैं कि इस बार भारतीय सेना चीन को सबक सिखा सकती है। और उसके इस दावे को ध्वस्त कर सकती है कि वह 1962 की तरह हमारी सीमा को लांघ सकती है।
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