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बिहार की राजनीति आज आकांक्षाओं और जाति की मजबूत पकड़ का मिश्रण

नीरजा चौधरी Updated Sat, 27 Apr 2019 02:44 AM IST
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कन्हैया कुमार (फाइल फोटो)
कन्हैया कुमार (फाइल फोटो)
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जयपुर हवाई अड्डे पर मेरी जांच करने वाली महिला सुरक्षाकर्मी से मैंने पूछा, राजस्थान में चुनाव प्रचार कैसा चल रहा है, तो उसने मुझे बताया कि वह बिहार से है। फिर मैंने उससे पूछा कि बिहार में चुनाव में क्या हो रहा है, तो उसने कहा कि हम अब चाहते हैं कि कन्हैया कुमार जैसे युवा राजनीति में आएं। उसका जवाब सुनकर मैं हैरान रह गई। राजस्थान में तैनात एक बिहारी महिला पुलिसकर्मी अपने राज्य में नए किस्म का नेतृत्व चाहती है! क्या वह आकांक्षी थी, जो अपने अतीत से छुटकारा चाहती थी?
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बेगूसराय निर्वाचन क्षेत्र में गांव की धूल भरी सड़कों पर लोग कन्हैया की एक झलक पाने के लिए इंतजार कर रहे थे, हालांकि उस ग्रामीण इलाके में अंधेरा होने लगा था। कन्हैया कुमार को उनके विरोधी 'टुकड़े-टुकड़े गैंग' का सदस्य बताते हैं। पर उनके पैतृक स्थान में ऐसा नहीं माना जाता। वहां उन्हें 'बेगूसराय का लाल' कहा जाता है। आंगनवाड़ी में काम करने वाली मां के बेटे ने अपनी अच्छी छवि बनाई है, चाहे लोग उन्हें वोट दें या नहीं। वह स्थानीय बनाम बाहरी का कार्ड खेल रहे हैं और बिना नाम लिए गिरिराज सिंह को बाहरी बताते हैं। इस बार बेगूसराय में भाजपा का चेहरा गिरिराज सिंह हैं, वह भी भूमिहार जाति से हैं। लेकिन लोग खुलेआम बताते हैं कि हम मोदी को वोट दे रहे हैं, गिरिराज तो गौण हैं। कन्हैया का महत्व उसके बिहारी जीन और भूमिहार डीएनए से आगे जाता है, और उनकी विचारधारा के आधार ने उन्हें राजनीतिक रूप से परिपक्व बना दिया है। मुहावरेदार भाषण की उनकी कला उन्हें आम लोगों से जोड़ती है। वह एक मंदिर के किनारे रुक जाते हैं और वहां सड़क किनारे खड़ी महिलाओं के चरण छूकर उनसे आशीर्वाद मांगने लगते हैं। वह कभी नहीं कहते कि मुझे वोट दीजिए, लेकिन अपने संक्षिप्त भाषणों में मुद्दों की बात करते हैं। वह स्थानीय युवाओं के लिए ऑइकन बन गए हैं।

बिहार की राजनीति आज आकांक्षाओं और जाति की मजबूत पकड़ का मिश्रण है, जिससे वफादारी बंधी हुई है और इससे लोगों को सुरक्षा मिलती है। इसलिए अगर उन्हें अपनी जाति भूमिहार (जिसकी संख्या चार लाख है) के वोट बड़ी संख्या में नहीं मिलेंगे, तो उसका लाभ भाजपा को हो सकता है। मुस्लिम मतदाता हालात को बहुत ध्यान से देख रहे हैं। अगर कन्हैया को भारी जनसमर्थन मिलता है, तो वे उन्हें ही वोट देंगे, अन्यथा राजद उनके लिए पसंदीदा विकल्प है। लेकिन कन्हैया कुमार को जितना अधिक समर्थन मिलेगा, उतना ही गठबंधन के समर्थन में कटौती की संभावना है और यह गिरिराज सिंह को जनसमर्थन पाने में सक्षम बना सकता है। कई बिहारियों का मानना है कि कन्हैया को गठबंधन का उम्मीदवार होना चाहिए था, तब वह भाजपा को अच्छी टक्कर दे सकते थे। तेजस्वी के उभार को देखते हुए लालू यादव नहीं चाहेंगे कि कोई दूसरा सितारा बिहार में उभरे, जो विपक्ष की जगह हथिया ले, जबकि तेजस्वी अच्छा काम कर रहे हैं और पार्टी पर अपनी पकड़ मजबूत बना रहे हैं।

और यहीं पर मुश्किल थी। गठबंधन के भीतर निहित अंतर्विरोध ने उसे प्रभावी उपकरण बनने से रोक दिया, अन्यथा ऐसा हो सकता था। इसलिए गठबंधन भाजपा को बिहार में बेशक टक्कर दे रहा है, पर जैसी अपेक्षा पहले की गई थी, वह वैसा बेहतर प्रदर्शन नहीं करता दिख रहा है। तेजस्वी राजनीतिक रूप से कुशाग्र हैं और त्वरित राजनीतिक प्रतिक्रिया देते हैं, लेकिन महागठबंधन भाजपा की तरह सुसंगठित नहीं है। लालू की अनुपस्थिति को 2019 के समर में याद किया जा रहा है।

महागठबंधन को मुस्लिम और यादवों (माइ) का समर्थन मिल रहा है। 2014 में कुछ यादव भाजपा के पाले में चले गए थे, लेकिन इस बार वे लालू की पार्टी के पक्ष में मजबूती से खड़े दिखते हैं। हाल ही में राबड़ी देवी ने आरोप लगाया है कि उन्हें और उनके परिवार को जेल में लालू यादव से मिलने नहीं दिया जा रहा है और लालू को जहर देने की कोशिश की गई थी। इससे यादवों की भावना राजद के पक्ष में ही जाएगी।

बिहार में इस बार के चुनाव की कुंजी अत्यंत पिछड़ी जातियों (ईबीसी) के पास है। अलग-अलग रूप में उनकी संख्या कम है, लेकिन एकजुट होने पर वे राज्य की आबादी का 32 फीसदी हिस्सा हैं। वे किसी एक नेता के पक्ष में नहीं हैं। आज सभी पार्टियां उन्हें लुभाने में लगी हैं। और बिहार के इतिहास में पहली बार 11 अत्यंत पिछड़ी जाति के लोगों को टिकट दिया गया है।

अपने माइ समीकरण को विस्तार देने के लिए महागठबंधन ने इस बार उपेंद्र कुशवाहा की आरएलएसपी, मल्लाह समुदाय का समर्थन पाने के लिए मुकेश साहनी की वीआईपी पार्टी और मुसहरों का समर्थन पाने के लिए जीतनराम की हम पार्टी को शामिल किया है। इन पंक्तियों की लेखिका ने पिछले तीन दशक में बिहार में मुसहरों की जिंदगी में कोई बदलाव नहीं देखा है, हालांकि बिहार की विभिन्न सरकारों ने उनके मुद्दों का समर्थन किया है। लालू यादव के पंद्रह वर्षों के शासन के दौरान वे लालू के पक्ष में रहे, फिर जब नीतीश कुमार ने भाजपा के साथ सरकार बनाई, तो वे नीतीश के पाले में चले गए। यह सवर्ण जातियों, ईबीसी, महादलित, पसमंदा मुस्लिमों का गठबंधन था, जिसने नीतीश को शासन करने में सक्षम बनाया।

शराबबंदी की नीति लागू करके नीतीश कुमार ने महिलाओं का समर्थन हासिल किया है। पर आज ईबीसी बंटा हुआ है और महादलित भी। लालू यादव और वास्तव में जदूय ने, जब 2015 के विधानसभा चुनाव में वे साथ थे, तो आरक्षण का कार्ड खेला था और ओबीसी की आशंकाओं को गहरा किया था कि आरक्षण खत्म हो जाएगा। इस बार लालू के ही बेटे तेजस्वी ने आर्थिक रूप से कमजोर तबकों (ईडब्ल्यूएस) को दस फीसदी आरक्षण दिए जाने को अपना हथियार बनाया है और ओबीसी के उस डर को हवा दी है कि ईडब्ल्यूएस आरक्षण देना सरकार का आरक्षण को खत्म करने का पहला कदम है। यह विचार यादवों और छोटी पिछड़ी जातियों के समर्थन को मजबूत बना रहा है।

सतह पर कन्हैया कुमार जैसे युवा का किसी बड़ी पार्टी का हिस्सा बनना आसान है, पर दूसरी तरफ सीपीआई जैसी छोटी पार्टी का हिस्सा बनकर उन्हें मुद्दों की राजनीति करने के लिए ज्यादा स्वतंत्रता और लचीलापन मिल सकता है, जिन्हें वह दीर्घकाल की राजनीति का औजार बनाना चाहते हैं।
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